कण्व वंश लगभग (73 ई.पू. से 28 ई.पू. तक)

लगभग 73 ई.पू. में देवभूति की हत्या के पश्चात वसुदेव कण्व सिंहासन पर बैठा। इसी घटना के साथ कण्व वंश की शुरुआत हुई।

इस बंश ने लगभग 45 साल तक शासन किया लेकिन इन सालों में भी इन्होंने कोई भी ऐसा काम नहीं किया जिससे इतिहास में कोई नाम हो सके। इस वंश के सभी शासक बस शुंग वंश द्वारा प्राप्त विरासत को ही सम्भालने का काम किया।

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विशेष रूप से विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण और कुछ अन्य पुराणों में कण्वों को शुंगभृत्य कहा गया है। चलो अब इस वंश को बिस्तार से समझते हैं —

कण्व वंश की शुरुआत

शुंग शासकों की शक्ति कमजोर पड़ चुकी थी। केंद्रीय शासन का प्रभाव कम हो गया था। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि कोई मंत्री राजा की हत्या उसी के महल में कैसे कर सकता है इसका जवाब हमें मिलता है बांडभट्ट के हर्षचरित में, इसमे साफ़ लिखा है कि शुंग राजा देवभूती जो पूरी तरह ऐशो आराम में डूबा हुआ था उसी के मंत्री वासुदेव ने एक साजिश रची और उसे रास्ते से हटा दिया।

तो अब सोचिए उस महल के अंदर की कहानी क्या थी? साल 73 BCE में वसुदेव ने एक जाल बिछाया और वह हत्यारों को रानी की दाशी की बेटी बोलकर महल में भेजता है। राजा तो अपनी ही दुनिया में मग्न था वह उस धोखे को भांप ही नहीं पाया और मारा गया। 

वसुदेव कण्व 

पुराणों के अनुसार वे ब्राह्मण थे। कण्व गोत्र से संबंध होने के कारण उन्हें “कण्व” कहा गया। उन्हें शुंग शासक देवभूति का मंत्री या प्रभावशाली दरबारी माना जाता है। इसी स्थिति का लाभ उठाकर उन्होंने सत्ता अपने हाथ में ली। वसुदेव शासन मुख्य रूप से पाटलिपुत्र और मगध क्षेत्र तक सीमित था। उस समय मौर्य काल जैसी विशाल साम्राज्यिक शक्ति नहीं रह गई थी।

वसुदेव कण्व का जन्म कब हुआ? कहाँ हुआ? पिता कौन थे? उनके बचपन, शिक्षा, परिवार और युवावस्था के बारे में इतिहास में लगभग कोई विश्वसनीय जानकारी नहीं मिलता। और ना ही कोई प्रमाणिक विवरण उपलब्ध है। 

वसुदेव कण्व के शासन की प्रशासनिक, आर्थिक या सैन्य उपलब्धियों का विस्तृत विवरण भी उपलब्ध नहीं है।

कण्व वंश में कुल कितने शासक थे?

शासकअनुमानित शासनकाल
वसुदेव कण्व73-64 ई.पू.
भूमिमित्र64-50 ई.पू
नारायण50-38ई.पू
सुशर्मा38–28 ई.पू.

भूमिमित्र (64–50 ई.पू.)

इतिहासकार सामान्यतः मानते हैं कि भूमिमित्र, वसुदेव कण्व के पुत्र और उत्तराधिकारी थे। यह जानकारी मुख्यतः पुराणों की वंशावलियों से मिलती है, जहाँ वसुदेव के बाद भूमिमित्र का नाम आता है।

भूमिमित्र ने लगभग 14 वर्ष तक शासन किया। कण्व वंश के शासकों में यह सबसे अधिक ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित माने जाते हैं। इसका मुख्य कारण उनके नाम वाले सिक्कों का मिलना है।

अब सवाल है कि कैसे पता चला कि सिक्के भूमिमित्र के ही हैं?

पुरातत्वविदों को कुछ सिक्कों पर “भूमिमितस” (Bhumitasa) जैसा लेख मिला है। हमारे देश में सिक्कों पर अक्सर शासक का नाम अंकित होता है 

  • भाषा: प्राकृत
  • लिपि: ब्राह्मी

सिस्को की उम्र, पुराणो में दर्ज अग्निमित्र के समय से मिलती है।

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नारायण और सुशर्मा कण्व वंश के अंतिम दो शासक थे। इनके शासनकाल के बारे में विस्तृत ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। पुराणों से सिर्फ इनके नाम और शासनकाल का पता चलता है, किंतु इनके प्रशासन, युद्धों और सांस्कृतिक उपलब्धियों का कोई विवरण नहीं मिलता।

कण्व वंश की शासन व्यवस्था कैसी थी?

कण्व वंश की शासन व्यवस्था के बारे में प्रत्यक्ष साक्ष्य कम हैं, इसलिए इतिहासकार इसके प्रशासन का पुनर्निर्माण मुख्यतः शुंग परंपरा के आधार पर करते हैं। जैसे –

  • शासन राजतंत्र (Monarchy) पर आधारित था। राजा ही सर्वोच्च शासक होता है 
  • शुंगों की तरह इनके अधीन भी कई स्थानीय शासक और सामंत रहे होंगे।
  • कण्व शासक ब्राह्मण माने जाते हैं, इसलिए वैदिक परंपराओं और ब्राह्मण धर्म को संरक्षण मिलने की संभावना मानी जाती है।
  • चूँकि स्वयं वसुदेव कण्व पहले मंत्री थे, इसलिए प्रशासन में मंत्रियों और अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण रही होगी।
  • मौर्य और शुंग काल की तरह भूमि कर तथा अन्य करों से राज्य की आय होती रही होगी
  • राज्य की सुरक्षा के लिए सेना अवश्य थी, परन्तु इस वंश
  • में सेना की संरचना, संख्या या संगठन के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती।

कण्व वंश की धार्मिक स्थिति

  • ब्राह्मण धर्म का संरक्षण।
  • वैदिक परंपराओं को बढ़ावा।
  • यज्ञ एवं धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा का निर्वाह।
  • धार्मिक सहिष्णुता (बौद्ध और जैन धर्म) के स्पष्ट विरोधी प्रमाण नहीं मिलते। 

कण्व वंश के स्रोत

  • पुराण– वायु पुराण, मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण, भागवत पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण इनसे कण्व शासकों के नाम, शासनकाल और वंश के उदय-पतन की जानकारी मिलती है।
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  • विशेष रूप से भूमिमित्र के सिक्के प्राप्त हुए हैं। जिनसे शासकों के नाम और आर्थिक स्थिति की जानकारी मिलती है।
  • प्रत्यक्ष अभिलेख बहुत कम हैं। कुछ बाद के अभिलेखों से अप्रत्यक्ष जानकारी मिलती है।
  • बाणभट्ट द्वारा रचित हर्षचरित में शुंगों और बाद की राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख मिलता है, जिससे कण्व काल को समझने में सहायता मिलती है।
  • बौद्ध ग्रंथ दिव्यावदान में शुंग और उत्तर-मौर्य काल की कुछ जानकारियाँ देता है, जो कण्व काल के अध्ययन में सहायक हैं।
  • उत्खननों से प्राप्त अवशेष, तत्कालीन संस्कृति और आर्थिक जीवन की जानकारी।
    • कण्व वंश के लिए कोई ऐसा प्रसिद्ध उत्खनन स्थल नहीं है जिसे विशेष रूप से “कण्व वंश का स्थल” कहा जाए। 
    • इसलिए इतिहासकार इस काल के अध्ययन में पुराणों और सिक्कों पर अधिक निर्भर रहते हैं, जबकि पुरातात्विक साक्ष्य सहायक भूमिका निभाते हैं।
  • कण्व वंश के लिए प्रत्यक्ष विदेशी विवरण लगभग नहीं मिलते, लेकिन उत्तर-मौर्य भारत की राजनीतिक स्थिति समझने में कुछ विदेशी स्रोत सहायक होते हैं।
    • किसी विदेशी लेखक ने कण्व शासकों का विस्तृत प्रत्यक्ष विवरण नहीं दिया है। वो तो शुंगों की वजह से कण्व वंश के बारे में थोड़े लेख मिल जाते हैं। 

यद्यपि इस वंश का शासनकाल केवल लगभग 45 वर्षों का रहा और इसके इतिहास से संबंधित स्रोत सीमित हैं, फिर भी इसने शुंग वंश और सातवाहन वंश के मध्य एक महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य किया। पुराणों, सिक्कों तथा सीमित अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर ज्ञात होता है कि कण्व वंश ने उत्तर-मौर्य काल की राजनीतिक परंपराओं को आगे बढ़ाया। इस प्रकार कण्व वंश भारतीय इतिहास में एक संक्रमणकालीन वंश के रूप में विशेष महत्व रखता है।

शुंग वंश (लगभग 185–73 ई.पू.)

मौर्य वंश (लगभग 322–185 ई.पू.)

नंद वंश (लगभग 345–322 ई.पू.)

शिशुनाग वंश (लगभग 413–345 ई.पू.)

हर्यंक वंश (लगभग 544–413 ई.पू.)

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