जब हम अपने देश के इतिहास का अध्ययन करते हैं, तो हमें अलग-अलग क्षेत्रों और राजवंशों के बारे में जानकारी मिलती है। कहीं उत्तर में शक्तिशाली साम्राज्य दिखाई देते हैं, तो कहीं दक्कन और दक्षिण में बड़े-बड़े राजवंशों का उदय होता है। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि हमारे प्राचीन भारत को किन-किन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है और इन क्षेत्रों की क्या विशेषताएँ थीं।
भारत का विभाजन मुख्य रूप से दो दृष्टिकोणों से किया जाता है —
- पहला भौतिक भूगोल के आधार पर,
- और दूसरा ऐतिहासिक दृष्टिकोण से
हमने अपने कई लेखों में अलग अलग राजवंशों और क्षेत्रों का उल्लेख किया है। लेकिन किसी भी राजवंश या क्षेत्र के इतिहास को अच्छी तरह समझने के लिए पहले भारत के इस भौगोलिक और ऐतिहासिक विभाजन को जानना आवश्यक है। तो चलिए देखते हैं –
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भारत का भौतिक भूगोल (Physical Geography) के आधार पर विभाजन
अपना देश(भारत) एक विशाल देश है, जो अलग-अलग जगहों बदला हुआ है जैसे- कहीं ऊँचे-ऊँचे पर्वत हैं, तो कहीं मैदान, पठार, तटीय क्षेत्र और द्वीप दिखाई देते हैं। इसी चीज को समझने के लिए भूगोलविदों ने देश को उसकी प्राकृतिक विशेषताओं के आधार पर विभिन्न भागों में विभाजित किया है। इसे भारत का भौतिक भूगोल (Physical Geography) कहा जाता है।
भूगोलविदों ने भूगोल के आधार पर अपने देश को मुख्यतः छह भागों में बाँटा जाता है—
- हिमालयी क्षेत्र,
- उत्तरी मैदान,
- मध्यवर्ती उच्चभूमि,
- दक्कन का पठार,
- तटीय मैदान
- और द्वीपीय क्षेत्र
इन सभी क्षेत्रों की अपनी अलग विशेषताएँ हैं, जो हमारे इतिहास की, संस्कृति, कृषि, व्यापार और मानव जीवन को प्रभावित करती हैं।

1. हिमालयी क्षेत्र
देश के उत्तरी भाग में स्थित एक विशाल पर्वतीय क्षेत्र है। इसे विश्व की सबसे ऊँची पर्वत श्रृंखला माना जाता है। यह क्षेत्र जम्मू-कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैला हुआ है। हिमालय न केवल हमारी प्राकृतिक सीमा का कार्य करता है, बल्कि देश की जलवायु को भी प्रभावित करता है। गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी अनेक महत्वपूर्ण नदियों का उद्गम भी इसी क्षेत्र से होता है।
2. उत्तरी मैदान
उत्तरी मैदान देश का सबसे उपजाऊ क्षेत्र माना जाता है। इसका निर्माण सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी से हुआ है। यह क्षेत्र पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के बड़े भागों में फैला हुआ है। उपजाऊ भूमि और जल की उपलब्धता के कारण प्राचीन काल से ही यहाँ अनेक सभ्यताओं और राज्यों का विकास हुआ।
3. मध्यवर्ती उच्चभूमि
मध्यवर्ती उच्चभूमि, हिमालय और दक्कन के पठार के बीच स्थित क्षेत्र है। इसमें मालवा का पठार, बुंदेलखंड, बघेलखंड तथा विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाएँ शामिल हैं। यह क्षेत्र उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करता रहा है। प्राचीन काल में कई व्यापारिक मार्ग भी इसी क्षेत्र से होकर गुजरते थे।
4. दक्कन का पठार
दक्कन का पठार हमारे देश के दक्षिणी भाग का सबसे बड़ा पठारी क्षेत्र है (यदि कोई जमीन आसपास के क्षेत्रों से ऊँची हो, लेकिन उसका ऊपरी हिस्सा काफी हद तक सपाट हो, तो उसे पठार कहते हैं)। यह नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित है और महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश के बड़े भागों में फैला हुआ है। इसकी मिट्टी मुख्य रूप से काली मिट्टी है, जो कृषि के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
5. तटीय मैदान
देश के समुद्र तटों के किनारे स्थित क्षेत्रों को तटीय मैदान कहा जाता है। इन्हें दो भागों में बाँटा जाता है – पश्चिमी तटीय मैदान और पूर्वी तटीय मैदान। प्राचीन काल में ये क्षेत्र समुद्री व्यापार के प्रमुख केंद्र थे। विदेशी व्यापार और सांस्कृतिक संपर्कों में इन तटीय क्षेत्रों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
6. द्वीपीय क्षेत्र
भारत के द्वीपीय क्षेत्रों में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप शामिल हैं। ये द्वीप समुद्र के बीच स्थित हैं और सामरिक(रणनीति (Strategy) या युद्ध एवं सुरक्षा से संबंधित) तथा व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाते हैं। अभी के समय में भी इनका महत्व है ये हमारे देश की समुद्री सीमाओं को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विभाजन
अब अगर इतने बड़े देश के इतिहास को सिर्फ उसकी भौगोलिक संरचना के आधार पर जानने की कोशिश करोगे तो ये सम्भव नहीं है, इसीलिये इतिहासकारों ने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी क्षेत्रों का विभाजन किया। इसका उद्देश्य यह समझना था कि अलग-अलग क्षेत्रों में कौन-सी संस्कृतियाँ विकसित हुईं, किन राजवंशों ने शासन किया, व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्क कैसे स्थापित हुए तथा समय के साथ इन क्षेत्रों का राजनीतिक विकास किस प्रकार हुआ।
उदाहरण– दक्कन का पठार भौगोलिक दृष्टि से एक प्राकृतिक क्षेत्र है, लेकिन इतिहास में “दक्कन” शब्द केवल एक पठार तक सीमित नहीं है, यह एक ऐसे क्षेत्र के रूप में सामने है जिसकी अपनी राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान थी।
- पठार = ऊँची + सपाट जमीन
आइए अब इन प्रमुख ऐतिहासिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों के बारे में विस्तार से जानते हैं।

- उत्तर भारत (Northern India) – गंगा-यमुना का मैदान, पंजाब, राजस्थान, कश्मीर आदि।
- मध्य भारत (Central India) – मालवा, बुंदेलखंड, बघेलखंड, छत्तीसगढ़ आदि।
- दक्कन (Deccan Region) – नर्मदा नदी के दक्षिण का पठारी क्षेत्र, मुख्यतः महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के भाग।
- सुदूर दक्षिण भारत (Far South India) – तमिलनाडु, केरल तथा दक्षिणी कर्नाटक के कुछ भाग; प्राचीन काल में इसे द्रविड़ क्षेत्र भी कहा जाता था।
- तटीय क्षेत्र (Coastal Region) – पश्चिमी और पूर्वी तटीय मैदान, जहाँ समुद्री व्यापार और विदेशी संपर्क का विशेष विकास हुआ।
| क्षेत्र | प्रमुख राजवंश |
|---|---|
| उत्तर भारत | मौर्य, शुंग, कण्व, गुप्त |
| मध्य भारत | नाग, वाकाटक आदि |
| दक्कन | सातवाहन, चालुक्य, राष्ट्रकूट |
| सुदूर दक्षिण भारत | चोल, चेर, पांड्य, पल्लव |
| तटीय क्षेत्र | विभिन्न समुद्री व्यापारिक राज्य |
ध्यान देने वाली बात यह है कि यह कोई आधिकारिक या हमेशा माना जाने वाला विभाजन नहीं है।
प्राचीन इतिहासकारों या ग्रंथकारों ने “उत्तर, मध्य, दक्कन, सुदूर दक्षिण भारत” जैसी आधुनिक headings नहीं बनाई थीं। लेकिन उन्होंने ऐसे क्षेत्रों का उल्लेख अलग-अलग नामों से किया था, जैसे:—
| आर्यावर्त | उत्तर भारत के लिए |
| मध्यदेश | गंगा-यमुना क्षेत्र के लिए |
| दक्षिणापथ | दक्कन और दक्षिण भारत के लिए |
| द्रविड़ देश | दक्षिण के कुछ क्षेत्रों के लिए |
बाद में 19वीं और 20वीं शताब्दी के इतिहासकारों ने, जब भारतीय इतिहास को व्यवस्थित ढंग से लिखना शुरू किया, तो अध्ययन को सरल बनाने के लिए North India, Central India, Deccan, Far South India जैसे विभाजनों का उपयोग किया।
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