दोस्तों, हमारी पिछली ब्लॉग में हमने न्याय दर्शन और वैशेषिक दर्शन को समझा था।
- न्याय दर्शन ने हमें बताया कि तर्क और प्रमाण से ही सही ज्ञान मिलता है।
- वैशेषिक दर्शन ने समझाया कि पदार्थों और उनकी श्रेणियों के आधार पर पूरी सृष्टि को जाना जा सकता है।
अब उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए आज हम बात करेंगे सांख्य दर्शन की। यह भारतीय दर्शन की सबसे पुरानी और सबसे तार्किक परंपराओं में से एक है।
सांख्य दर्शन किन सवालों का जवाब देता है?
- यह दुनिया कैसे बनी?
- दुख क्यों है?
- मन और शरीर में क्या अंतर है?
- इंसान मुक्ति कैसे पा सकता है?
सांख्य दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सब कुछ तर्क और विश्लेषण से समझाता है। इसमें न चमत्कार की ज़रूरत है, न आस्था की, और न ही ईश्वर की। इसीलिए इसे भारतीय दर्शन का वैज्ञानिक आधार (Scientific Foundation) कहा जाता है। इस दर्शन में 25 तत्त्वों का क्रमबद्ध विश्लेषण मिलता है–
- पुरुष (Purusha)
- प्रकृति (Prakriti)
- और इनके 23 विकास
यही तत्त्व सृष्टि के निर्माण और मानव अनुभव दोनों को समझाते हैं। सांख्य दर्शन सिर्फ आध्यात्मिक नहीं है। यह एक साथ Cosmology (ब्रह्मांड की व्याख्या), Psychology (मन का अध्ययन) और Metaphysics (तत्त्वों का विश्लेषण) का संगम है। आइए इसे अच्छे से समझने की कोशिश करते हैं –
Contents
- 1 सांख्य दर्शन क्या है?
- 2 इसका अर्थ ??
- 3 इस शब्द की उत्पत्ति (Origin of the Word Sankhya)
- 4 कपिल मुनि
- 5 कपिल मुनि का उल्लेख किन ग्रंथों में मिलता है?
- 6 तपोस्थल–
- 7 कपिल मुनि क्यों महत्वपूर्ण हैं?
- 8 सांख्य दर्शन के दो रूप और योग से संबंध
- 9 1. निरिश्वर सांख्य (Atheistic Samkhya)
- 10 2. सेश्वर सांख्य (Theistic Samkhya)
- 11 सांख्य और योग का गहरा संबंध
- 12 सांख्य दर्शन के प्रमुख सिद्धांत
- 13 प्रकृति और पुरुष का सिद्धांत (Prakriti–Purusha Siddhant)
- 14 1. पुरुष (Purusha)- शुद्ध चेतना
- 15 2. प्रकृति (Prakriti)-मूल द्रव्य
- 16 3. प्रकृति और पुरुष का संयोग
- 17 संसार का कारण– अविवेक (Non-discrimination)
- 18 एक-एक लाइन में
- 19 त्रिगुण सिद्धांत (सत्त्व, रजस्, तमस्)
- 20 1. सत्त्व (Sattva) – प्रकाश, शुद्धता और ज्ञान
- 21 2. रजस् (Rajas) – क्रिया, ऊर्जा और इच्छा
- 22 3. तमस् (Tamas) – अंधकार, जड़ता और अज्ञान
- 23 त्रिगुण कैसे काम करते हैं?
- 24 मोक्ष में त्रिगुण की भूमिका
- 25 महत्, अहंकार और तन्मात्राओं का सिद्धांत
- 26 1. महत् (Mahat) – Cosmic Intelligence / बुद्धि तत्त्व
- 27 महत् की विशेषताएँ —
- 28 2. अहंकार (Ahamkara)– Ego / ‘मैं’ का भाव
- 29 3. तन्मात्राएँ (Tanmatras) – पाँच सूक्ष्म मूल तत्व
- 30 पाँच तन्मात्राएँ-
- 31 पंचमहाभूत सिद्धांत (Five Great Elements Theory)
- 32 पाँच महाभूत
- 33 ये पाँच महाभूत आते कहाँ से हैं?
- 34 कारण–कार्य संबंध (सत्कार्यवाद) –
- 35 सत्कार्यवाद की मुख्य बातें
- 36 25 तत्व कौन कौन सा है?
- 37 सांख्य दर्शन के प्रमुख ग्रंथ
- 38 आधुनिक दृष्टि से सांख्य दर्शन का महत्व
- 39 ARYA HISTORY
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सांख्य दर्शन क्या है?
तो दोस्तों सांख्य दर्शन हमारे भारतीय दर्शन की सबसे पुरानी और अहम परंपराओं में से एक है। यह हमें समझाता है कि दुनिया कैसे बनी, हमारा मन और बुद्धि कैसे काम करते हैं, और इंसान अपने दुखों से कैसे छुटकारा पा सकता है। इसमें हर बात को बहुत साफ और तार्किक तरीके से समझाया गया है।
इसका अर्थ ??
सांख्य का मतलब है गिनती करना, यानी चीज़ों की संख्या बताना। सांख्य दर्शन में 25 तत्त्वों का विस्तार से वर्णन मिलता है, जो मिलकर पूरी सृष्टि बनाते हैं। इसी वजह से इसे ‘तत्त्व-ज्ञान’ भी कहा जाता है। इन 25 तत्वों को हम आगे जानेंगे कि वो कोण कोण से हैं।
इस शब्द की उत्पत्ति (Origin of the Word Sankhya)
दोस्तों संख्या शब्द संस्कृत के मूल शब्द ‘सँख्’ से आया है, जिसका मतलब है गिनना या गणना करना। इसी से सांख्य, सांख्याय और सांख्यान जैसे शब्द बने हैं, जिनका सीधा अर्थ है संख्या बताना या तत्त्वों की गिनती करना। सांख्य दर्शन में पूरी सृष्टि को 25 तत्त्वों में बाँटकर समझाया गया है, इसलिए इसे सांख्य कहा गया है।
कपिल मुनि
कपिल मुनि भारतीय दर्शन परंपरा के एक महान ऋषि और सांख्य दर्शन के प्रवर्तक (Founder) माने जाते हैं। विद्वानों के अनुसार उनका काल ईसा पूर्व 7वीं–6वीं शताब्दी के आसपास माना जाता है। वे ऋषि कर्दम और देवहूति के पुत्र थे (भागवत पुराण के अनुसार)।
- बुद्धि, अहंकार, मन, इंद्रियाँ, महाभूत इनकी मनोवैज्ञानिक व्याख्या सबसे पहले उन्होंने दी थी। इसीलिए कपिल मुनि को भारतीय मनोविज्ञान का जनक (Father of Indian Psychology) भी कहा जाता है।
कपिल मुनि का उल्लेख किन ग्रंथों में मिलता है?
कपिल मुनि का वर्णन कई ग्रंथों में मिलता है—
- भागवत पुराण
- महाभारत
- भागवत गीता
- ब्रह्मसूत्र
- सांख्यसूत्र
इन सभी में उन्हें एक महान योगी और गहन तत्त्वचिंतक बताया गया है।
तपोस्थल–
- परंपरा के अनुसार उनका प्रसिद्ध आश्रम गंगा सागर (पश्चिम बंगाल) और पातालकन्या क्षेत्र में माना जाता है।
- गंगा सागर में आज भी कपिल मुनि का मंदिर है, जहां मकर संक्रांति पर विशाल मेला लगता है।
कपिल मुनि क्यों महत्वपूर्ण हैं?
- क्योंकि उनके दर्शन ने आगे चलकर योग दर्शन, बौद्ध दर्शन, जैन दर्शन और वैदांत दर्शन सभी को प्रभावित किया।
- वह भारतीय दर्शन में सबसे पहले क्रमबद्ध वैज्ञानिक सोच लाने वाले ऋषि थे।
सांख्य दर्शन के दो रूप और योग से संबंध
सांख्य दर्शन को दो तरह से समझा जाता है-
- निरिश्वर सांख्य- जहाँ ईश्वर को नहीं माना गया।
- सेश्वर सांख्य- जहाँ ईश्वर को माना गया।
इन्हीं दोनों से योग दर्शन का रिश्ता भी जुड़ता है।
1. निरिश्वर सांख्य (Atheistic Samkhya)
इसे कपिल मुनि ने बताया था। कि–
- इसमें ईश्वर को सृष्टि का कारण नहीं माना जाता।
- पूरी दुनिया प्रकृति और पुरुष के संबंध से चलती है।
- यह दर्शन तर्क, अनुभव और अनुमान पर आधारित है।
- मुक्ति का रास्ता है पुरुष और प्रकृति का फर्क समझना (भेद‑ज्ञान)।
आज सबसे ज़्यादा यही रूप पढ़ाया और जाना जाता है।
2. सेश्वर सांख्य (Theistic Samkhya)
यह बाद में विकसित हुआ रूप है।
- इसमें ईश्वर को प्रकृति और पुरुष से अलग, एक स्वतंत्र सत्ता माना गया।
- ईश्वर को संसार का नियंता(नियंत्रण करने वाला) माना गया है, लेकिन सृष्टि का सीधा कारण नहीं।
कई विद्वान मानते हैं कि यह रूप योग दर्शन के प्रभाव से बना।
सांख्य और योग का गहरा संबंध
सांख्य दर्शन हमें ज्ञान देता है। यह बताता है कि सृष्टि कैसे बनी, 25 तत्त्व कौन‑कौन से हैं, और प्रकृति, पुरुष का फर्क क्या है। योग दर्शन हमें अनुभव कराता है। कि 1वही सिद्धांत अभ्यास में लाकर मन को शांत करता है और मुक्ति तक पहुँचाता है। दोनों का अंतिम लक्ष्य एक ही है—मोक्ष।
सांख्य कहता है कि यह ज्ञान से मिलेगा।
योग कहता है कि यह अभ्यास से मिलेगा।
🕉️ भारतीय दर्शन का सम्पूर्ण वर्गीकरण (सभी शाखाओं सहित)
सांख्य दर्शन के प्रमुख सिद्धांत
तो आज हम इस दर्शन के 5 प्रमुख सिद्धांतों को अच्छे से समझेंगे, क्योंकि ये सांख्य दर्शन के मूल दार्शनिक सिद्धांत (Core Doctrines) हैं, ये सृष्टि की रचना और कार्यप्रणाली को समझाते हैं।
- प्रकृति और पुरुष का सिद्धांत
- त्रिगुण सिद्धांत (सत्त्व, रजस्, तमस्)
- महत्, अहंकार और तन्मात्राओं का सिद्धांत
- पंचमहाभूत सिद्धांत
- कारण–कार्य संबंध (सत्कार्यवाद)
चलो फिर दोस्तों सबको 1,1 करके अच्छे से समझने की कोशिश करते हैं।
प्रकृति और पुरुष का सिद्धांत (Prakriti–Purusha Siddhant)
सांख्य दर्शन का सबसे केंद्रीय और मूलभूत सिद्धांत प्रकृति (Nature / Primal Matter) और पुरुष (Consciousness / Self) का सिद्धांत है। इसके अनुसार सम्पूर्ण जगत दो तत्वों पर आधारित है प्रकृति और पुरुष।
1. पुरुष (Purusha)- शुद्ध चेतना
- पुरुष = आत्मा जैसा तत्व, जो सिर्फ देखने वाला (Observer) है।
- यह न जन्म लेता है, न मरता है।
- हमेशा स्थिर, शाश्वत और निष्क्रिय रहता है। यह कभी बदलता नहीं, हमेशा से है और कुछ करता नहीं बस देखता रहता है।
- हर जीव में अलग‑अलग पुरुष होता है।
सीधे शब्दों में- पुरुष = “मैं” का बोध, हमारी असली चेतना।
2. प्रकृति (Prakriti)-मूल द्रव्य
- प्रकृति= भौतिक जगत की जड़।
- इसमें तीन गुण होते हैं: सत्त्व, रजस्, तमस्
- यह सक्रिय है और सब कुछ पैदा करती है। जैसे- बुद्धि, अहंकार, मन, इंद्रियाँ, पाँच महाभूत आदि।
इसे आसान शब्दों में कहें तो प्रकृति मन, बुद्धि और पूरा भौतिक जगत।
3. प्रकृति और पुरुष का संयोग
- जगत की उत्पत्ति प्रकृति से होती है। लेकिन यह तभी शुरू होती है जब पुरुष उसके पास आता है।
- पुरुष प्रकृति को प्रकाशित करता है, और प्रकृति पुरुष के लिए भोग तथा मोक्ष दोनों का आधार बनती है।
- सांख्य के अनुसार
- पुरुष और प्रकृति का संयोग वास्तविक संयोग नहीं है, बल्कि निकटता का बोध (proximity) है।
संसार का कारण– अविवेक (Non-discrimination)
- सांख्य दर्शन कहता है कि हमारी सारी दुख–परेशानी की जड़ अविवेक है, यानी गलत पहचान।
- जब पुरुष (चेतना) अपने आपको प्रकृति (शरीर–मन–अहंकार) से अलग नहीं समझ पाता, तो वह गलत धारणा बना लेता है जैसे- मैं यह शरीर हूँ, मैं ही मन हूँ, मैं सोचने वाला हूँ, मैं करने वाला हूँ।
- यही अविवेक है पुरुष और प्रकृति का फर्क न समझना।
- जब सही ज्ञान होता है कि “मैं प्रकृति से अलग हूँ”, तभी मोक्ष मिलता है।
एक-एक लाइन में
- पुरुष = शुद्ध चेतना, निष्क्रिय, अनेक, साक्षी।
- प्रकृति = जड़, त्रिगुणात्मक, सक्रिय, सब कुछ इसी से उत्पन्न।
- दोनों की निकटता से संसार चलता है।
- उनकी भिन्नता का ज्ञान होने से मोक्ष मिलता है।
त्रिगुण सिद्धांत (सत्त्व, रजस्, तमस्)
जैसा कि अभी मैंने प्रकृति में तीन गुणों की बात किय थे अब उसी के बारे में बिस्तार से जानेंगे, तो सांख्य दर्शन के अनुसार पूरी प्रकृति (सृष्टि) तीन मूल गुणों से मिलकर बनी है। इन्हें त्रिगुण कहा जाता है —
- सत्त्व
- रजस्
- तमस्
ये तीनों गुण हर वस्तु, हर मनुष्य, हर विचार और हर क्रिया में अलग-अलग अनुपात में मौजूद होते हैं। इन्हीं के अनुपात से किसी वस्तु का स्वभाव और मनुष्य का व्यक्तित्व तय होता है। चलो अब इन तीनों को बिस्तार से समझते हैं –
1. सत्त्व (Sattva) – प्रकाश, शुद्धता और ज्ञान
सत्त्व वह गुण है जो-
- हल्कापन, शांति, स्पष्टता, सकारात्मकता और ज्ञान उत्पन्न करता है।
जिस व्यक्ति में सत्त्व अधिक होता है, वह—
- शांत, दयालु, संतुलित, सत्यप्रिय और बुद्धिमान होता है।
सत्त्व= प्रकाश + ज्ञान + शुद्धता
2. रजस् (Rajas) – क्रिया, ऊर्जा और इच्छा
रजस् वह गुण है जो-
- गतिविधि, उत्साह, प्रयास, महत्वाकांक्षा, और इच्छा पैदा करता है।
अब जिस व्यक्ति में रजस् अधिक होता है, तो वह–
- मेहनती, लक्ष्य-केन्द्रित, सक्रिय होता है, लेकिन बेचैनी, क्रोध और असंतोष भी अधिक होता है।
रजस्= गति + क्रिया + इच्छा
3. तमस् (Tamas) – अंधकार, जड़ता और अज्ञान
तमस् वह गुण है जो—
- आलस्य, भ्रम, अज्ञान, भारीपन और नकारात्मकता उत्पन्न करता है।
जिस व्यक्ति में तमस् बढ़ जाता है, वह—
- सुस्त, भ्रमित, क्रोधी, असंगठित और निर्णय लेने में अक्षम हो जाता है।
तमस् =अंधकार + जड़ता + अज्ञान
त्रिगुण कैसे काम करते हैं?
- तीनों गुण हमेशा मिलकर काम करते हैं कोई एक भी गुण अकेला नहीं होता।
- पूरी प्रकृति (मन, शरीर, विचार, भावनाएँ, क्रियाएँ, पदार्थ) इन तीनों के संयोजन से बनती है।
- जिस तत्व में जो गुण अधिक होगा, उसका स्वभाव वैसा ही होगा।
अब जैसे उदाहरण ले लो –
- दूध= सत्त्व प्रधान
- अग्नि= रजस् प्रधान
- अंधकार / धुआँ= तमस् प्रधान
- साधु= सत्त्व प्रधान
- योद्धा= रजस् प्रधान
- सुस्त व्यक्ति= तमस् प्रधान
मोक्ष में त्रिगुण की भूमिका
हमें मोक्ष तब मिलता है जब हम(आत्मा) समझ ले कि हम सत्त्व-रजस्-तमस् का मिश्रण नहीं, बल्कि उनसे पूरी तरह अलग है। त्रिगुण केवल प्रकृति के गुण हैं, हमारी आत्मा के नहीं।
त्रिगुण का विवेक = बंधन से मुक्ति (कैवल्य)दोस्तों यहां कैवल्य का मतलब है जन्म–मृत्यु, सुख–दुःख, कर्म–फल, राग–द्वेष और मन के उतार-चढ़ाव से पूरी तरह मुक्त होना।
महत्, अहंकार और तन्मात्राओं का सिद्धांत
तो दोस्तों सांख्य दर्शन के अनुसार जब प्रकृति (Prakriti) और पुरुष (Purusha) का संयोग होता है, तो सृष्टि की उत्पत्ति निम्न क्रम में शुरू होती है और इसी क्रम को तत्त्वों का विकास (Evolution of Elements) कहा जाता है।इस विकास में सबसे पहले पैदा होता है
- महत्
- फिर अहंकार
- और फिर तन्मात्राएँ
इन्हें सृष्टि के सबसे महत्वपूर्ण आधार तत्त्व माना जाता है।
1. महत् (Mahat) – Cosmic Intelligence / बुद्धि तत्त्व
- सृष्टि का पहला उत्पन्न तत्त्व
- इसे बुद्धि, चित्त या व्यापक बुद्धि भी कहा जाता है
- पूरी दुनिया में जो बुद्धि, निर्णय, विवेक और चेतन समझ दिखाई देती है, वह महत् से ही आती है।
महत् की विशेषताएँ —
- निर्णय लेने की क्षमता
- अच्छा-बुरा पहचानना
- कर्तव्य और नैतिक समझ
- सत्य-असत्य का विवेक
- प्रकृति से उत्पन्न सबसे सूक्ष्म और उच्च तत्त्व महत् (बुद्धि) ही है।
2. अहंकार (Ahamkara)– Ego / ‘मैं’ का भाव
महत् के बाद दूसरा तत्त्व है- अहंकार।
- मैं होने का अनुभव
- यह मैं हूँ और “यह मेरा है की भावना
अहंकार के कारण ही-
- मनुष्य स्वयं को शरीर और मन से जोड़ लेता है
- पहचान / व्यक्तित्व (Identity) बनता है
अहंकार तीन रूपों में कार्य करता है—
| अहंकार का प्रकार | गुण | परिणाम |
| सात्त्विक अहंकार | सत्त्व प्रधान | मन, इंद्रियाँ |
| राजसिक अहंकार | रजस् प्रधान | क्रिया और इच्छाएँ |
| तामसिक अहंकार | तमस् प्रधान | तन्मात्राएँ और पंचमहाभूत |
3. तन्मात्राएँ (Tanmatras) – पाँच सूक्ष्म मूल तत्व
अहंकार से आगे जो तत्त्व उत्पन्न होते हैं, उन्हें तन्मात्राएँ कहा जाता है। ये सूक्ष्म तत्व हैं यानी आँख से दिखाई नहीं देते, लेकिन इनके आधार पर दुनिया बनती है।
पाँच तन्मात्राएँ-
| तन्मात्रा | संबंधित गुण | बाद में किसका निर्माण करती है |
| शब्द (Sound) | श्रवण | आकाश |
| स्पर्श (Touch) | त्वचा | वायु |
| रूप (Form / Color) | दृष्टि | अग्नि |
| रस (Taste) | जिह्वा | जल |
| गंध (Smell) | घ्राण | पृथ्वी |
इन्हीं पाँच तन्मात्राओं से आगे चलकर पंचमहाभूत बनते हैं।
प्रकृति + पुरुष का संयोग
↓
महत् (बुद्धि)
↓
अहंकार (मैं की भावना)
↓
तन्मात्राएँ (5 सूक्ष्म तत्व)
↓
पंचमहाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी)
↓
शरीर, मन, संसार — सबकी रचना
पंचमहाभूत सिद्धांत (Five Great Elements Theory)
पंचमहाभूत सिद्धांत तो दोस्तों अगर आपने तन्मात्रा को अच्छे से समझ लिया है तो आपको पंचमहाभूत तुरंत समझ आ जायगा। सांख्य दर्शन कहता है कि हम जो भी दुनिया में देखते हैं जैसे शरीर, पेड़, पहाड़, घर, आदि ये सब पाँच मूल भौतिक तत्त्वों(आकाश, हवा, आग/रोशनी, पानी, मिट्टी) से बनी है। और इन्हीं 5 तत्वों को पंचमहाभूत कहा जाता है
ये पाँचों तत्व तन्मात्राओं से उत्पन्न होते हैं, और इन्हीं से शरीर, वस्तुएँ, प्रकृति, ग्रह, ब्रह्माण्ड सब निर्मित होते हैं।
पाँच महाभूत
| महाभूत | गुण (Property) | स्रोत (किस तन्मात्रा से उत्पन्न) |
| आकाश (Ether / Space) | शब्द (Sound) | शब्द तन्मात्रा |
| वायु (Air) | स्पर्श (Touch) | स्पर्श तन्मात्रा |
| अग्नि (Fire) | रूप (Form / Color) | रूप तन्मात्रा |
| जल (Water) | रस (Taste) | रस तन्मात्रा |
| पृथ्वी (Earth) | गंध (Smell) | गंध तन्मात्रा |
ये पाँच महाभूत आते कहाँ से हैं?
तो भाई इस सांख्य दर्शन में सृष्टि बनने का एक क्रम बताया गया है। पहले प्रकृति से धीरे-धीरे विकास (Evolution) होता है। मतलब पहले सबसे छोटी चीज बनती है और बाद में उसी से बड़ी चीज बन जाती है
- पहले सूक्ष्म (Subtle) → फिर स्थूल (Gross)
अब समझो तन्मात्रा किसी भी चीज का सबसे सूक्ष्म गुण (Subtle Quality) होता है और तन्मात्राओं से ही पंचमहाभूत बनते हैं। इसके पहले आपने table देखा होगा जिसमें ‘शब्द तन्मात्रा’ से आकाश बनता है, स्पर्श से वायु, रूप से अग्नि/तेज, …. .
अब बस इतना समझो की पंचमहाभूत में हर महाभूत में गुण बढ़ते जाते हैं।(मतलब पहले वाले महाभूत का गुण अपने अंदर ले लेते हैं।) जैसे –
- आकाश → शब्द
- वायु में = शब्द + स्पर्श
- अग्नि में = शब्द + स्पर्श + रूप
- जल में = शब्द + स्पर्श + रूप + रस
- पृथ्वी में = शब्द + स्पर्श + रूप + रस + गंध
इसलिए पृथ्वी को सबसे पूर्ण (सबसे ज्यादा गुण वाला) स्थूल तत्त्व माना जाता है।
सांख्य दर्शन के अनुसार पूरी भौतिक सृष्टि 5 महाभूतों से बनी है,
और ये 5 महाभूत पहले बनी 5 तन्मात्राओं से उत्पन्न होते हैं।
क्या आपने कभी सोचा भी है कि आग लगने पर आपने पानी से बुझाया होगा, लेकिन क्या बाढ़ आने पर आपने भी आपने आग का ईस्तेमाल करके उसे रोकने की कोशिश क्यों नहीं की ?? आज तो आपको समझ आ ही गया होगा कि मिट्टी (पृथ्वी) ही एक ऐसा तत्व है जिससे आग को शांत किया जाता है, जैसे –
- आग लगने पर हम पानी से भी बुझाते हैं, लेकिन कई बार खेतों में आग को तुरंत रोकने के लिए मिट्टी डालकर या ट्रैक्टर से मिट्टी की लाइन बनाकर आग का रास्ता रोक दिया जाता है।
बाढ़ को भी रोका जाता है,जैसे –
- नहरों के किनारे रिसाव होने पर बोरे में मिट्टी भरकर उसे रोका जा सकता है।
पहाड़ों की वजह से हवाएँ रास्ता बदलती हैं, जैसे –
- हिमालय उत्तर से आने वाली ठंडी और शुष्क हवाओं (साइबेरिया और मध्य एशिया से) को भारत में प्रवेश करने से रोकता है।
आवाज भी गूंजते हैं जैसे– जब हम बोलते हैं, तो हमारी आवाज़ ध्वनि तरंगों के रूप में चारों ओर फैलती है। अगर सामने कोई बड़ी, कठोर और चिकनी सतह (जैसे पहाड़, इमारत, दीवार) हो, तो ये तरंगें उससे टकराकर वापस लौटती हैं। मतलब कि सभी quality इसी(धरती) में है।
पंचमहाभूत के क्रम में आग तीसरे नंबर पर है और पानी 4, मतलब पानी में 1 quality अधिक है इसी वजह से आग को पानी से कंट्रोल कर सकते हैं लेकिन आग से पानी को नहीं।
कारण–कार्य संबंध (सत्कार्यवाद) –
देखो कारण (Cause) और कार्य (Effect) के संबंध को समझाने के लिए “सत्कार्यवाद” सिद्धांत दिया गया है। सत्कार्यवाद का अर्थ है – सत् + कार्य + वाद
- सत् = जो पहले से मौजूद है
- कार्य = परिणाम / effect
- वाद = सिद्धांत
जिसका मतलब है कार्य (Effect) कारण (Cause) में पहले से ही मौजूद होता है।(कार्य “नई चीज़” बनकर नहीं आता, बल्कि कारण के अंदर छिपा हुआ रूप प्रकट हो जाता है।) चलो उदाहरण से समझते हैं –
- जैसे हमें दूध से दही बनाना है तो दही कोई अलग नई वस्तु नहीं है ब्लकि दूध का ही परिवर्तित रूप है। जिसका अर्थ यहि हुआ कि दूध में दही पहले से ही मौजूद थी।
- अब मिट्टी का घड़ा बनाना है तो घड़ा हमारा कार्य और मिट्टी कारण हुआ, अब देखो घड़ा मिट्टी में पहले से मौजूद है, कुम्हार ने बस उसे आकार देकर प्रकट कर दिया है।
सांख्य दर्शन के अनुसार कुछ भी बिना कारण के पैदा नहीं हो सकता। और जो चीज़ बिल्कुल नहीं है (असत्), वह अचानक हो नहीं सकती।
असत् से सत् की उत्पत्ति नहीं होती।
(जो नहीं है, वह पैदा नहीं हो सकता)
सत्कार्यवाद की मुख्य बातें
- कार्य कारण में पहले से विद्यमान रहता है।
- उत्पत्ति का मतलब “नया बनना” नहीं, बल्कि “प्रकट होना” है।
- कारण और कार्य एक ही वस्तु के दो रूप हैं।
- सृष्टि का निर्माण “परिवर्तन” से होता है, creation from nothing से नहीं।
- प्रकृति कारण है और पूरा जगत उसका कार्य (परिणाम) है।
सांख्य दर्शन के अनुसार सृष्टि का हर कार्य पहले से प्रकृति में मौजूद था,
बस समय आने पर वह विकसित होकर दिखाई देता है।
25 तत्व कौन कौन सा है?
अगर आप लोगों ने सभी सिद्धांतों को सही से पढा है तो आप तुरंत पहचान जाओगे इन 25 तत्वों को –
- पुरुष
- प्रकृति
- अन्तःकरण(Mind System)
- महत् / बुद्धि
- अहंकार
- मन
- ज्ञानेंद्रियाँ
- चक्षु (आँख)
- कर्ण (कान)
- घ्राण (नाक)
- रसना (जीभ)
- त्वचा
- कर्मेंद्रियाँ
- वाक् = बोलना
- पाणि (हाथ) = पकड़ना/काम करना
- पाद (पैर) = चलना
- पायु = मल त्याग
- उपस्थ = प्रजनन
- तन्मात्राएँ
- शब्द तन्मात्रा
- स्पर्श तन्मात्रा
- रूप तन्मात्रा
- रस तन्मात्रा
- गंध तन्मात्रा
- पंचमहाभूत(आकाश, वायु, अग्नि/तेज, जल, पृथ्वी)
सांख्य दर्शन के प्रमुख ग्रंथ
1 पुरुष + 1 प्रकृति + 3 अन्तःकरण + 5 ज्ञानेंद्रियाँ + 5 कर्मेंद्रियाँ + 5 तन्मात्राएँ + 5 महाभूत = 25तत्व
| ग्रंथ / स्रोत | लेखक / संबद्ध आचार्य | महत्व (क्यों जरूरी है?) |
| सांख्यकारिका | ईश्वरकृष्ण | सांख्य का सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ, 25 तत्त्व और मुख्य सिद्धांत व्यवस्थित रूप में |
| सांख्यसूत्र | कपिल मुनि (परंपरागत मान्यता) | सूत्र शैली में सांख्य का वर्णन, पर विद्वानों के अनुसार बाद में विकसित रूप |
| तत्त्वसमास | अज्ञात / परंपरागत | 25 तत्त्वों का संक्षिप्त सार (Short outline) |
| गौड़पाद भाष्य | गौड़पाद | सांख्यकारिका पर प्रमुख टीका, कठिन बातें सरल होती हैं |
| टीका/व्याख्या commentary/explanation | वाचस्पति मिश्र | सांख्य के सिद्धांतों का विस्तार और दार्शनिक व्याख्या |
| टीका/व्याख्या commentary/explanation | विज्ञानभिक्षु | सांख्य और योग के संबंध को जोड़कर समझाने में मदद |
| उपनिषद | वैदिक ऋषि परंपरा | आत्मा, ज्ञान, मुक्ति जैसे विचारों की दार्शनिक पृष्ठभूमि |
| महाभारत (विशेषकर शांति पर्व) | वेदव्यास | सांख्य के विचारों का विस्तृत उल्लेख, प्रकृति–पुरुष आदि |
| भगवद्गीता | श्रीकृष्ण (महाभारत का भाग) | सांख्य” शब्द का प्रयोग, ज्ञान और योग से संबंध |
| भागवत पुराण | पुराण परंपरा | कपिल मुनि के उपदेश और सांख्य विचारों का धार्मिक संदर्भ |
आधुनिक दृष्टि से सांख्य दर्शन का महत्व
आज के समय में सांख्य दर्शन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जीवन और मन को तर्क और विश्लेषण से समझाता है। यह हमें बताता है कि दुख का कारण अविवेक है और सही ज्ञान से मुक्ति मिलती है। साथ ही मन–बुद्धि–अहंकार की जो व्याख्या सांख्य में मिलती है, वह आज के stress, overthinking और ego problems को समझने में भी मदद करती है। इसलिए आधुनिक जीवन में संतुलन, आत्म-ज्ञान और मानसिक शांति के लिए सांख्य दर्शन आज भी उपयोगी है।
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