दोस्तों आज हम प्राचीन इतिहास के एक महत्तवपूर्ण हिस्से को cover करने वाले हैं जो comptative exams की दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। उपनिषद वाले ब्लॉग को रोककर हमने इस पर काम किया है। इसमे आपको सबसे पहले बाहरी चीजों के बारे में जानकारी दी जायगी उसके बाद इस ब्लॉग के मुख्य भाग अद्वैत वेदांत को समझाया जायगा इसीलिए आप बस ब्लॉग को पूरा पढ़िए, ब्लॉग के अंत तक आपके सभी doubts clear हो जाएंगे तो चलिए सुरु करते हैं —
आदि शंकराचार्य— आज हम बात करेंगे उस महान संत की, जिन्होंने पूरे भारतवर्ष को एकता के सूत्र में बाँधने का काम किया — आदि शंकराचार्य जी की। अगर आप दर्शन(Philosophy) को समझना चाहते हैं, तो शंकराचार्य जी को जानना जरूरी है। तो चलो इन के बारे में थोड़ा जानने का प्रयास करते हैं। आदि शंकराचार्य जी का जन्म लगभग 788 ई(C.E.). में केरल के एक छोटे से गाँव कालड़ी में हुआ था, उनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम आर्यांबा था। वे बचपन से ही बहोत बुद्धिमान थे उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने बहुत कम उम्र में ही वेदों का अध्ययन कर लिया था।
एक बार उन्होंने अपनी माँ से संन्यास लेने की अनुमति मांगी। लेकिन उनकी मम्मी ने शर्त रखी— कि अगर तुम्हें कोई बड़ा उद्देश्य मिले तो तुम सन्यास ले सकते हो। और फिर एक दिन उन्हें नर्मदा नदी के तट पर गोविंद भगवत्पाद जैसे महान गुरु मिले। उसके बाद से उनकी आध्यात्मिक यात्रा शुरू हुई।
Contents
- 1 भारत भ्रमण और मठ स्थापना
- 2 क्या आदि शंकराचार्य जी ने संन्यास लेते ही मठों की स्थापना शुरू कर दी?
- 3 यात्रा का उद्देश्य ‐-
- 4 मठ का उद्देश्य –
- 5 आदि शंकराचार्य द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथ
- 6 दर्शन ग्रंथ (तत्वज्ञान पर आधारित)
- 7 भक्ति ग्रंथ (स्तोत्र और स्तुति)
- 8 तर्क और विवेचन ग्रंथ
- 9 जिन ग्रंथों पर विद्वानों में मतभेद है
- 10 अद्वैत वेदांत-
- 11 अद्वैत वेदांत का अर्थ क्या होता है?
- 12 अद्वैत शब्द शंकराचार्य जी को कहाँ से मिला, क्या उन्होंने बनाया??
- 13 अद्वैत वेदांत के प्रमुख सिद्धांत —
- 14 ब्रह्म के दो रूप—
- 15 जीव–ब्रह्म ऐक्य (एकता का सिद्धांत)
- 16 क्या अद्वैत वेदांत के जैसी और भी Philosophy नहीं है??
- 17 अद्वैत वेदांत (Advaita Vedanta)– आदि शंकराचार्य (8वीं सदी ई.)
- 18 विशिष्टाद्वैत वेदांत (Vishishtadvaita Vedanta)– रामानुजाचार्य (11वीं सदी ई.)
- 19 द्वैत वेदांत (Dvaita Vedanta)– माधवाचार्य (13वीं सदी ई.)
- 20 इसके अतिरिक्त –
- 21 शंकराचार्य के इस Philosophy के प्रभाव —
- 22 आदि शंकराचार्य कौन थे?
- 23 अद्वैत वेदांत दर्शन क्या है?
- 24 आदि शंकराचार्य ने कौन-कौन से ग्रंथ लिखे थे?
- 25 आदि शंकराचार्य ने कितने मठ स्थापित किए थे?
- 26 अद्वैत वेदांत का मुख्य उद्देश्य क्या है?
- 27 अद्वैत वेदांत और द्वैत वेदांत में क्या अंतर है?
- 28 अद्वैत वेदांत का भारतीय समाज पर क्या प्रभाव पड़ा?
- 29 अद्वैत वेदांत का सबसे प्रसिद्ध वाक्य कौन-सा है?
- 30 Like this:
भारत भ्रमण और मठ स्थापना
मात्र 16 वर्ष की आयु में ही वे पैदल अपने पूरे देश की यात्रा पर निकल गए, उनका मुख्य उद्देश्य अद्वैत वेदांत सिद्धांत का प्राचार-प्रसार करना और सभी धर्म जो हैं तो एक ही, लेकिन अलग अलग बिखरे हुए हैं उनको एकजुट करना। शंकराचार्य जी ने चार मठों की स्थापना किए जो कि निम्न हैं —
| मठ का नाम | स्थान | दिशा | प्रमुख शिष्य |
|---|---|---|---|
| शृंगेरी शारदा पीठ | शृंगेरी (कर्नाटक) | दक्षिण | सुरेश्वराचार्य |
| द्वारका शारदा पीठ | द्वारका (गुजरात) | पश्चिम | हस्तामलकाचार्य |
| ज्योतिर्मठ (ज्योति पीठ) | बद्रीनाथ (उत्तराखंड) | उत्तर | टोटकाचार्य |
| गोवर्धन मठ (पुरी पीठ) | पुरी (ओडिशा) | पूर्व | पद्मपादाचार्य |
| संबंधित वेद | महावाक्य (वेद से लिया गया) | अर्थ |
|---|---|---|
| यजुर्वेद | अहं ब्रह्मास्मि | “मैं ही ब्रह्म हूँ” — आत्मा और ब्रह्म एक हैं। |
| सामवेद | तत्त्वमसि | “तू वही है” — आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं। |
| अथर्ववेद | अयमात्मा ब्रह्म | “यह आत्मा ही ब्रह्म है” — आत्मा ब्रह्म का ही स्वरूप है। |
| ऋग्वेद | प्रज्ञानं ब्रह्म | “ज्ञान ही ब्रह्म है” — चेतना ही परम सत्य है। |
क्या आदि शंकराचार्य जी ने संन्यास लेते ही मठों की स्थापना शुरू कर दी?
नहीं यार, देखो सन्यास लेने के बाद सबका पहला उद्देश्य ज्ञान को प्राप्त करके सत्य की खोज करना ही रहता है जैसे हमारे गौतम बुद्ध भी सत्य की खोज में निकल गए थे। तो शंकराचार्य जी ने भी सबसे पहले यही किया और फिर अपने गुरु से दीक्षा लेकर काशी, हिमालय, और समझो घूमने निकल गए। अब हमारे आपके जैसे तो हैं नहीं कि बिना किसी मकसद के निकलेंगे तो……
यात्रा का उद्देश्य ‐-
अब आप बताओ अगर आप अच्छा क्रिकेट खेलते हो अपने आस-पास तो क्या आप हमेशा अपने पास ही खेलोगे, नहीं न?? हमारी बात आप समझ गए होंगें, चलो आगे बढ़ते हैं तो भाई इनके यात्रा का भी मुख्य उद्देश्य अपने ज्ञान को बढ़ाना और सामने वाले को हराना ही था। इन्होंने बौद्ध, जैन, सांख्य, मीमांसा आदि दर्शनों(philosopher) से शास्त्रार्थ किए ,और जब इन्हें लगा कि हमारा अद्वैत वेदांत सिद्धांत ही best है तब इन्होंने इस सिद्धांत को देश भार में फैलाने और लोगों को जागरूक करने के लिए चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना किए।
मठ का उद्देश्य –
शंकराचार्य जी को पहले से पता था कि भाई सिर्फ ग्रंथ लिखने से काम नहीं चलने वाला है इसीलिए उन्होंने वेदों और वेदांत की रक्षा करने के लिए हर एक वेद को एक मठ और वेदांत के साथ रखा और हर मठ में 1 शंकराचार्य नियुक्त किया जो अपने उस क्षेत्र मे धर्म और वेदांत का प्राचार प्रसार करके उन्हें सुरक्षित कर सके।
इन मठों के माध्यम से शंकराचार्य ने एक आध्यात्मिक नेटवर्क खड़ा कर किया, जो आज भी उसी तरह से है और भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी कह सकते हैं।
आदि शंकराचार्य द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथ
दर्शन ग्रंथ (तत्वज्ञान पर आधारित)
| ग्रंथ का नाम | विषय | अनुमानित रचना काल |
|---|---|---|
| ब्रह्मसूत्र भाष्य | वेदांत दर्शन की व्याख्या | 8वीं शताब्दी |
| उपनिषद भाष्य | प्रमुख उपनिषदों की टीका (ईश, केन, कठ, मुण्डक आदि) | 8वीं शताब्दी |
| भगवद्गीता भाष्य | गीता के श्लोकों की अद्वैत दृष्टि से व्याख्या | 8वीं शताब्दी |
| उपदेशसाहस्री | अद्वैत वेदांत का सार, पद्य और गद्य रूप में | 8वीं शताब्दी |
भक्ति ग्रंथ (स्तोत्र और स्तुति)
| ग्रंथ का नाम | विषय | विशेषता |
|---|---|---|
| शिवानंद लहरी | भगवान शिव की स्तुति | भक्ति और अद्वैत का समन्वय |
| सौंदर्य लहरी | देवी पार्वती की स्तुति | तांत्रिक और अद्वैत तत्वों का मिश्रण |
| गोविंदाष्टकं | भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति | सरल भाषा में भक्ति रस |
| मोक्षमुक्ति स्तोत्र | मोक्ष की प्राप्ति हेतु प्रार्थना | अद्वैत भाव से युक्त |
तर्क और विवेचन ग्रंथ
| ग्रंथ का नाम | विषय | उद्देश्य |
|---|---|---|
| विवेकचूडामणि | आत्मा और अनात्मा का विवेक | साधकों को आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करना |
| आत्मबोध | आत्मज्ञान की प्रक्रिया | सरल भाषा में अद्वैत वेदांत की व्याख्या |
| तत्वबोध | अद्वैत वेदांत का परिचय | प्रारंभिक छात्रों के लिए उपयोगी मार्गदर्शन |
जिन ग्रंथों पर विद्वानों में मतभेद है
| ग्रंथ | स्थिति |
|---|---|
| सौन्दर्य लहरी, शिवानंद लहरी | परंपरा में शंकराचार्य से जुड़ी मानी जाती हैं, पर ऐतिहासिक रूप से प्रमाण अस्पष्ट |
| अपरोक्षानुभूति, प्रपञ्चसार, ललिता त्रिशती भाष्य | शैली और भाषा के आधार पर बाद की रचनाएँ मानी जाती हैं |
| दक्षिणामूर्ति स्तोत्र, गोविंदाष्टकं | शंकर परंपरा से संबंधित, पर निश्चित रूप से उनके नहीं कहे जा सकते |
अद्वैत वेदांत-
अब तक हमने जो भी पढा वो सब तो शंकराचार्य जी के बारे में था अब आइए समझते हैं इस ब्लॉग के मुख्य हिस्से को-
- अद्वैत वेदांत क्या होता है?
- महावाक्य क्या और कितने होते हैं ?
अद्वैत वेदांत का अर्थ क्या होता है?
आप सभी ने Philosophy का नाम तो सुना ही होगा यह भी वही है। अद्वैत दो शब्दों से मिलकर बना है — अ + द्वैत (अ का मतलब नहीं, द्वैत मतलब दो) और इस Philosophy के अनुसार ब्रह्म(सर्वोच्च सत्य) और आत्मा (व्यक्ति की आत्मा) दो अलग चीज़ें नहीं हैं, बल्कि दोनों एक ही हैं। और वेदांत मतलब वेदों का अंत यानी कि उपनिषद। यह शब्द वेदों और उपनिषदों में पहले से मौजूद था। जैसे –
- “अहं ब्रह्मास्मि” — मैं ब्रह्म हूँ
- “तत्त्वमसि” — तुम वही हो
अद्वैत शब्द शंकराचार्य जी को कहाँ से मिला, क्या उन्होंने बनाया??
नहीं यार, गोविंद भगवत्पाद को तो जानते ही होगे मैंने शुरूवात में ही बताया था जो स्वयं गौड़पादाचार्य जी के शिष्य थे।
तो जो गौड़पादाचार्य ने “माण्डूक्य कारिका” या “गौड़पाद कारिका” लिखी थी, जिसमें उन्होंने अद्वैत विचार के बारे में थोड़ा बहुत बताया था। शंकराचार्य को ये बिचार एक तरह से बोलो तो पसंद आ गया और उन्होंने इस Philosophy का अच्छे से अध्यन किया और इसका प्राचार-प्रसार कैसे किया ये तो मैंने पहले ही बता दिया है।
गौड़पादाचार्य का काल लगभग 6वीं से 7वीं शताब्दी ईस्वी (600–700 CE) के बीच।
आदि शंकराचार्य का काल माना जाता है– 8वीं शताब्दी ईस्वी (788–820 CE के आसपास)।
गौड़पादाचार्य → गोविन्द भगवत्पाद → आदि शंकराचार्य
अद्वैत वेदांत के प्रमुख सिद्धांत —
अद्वैत वेदांत के 5 प्रमुख तत्व हैं —
- ब्रम्हा (परम सत्य)– ब्रम्हा एक ही है, निराकार, निरगुण, अनंत और चारो तरफ फैला हुआ। वही सबका आधार भी है
- जीव (आत्मा)- ब्रह्म का प्रतिबिंब– आत्मा (जीव) ब्रह्म से अलग नहीं, बल्कि उसी की परछाई है। अगर अलग लगता है तो वह केवल हमारी अज्ञानता के कारण लगता है।
- जगत (संसार)-मिथ्या— यह संसार न तो पूरी तरह सत्य है (क्योंकि नाशवान है), न ही पूरी तरह असत्य (क्योंकि अनुभव में आता है)। इसलिए इसे “मिथ्या” कहा गया यानी प्रतीत होने वाला लेकिन अंतिम सत्य नहीं।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः
(अर्थात् — ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है, और जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं है)
तो भाई यह वाक्य किसी एक उपनिषद् या वेद मंत्र में नहीं है, बल्कि शंकराचार्य जी के अद्वैत वेदांत दर्शन का सार-सूत्र (summary statement) है, जो उन्होंने अपने भाष्यों (commentaries) के माध्यम से प्रतिपादित किया।
4. माया और अविद्या(भ्रम का कारण)— माया ही वह शक्ति है जिससे हमें एक ही ब्रह्म के अनेक रूप दिखाई देते हैं। जैसे रस्सी में साँप दिखना।
5. ज्ञान और मोक्ष– मोक्ष तो केवल ज्ञान से ही मिलता है, कर्म से नहीं। जब अज्ञान का अंत होता है, तो वही मोक्ष है।
ब्रह्म के दो रूप—
शंकराचार्य जी ने ब्रह्म के दो रूप बताए-
- निर्गुण ब्रह्म— गुणरहित, निराकार, शुद्ध चेतना (यह वास्तविक ब्रह्म है।)
- सगुण ब्रह्म (ईश्वर)— जब वही ब्रह्म माया से घिरा हुआ होता है तो ईश्वर कहलाता है।
जीव–ब्रह्म ऐक्य (एकता का सिद्धांत)
अद्वैत का मूल संदेश है —
- “जीव और ब्रह्म एक ही हैं।”
शंकराचार्य जी ने देखा कि लोग अलग-अलग देवताओं को पूजते हैं और आपस में लड़ते हैं। उन्होंने कहा—
“सब देवता एक ही ब्रह्म के रूप हैं। पूजा करो, लेकिन एकता मत भूलो।”
उन्होंने पंचायतन पूजा शुरू की — जिसमें शिव, विष्णु, गणेश, सूर्य और देवी — सबकी पूजा एक साथ होती थी।
शंकराचार्य तो चले गए, लेकिन उनके विचार जिंदा रहे। बहुत सालों बाद रामकृष्ण परमहंस आए — उन्होंने अद्वैत को अनुभव किया।
फिर आए स्वामी विवेकानंद — उन्होंने दुनिया को बताया
“हर आत्मा दिव्य है। तुम खुद ब्रह्म हो।”
अरविंद घोष, महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर — सबने शंकराचार्य के विचारों से प्रेरणा ली।
और यही बात शंकराचार्य जी चार महावाक्यों के माध्यम से लोगों को समझाने का प्रयास करते हैं।
- अहं ब्रह्मास्मि (बृहदारण्यक उपनिषद)– मैं ही ब्रह्म हूँ।
- तत्वमसि (छांदोग्य उपनिषद)– तू वही है (ब्रह्म ही है)।
- अयमात्मा ब्रह्म (माण्डूक्य उपनिषद)– यह आत्मा ही ब्रह्म है
- प्रज्ञानं ब्रह्म (ऐतरेय उपनिषद)– चेतना ही ब्रह्म है
क्या अद्वैत वेदांत के जैसी और भी Philosophy नहीं है??
अद्वैत वेदांत (Advaita Vedanta)– आदि शंकराचार्य (8वीं सदी ई.)
- इसके मुख्य ग्रंथ उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, भगवद गीता की व्याख्या
मुख्य विचार—
- ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है।
- जगत (दुनिया) माया है, अस्थायी है।
- आत्मा (जीव) और ब्रह्म में कोई भेद नहीं — “अहं ब्रह्मास्मि।”
विशिष्टाद्वैत वेदांत (Vishishtadvaita Vedanta)– रामानुजाचार्य (11वीं सदी ई.)
- रामानुजाचार्य और उनके अनुयायियों द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथ हैं- श्रीभाष्य, वेदांत सार / वेदांत दीप, गीता-भाष्य, वेदांत-संग्रह, नित्य ग्रंथ।
मुख्य विचार—
- “ब्रह्म जीव-जगत्-विशिष्टं एकमेव अद्वितीयम्।” अर्थात “जीव और जगत से विशिष्ट ब्रह्म ही एकमात्र अद्वितीय सत्य है।”
- ब्रह्म ही सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन जीव और जगत उसके अंश हैं।
- जीव अलग होते हुए भी ब्रह्म में स्थित है, जैसे शरीर में आत्मा।
- मुक्ति भक्ति (भक्ति मार्ग) से मिलती है।
- जीव ब्रह्म का अंश है, पूर्ण नहीं।
द्वैत वेदांत (Dvaita Vedanta)– माधवाचार्य (13वीं सदी ई.)
माधवाचार्य अत्यंत विद्वान और prolific लेखक थे। उन्होंने 37 प्रमुख ग्रंथ लिखे माने जाते हैं। उनमें से सबसे प्रसिद्ध हैं– ब्रह्मसूत्र-भाष्य, भगवद्गीता-तात्पर्य, उपनिषद-भाष्य, तत्त्वविवेक, तत्त्वमुक्ताकलाप, अनुव्याख्यान।
मुख्य विचार—
- ब्रह्म जीवजगत् भिन्नम्। [ब्रह्म (ईश्वर), जीव और जगत— ये तीनों सदा से एक-दूसरे से भिन्न हैं।]
- ईश्वर जीव भेद– ईश्वर और आत्मा अलग हैं।
- ईश्वर जगत भेद– ईश्वर और जगत अलग हैं।
- जीव जीव भेद– सभी आत्माएँ आपस में भिन्न हैं।
- जीव जगत भेद– आत्मा और जगत भिन्न हैं।
- जगत जगत भेद– पदार्थ एक-दूसरे से भिन्न हैं।
यही पाँच भेद “द्वैत वेदांत” की नींव हैं।
इसके अतिरिक्त –
कई अन्य उपशाखाएँ भी बाद में विकसित हुईं, जैसे —
- शुद्धाद्वैत वेदांत – वल्लभाचार्य
- द्वैताद्वैत वेदांत – निम्बार्काचार्य
- अचिन्त्य भेदाभेद वेदांत – चैतन्य महाप्रभु
परंतु मुख्य तीन (अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत) को ही वेदांत दर्शन की मूल धारा माना जाता है।
शंकराचार्य के इस Philosophy के प्रभाव —
आदि शंकराचार्य ने हमारी संस्कृति को समझो पुनर्जीवित किया है। जब हमारे देश की पुरानी वैदिक परंपरा धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही थी। जगह-जगह संप्रदायों में बिखराव, कर्मकांडों का बोझ, और बौद्ध-जैन धर्म का प्रभाव बढ़ रहा था। लोग वेदों की भाषा भूलने लगे थे, और आत्मा-ब्रह्म की बातें किताबों तक सीमित हो गई थीं। तब एक महान व्यक्ति आया उसने अकेले ही पूरे भारत देश की यात्रा की और जहां भी गये वहाँ-वहाँ शास्त्रार्थ किया। बौद्धों से, जैनों से, मीमांसकों से- सबको तर्क और अनुभव से समझाया कि
“आत्मा और ब्रह्म अलग नहीं हैं — दोनों एक ही हैं।”
आज जब हम सोचते हैं — “मैं कौन हूँ?”, क्या सबमें एक ही आत्मा है?, क्या धर्म हमें बाँटता है या जोड़ता है?— तो एक आवाज भीतर से आती है
“तत्त्वमसि” — तुम वही हो।
और ये आवाज किसी और की नहीं ब्लकि शंकराचार्य जी की ही है।
इस ब्लॉग में हमने मुख्य रूप से अद्वैत वेदांत को समझाया है, लेकिन इसके साथ-साथ विशिष्टाद्वैत और द्वैत वेदांत का भी उल्लेख किया गया है ताकि आप तीनों प्रमुख वेदांत दर्शन की आपसी तुलना को आसानी से समझ सकें।
अगर आपको यह ब्लॉग पसंद आया हो, तो इसे अपने दोस्तों और साथी विद्यार्थियों के साथ जरूर साझा करें।
नीचे comment में बताएं कि आपको अद्वैत वेदांत का कौन-सा भाग सबसे ज़्यादा रोचक लगा।
हमारा अगला ब्लॉग “उपनिषदों के दर्शन” पर होगा, इसलिए जुड़े रहें हमारे साथ —
👉 aryahistory.com
वेदों का विभाजन कब, क्यों और कैसे हुआ???
🕉️ भारतीय Philosophy का सम्पूर्ण वर्गीकरण (सभी शाखाओं सहित)
आदि शंकराचार्य कौन थे?
आदि शंकराचार्य 8वीं सदी के महान भारतीय philosopher और संत थे जिन्होंने अद्वैत वेदांत दर्शन का प्रचार किया। उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण कर चार प्रमुख मठों की स्थापना की और वैदिक परंपरा को एकता के सूत्र में बाँधने का काम किए।
अद्वैत वेदांत दर्शन क्या है?
अद्वैत वेदांत एक ऐसी Philosophy है जो कहता है कि ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, जगत मिथ्या है, और आत्मा ब्रह्म के समान ही है। इसका मुख्य सूत्र है — “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।”
आदि शंकराचार्य ने कौन-कौन से ग्रंथ लिखे थे?
उन्होंने ब्रह्मसूत्र भाष्य, गीता भाष्य, उपनिषद भाष्य, और विवेकचूड़ामणि जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे, जिनसे अद्वैत दर्शन की नींव मजबूत हुई थी।
आदि शंकराचार्य ने कितने मठ स्थापित किए थे?
उन्होंने भारत के चारों दिशाओं में चार मठ स्थापित किए —उत्तर में बद्रीनाथ (ज्योतिर्मठ), दक्षिण में श्रृंगेरी मठ, पूर्व में पुरी गोवर्धन मठ, और पश्चिम में द्वारका शारदा मठ।
अद्वैत वेदांत का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य यह समझाना है कि आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है — दोनों एक ही हैं। जब व्यक्ति इस सत्य को अनुभव कर लेता है, तभी मोक्ष प्राप्त होता है।
अद्वैत वेदांत और द्वैत वेदांत में क्या अंतर है?
अद्वैत वेदांत आत्मा और ब्रह्म को एक मानता है, जबकि द्वैत वेदांत (माधवाचार्य द्वारा प्रतिपादित) दोनों को अलग और स्वतंत्र मानता है।
अद्वैत वेदांत का भारतीय समाज पर क्या प्रभाव पड़ा?
इस दर्शन ने भारतीय समाज में आध्यात्मिक एकता, सहिष्णुता और ज्ञान की भावना को मजबूत किया। शंकराचार्य जी के विचारों से भारत में वैदिक परंपरा को नया जीवन मिला।
अद्वैत वेदांत का सबसे प्रसिद्ध वाक्य कौन-सा है?
इसका सबसे प्रसिद्ध वाक्य है — “अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ही ब्रह्म हूँ)। यह वाक्य आत्मा और परमात्मा की एकता को दर्शाता है।