शुंग वंश हमारे देश के इतिहास में एक ऐसा राजवंश था, जिसने मौर्य साम्राज्य के अंत के बाद मगध क्षेत्र में शासन संभालने का काम किया और लगभग 185 ईसा पूर्व से 73 ईसा पूर्व तक शासन किया।
इस वंश की स्थापना पुष्यमित्र शुंग ने की थी, जो मौर्य सम्राट बृहद्रथ मौर्य का सेनापति था।
अगर आपने पिछला ब्लॉग (शिशुनाग वंश से नंद वंश में सत्ता परिवर्तन) पढा होगा तो, अब तक समझ चुके होंगे कि यहां क्या हुआ होगा ?
Contents
शुंग वंश की शुरूवात (मौर्य वंश का अंत)
देखो इतिहासकारों के हिसाब से उस समय मौर्य साम्राज्य पहले जैसा शक्तिशाली नहीं रह गया था। राजा बृहद्रथ(मौर्य वंश का अंतिम शासक) कमजोर शासक माना जाता है और सेना की असली ताकत उसके सेनापति पुष्यमित्र के हाथ में थी।
एक दिन सैन्य परेड (military parade) का आयोजन किया गया (यह एक ऐसा कार्यक्रम होता है जिसमें राजा के सामने सेना अपनी ताकत और अनुशासन दिखाती है।)
इसी परेड के दौरान–
- बृहद्रथ सेना का निरीक्षण कर रहा था
- पुष्यमित्र शुंग भी वहीं मौजूद था
- तभी अचानक पुष्यमित्र ने मौका देखकर बृहद्रथ की हत्या कर दी
अब आप सोच रहे होंगे कि सेना क्या कर रही थी? क्योंकि सेना पहले से उसी के नियंत्रण में थी, इसलिए किसी ने तुरंत विरोध नहीं किया और पुष्यमित्र ने खुद को राजा घोषित कर दिया। फिर यहीं से शुरू होता है शुंग वंश।
इतिहासकारों को बृहद्रथ के हत्या की जानकारी कहाँ से मिलती है??
बृहद्रथ की हत्या वाली घटना की जानकारी हमारे इतिहासकारों को किसी समकालीन (same time) शिलालेख से नहीं मिलती, बल्कि यह बाद के साहित्यिक स्रोतों से मिलती है। जैसे ‐
- हर्षचरित (लेखक: बाणभट्ट) पुस्तक 7वीं शताब्दी में लिखी गई थी इसमें बताया गया है कि पुष्यमित्र शुंग ने एक सैन्य प्रदर्शन के दौरान हत्या कर दी, लेकिन यह किताब घटना के लगभग 700 साल बाद लिखा गया है।
- पुराण में भी शुंग वंश के उदय और मौर्य वंश के अंत का जिक्र मिलता है (हालांकि detail कम है)
- दिव्यावदान इसमें पुष्यमित्र का वर्णन मिलता है, लेकिन focus ज़्यादा बौद्ध धर्म के साथ उसके संबंध पर है।
इस घटना को पूरी तरह 100% पक्का (confirmed) नहीं माना जा सकता लेकिन यह सबसे स्वीकार्य (widely accepted) कहानी है।
इसलिए इतिहासकार इन स्रोतों की तुलना करके निष्कर्ष निकालते हैं, जिससे पूरी घटना को समझा जा सके।
| शासक का नाम | शासनकाल (ई. पूर्व) |
|---|---|
| पुष्यमित्र शुंग | 185 -149 |
| अग्निमित्र | 149 – 141 |
| वसुज्येष्ठ | — |
| वसुमित्र | – |
| आंद्रक | – |
| पुलिंदक | – |
| घोष | – |
| वज्रमित्र | – |
| भागभद्र | हेलियोडोरस स्तंभ से संबंधित |
| देवभूति | अंतिम शासक |
- मौर्य काल की तरह detailed records नहीं मिले हैं शुंग काल के, और inscriptions (शिलालेख) भी बहुत कम हैं।
- अलग-अलग पुराणों में शासकों के नाम और क्रम भी थोड़ा बदल जाता है इससे historians को exact time fix करने में दिक्कत होती है।
पुष्यमित्र शुंग का इतिहास
अपने देश के इतिहासकारों को उसके बचपन, जन्म स्थान या परिवार के बारे में कोई स्पष्ट और समकालीन साक्ष्य नहीं मिले हैं।
लेकिन, इतना निश्चित रूप से कहा जाता है कि वह एक ब्राह्मण परिवार से संबंधित था और भारद्वाज गोत्र का था। इसके अलावा, वह मौर्य साम्राज्य में एक उच्च पद सेनापति पर कार्यरत था, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि उसे सैन्य और प्रशासनिक दोनों क्षेत्रों का अच्छा अनुभव रहा होगा।
इस प्रकार, भले ही उसके बचपन के बारे में जानकारी कम है, लेकिन उसका सेनापति के रूप में उभरकर सामने आना यह बताता है कि वह एक सक्षम और प्रभावशाली व्यक्ति था।
आम तौर पर पुष्यमित्र शुंग को उत्तर भारत का पहला स्पष्ट रूप से ज्ञात ब्राह्मण शासक माना जाता है।
पुष्यमित्र का साम्राज्य मुख्यत: मगध, पाटलिपुत्र, विदिशा, मध्य भारत, गंगा घाटी तक फैला हुआ था। अगर सीधे “पुष्यमित्र की विजय” पूछा जाए, तो मुख्य रूप से–
- विदर्भ विजय
- यवनों के विरुद्ध सफलता
सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। जबकि मगध और पाटलिपुत्र उन्हें मौर्य सत्ता पर कब्जे के कारण मिले थे। इसकी राजधानी प्रारंभ में पाटलिपुत्र मानी जाती है, जबकि विदिशा भी एक महत्वपूर्ण केंद्र था।
पुष्यमित्र अपनी शक्ति दिखाने के लिये 2 बार अश्वमेध यज्ञ(इस यज्ञ का जिक्र रामायण और महाभारत में भी है) करवाया।
जब पुष्यमित्र शुंग अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे, तब यज्ञ का घोड़ा यवनों ने पकड़ लिया, जिसके बारे में इतिहासकारों के हिसाब से कहा जाता है कि पुष्यमित्र के पौत्र(बेटे का बेटा) वसुमित्र ने सिंधु नदी के पास यवनों को पराजित किया था।
यह शुंग काल कला और संस्कृति के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। जैसे –
- स्तूप कला का विकास
- मूर्तिकला आगे बढ़ी
- संस्कृत साहित्य को संरक्षण मिला
- वैदिक परंपराएँ मजबूत हुईं
पुष्यमित्र शुंग के बारे में जानकारी हमारे इतिहासकारों को मुख्यतः मालविकाग्निमित्रम्, महाभाष्य, दिव्यावदान,, अयोध्या अभिलेख, पुराण से मिलती है।
अग्निमित्र का इतिहास
पुष्यमित्र के बाद शुंग वंश का राजा उसका पुत्र अग्निमित्र बना। राजा बनने से पहले अग्निमित्र विदिशा के राज्यपाल थे। जिसकी वजह से सैन्य और प्रशासन दोनों का अनुभव हो गया था।
जब विदर्भ के शासक यज्ञसेन ने अपना स्वतंत्र राज्य घोषित किया, तब पुष्यमित्र ने अग्निमित्र को युद्ध के लिए भेजा।
अग्निमित्र ने यज्ञसेन को हराकर शुंग प्रभाव स्थापित किया और राज्य को दो भागों में बाँट दिया–
- विदर्भ का एक भाग यज्ञसेन को रहने दिया गया
- दूसरा भाग उसके प्रतिद्वंदी माधवसेन को दिया।
दोनों शासकों ने शुंगों की अधीनता स्वीकार की। यहि उनकी सबसे बड़ी सैन्य सफलता मानी जाती है।
इसका शासन बहुत लंबा नहीं था। इसने तो लगभग 8 वर्ष तक शासन किया माना जाता है। फिर भी यह famous है तो इसका मुख्य कारण है‐ मालविकाग्निमित्रम् एक नाटक है जो अग्निमित्र के जीवन और शुंग वंश के कुछ हिस्सों को बताती है।
अग्निमित्र को बहुत बड़े विजेता के रूप में नहीं, लेकिन
- विदर्भ युद्ध
- शुंग शासन को स्थिर रखने
- संस्कृत साहित्य में प्रसिद्धि के कारण याद किया जाता है।
अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि अग्नि मित्र बाद वसुमित्र शुंग राजा बना था।
लेकिन उसका शासन बहुत लंबा या बहुत शक्तिशाली नहीं माना जाता।
भागभद्र और हेलियोडोरस
भागभद्र के समय एक महत्वपूर्ण घटना हुई। यूनानी राजा एंटियल्किडास ने अपने दूत हेलियोडोरस को भारत भेजा।
हेलियोडोरस ने विदिशा के पास लगभग 113 ईशा पूर्व में एक स्तंभ बनवाया जिसे आज हेलियोडोरस स्तंभ कहा जाता है। यह प्रमाण है कि भारत और यूनान के संबंध बने हुए थे।
Heliodorus Pillar हमारे देश में प्रथम विदेशी भक्त का प्रमाण है जिसने वैदिक धर्म को अपनाया।
शुंग वंश क्यों कमजोर हुआ?
इसके पीछे कई कारण हैं अग्निमित्र के बाद–
- कमजोर शासक आने लगे
- साम्राज्य छोटे भागों में बँटने लगा
- प्रांतीय शासक स्वतंत्र होने लगे
- यवनों और अन्य शक्तियों का दबाव बढ़ा
शुंग वंश का प्रशासन
शुंग वंश का प्रशासन पूरी तरह नया नहीं था, बल्कि यह काफी हद तक मौर्य प्रशासन की परंपरा को ही आगे बढ़ाता था, लेकिन कुछ बदलावों के साथ।
- राजा के हाथ में ही सारी शक्तियाँ (सैन्य, प्रशासनिक, न्याय) होती थीं
- पूरे राज्य को छोटे-छोटे भागों (प्रांतों) में बाँटा गया था इन पर राजा के प्रतिनिधि शासन करते थे।
- कई बार राजकुमार (princes) या भरोसेमंद अधिकारी नियुक्त किए जाते थे
- राजा ही अंतिम न्यायाधीश होता था, धर्मशास्त्रों (धार्मिक नियमों) के आधार पर फैसले होते थे।
- शुंग शासक ब्राह्मण धर्म के समर्थक थे यज्ञ (sacrifices) जैसे कार्य कराए गए।
- कर (tax) वसूली मौर्य काल जैसी ही रही, कृषि (farming) मुख्य आय का स्रोत था।
शुंग वंश की धर्म नीति (Religious Policy)
इस वंश की धर्म नीति के बारे में इतिहासकारों की राय एक जैसी नहीं है। फिर भी हम इसे balanced तरीके से समझ सकते हैं।
यह बात तो आप सभी जानते होंगे कि बौद्ध और जैन धर्म के प्रसार के कारण वैदिक परंपराओं का प्रभाव कुछ क्षेत्रों में कम हुआ था, क्युकी ज्यादातर शासकों ने बौद्ध और जैन धर्मों को संरक्षण दिया था।
लेकिन शुंग शासक ब्राह्मण धर्म (वैदिक परंपरा) के समर्थक थे जिससे वैदिक परंपराओं को फिर से बढ़ावा मिला, और ब्राह्मणों की स्थिति मजबूत हुई।
दिव्यावदान(बौद्ध ग्रंथ) के अनुसार शुंग शासन काल में –
- बौद्ध मठों को नुकसान पहुँचाया गया
- भिक्षुओं पर अत्याचार हुए
इससे लगता है कि वे बौद्ध धर्म के विरोधी थे। लेकिन पुरातात्विक साक्ष्य कहते हैं कि
- सांची स्तूप का विस्तार शुंग काल में हुआ
- भरहुत स्तूप में भी शुंग कालीन निर्माण मिले
अगर पूरा विरोध होता, तो ये विकास संभव ही नहीं था।
आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि शुंग शासक ब्राह्मण धर्म के पक्षधर थे लेकिन उन्होंने बौद्ध धर्म को पूरी तरह खत्म नहीं किया। उनका रवैया शायद राजनीतिक और धार्मिक संतुलन वाला था।
शुंग वंश के समय जैन धर्म की स्थिति को लेकर हमारे इतिहासकारों के पास बहुत कम direct साक्ष्य मिलते हैं, जैसे –
- कुछ जैन ग्रंथ, जैसे परिशिष्टपर्व मुख्यतः नंद वंश आदि का वर्णन करते हैं लेकिन शुंग काल के बारे में ज्यादा विस्तार नहीं देते।
- शुंग शासकों और जैन धर्म के बीच कोई बड़ा conflict या खास घटना का उल्लेख नहीं मिलता
इतिहासकारों के अनुसार जैन धर्म इस समय समाज में मौजूद और प्रचलित था लेकिन उसे राजकीय संरक्षण (royal patronage) कम मिला। शुंग शासक ज्यादा ध्यान ब्राह्मण धर्म पर दे रहे थे।
देवभूति अंतिम शुंग राजा
देवभूति को शुंग वंश का अंतिम राजा माना जाता है। कहा जाता है कि-
- वह विलासी था
- शासन पर ध्यान कम देता था
- मंत्री अधिक शक्तिशाली हो गए थे
इसी समय मौका पाकर उसके मंत्री वसुदेव कण्व ने लगभग 73 ई.पू. में देवभूति की हत्या कर दी।
शुंग वंश भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण संक्रमण काल था, जहाँ पुष्यमित्र शुंग ने सत्ता संभालकर एक नई राजनीतिक व्यवस्था की शुरुआत की। इस काल में एक ओर वैदिक परंपराओं को पुनर्जीवित किया गया, वहीं दूसरी ओर सांची स्तूप और भरहुत स्तूप जैसे बौद्ध स्थलों का विकास भी जारी रहा, जो उस समय के धार्मिक संतुलन को दर्शाता है।
Yavan akrman घटना का वर्णन कहाँ है??
मालविकाग्निमित्रम्
मालविकाग्निमित्रम् की कहानी और इतिहास (अग्नि मित्र की love story)


