नमस्कार दोस्तों, आज हम अपने इस ब्लॉग में गुप्त साम्राज्य के बारे में पढने वाले हैं इसके पहले हमने मौर्य वंश के 9 शासक | SSC Railway Notes अच्छे से पढा है आशा करता हूँ वह blog आप सभी को पसंद आया होगा।
तो दोस्तों गुप्त साम्राज्य को इतिहास में अक्सर बहुत ही खास माना गया है इसे ही हमारे भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है। क्यूँ कहा जाता है??इसे हम आगे समझेंगे।

Contents
- 1 गुप्त साम्राज्य की स्थापना
- 2 चंद्रगुप्त प्रथम राजा कैसे बने?
- 3 अब आपके दिमाग में सवाल आ गया होगा फिर सत्ता इतनी मजबूत कैसे बनी?
- 4 गुप्त वंश के सभी शासक
- 5 गुप्त साम्राज्य के प्रमुख शासकों के बारे में
- 6 1• चंद्रगुप्त प्रथम (320–335 ई.)
- 7 समुद्रगुप्त (335–375 ई.)
- 8 चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) (375–415 ई.)
- 9 स्कंदगुप्त (455–467 ई.)
- 10 गुप्त काल की प्रशासन व्यव्स्था
- 11 1. राजा और शासन व्यवस्था–
- 12 2. केंद्रीय प्रशासन (आज की केंद्र सरकार जैसा)–
- 13 3. प्रांतीय प्रशासन (आज के राज्यों जैसा)–
- 14 4. स्थानीय प्रशासन (गाँव और नगर स्तर)
- 15 5. न्याय व्यवस्था (आज के कोर्ट सिस्टम जैसा)
- 16 गुप्त काल में कला–साहित्य–विज्ञान का विकास
- 17 कला –
- 18 साहित्य–
- 19 विज्ञान–
- 20 इस काल की सामाजिक–आर्थिक स्थिति
- 21 गुप्त काल को स्वर्ण युग क्यूँ बोला जाता है??
- 22 गुप्त साम्राज्य का पतन
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गुप्त साम्राज्य की स्थापना
तो भाई गुप्त साम्राज्य की शुरूवात लगभग 320 ईस्वी में चंद्रगुप्त प्रथम ने किया था (चंद्रगुप्त मौर्य से अलग व्यक्ति है)
चंद्रगुप्त प्रथम राजा कैसे बने?
अब देखो अगर चन्द्रगुप्त मौर्य की बात करें तो उनके गुरु कौटिल्य का मानना था कि वे सड़क से उठाकर star बनाएंगे और उन्होंने बना दिया, लेकिन चन्द्रगुप्त प्रथम के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ है वे राजा के ही बेटे थे।
- उनके पिता का नाम था घटोत्कच
- श्रीगुप्त को इतिहासकार गुप्त वंश का संस्थापक मानते हैं
- लेकिन श्रीगुप्त छोटे क्षेत्र का शासक था, कोई बड़ा सम्राट नहीं
अब आपके दिमाग में सवाल आ गया होगा फिर सत्ता इतनी मजबूत कैसे बनी?
- विरासत में मिला छोटा राज्य
- मगध और उसके आसपास का क्षेत्र
- लेकिन शक्ति सीमित थी
- वैवाहिक राजनीति (Game Changer)
- लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह
- लिच्छवि गणराज्य बहुत शक्तिशाली था
- सेना, धन मिला, राजनीतिक वैधता मिली
- इसके बाद ही महाराजाधिराज
- इसी शक्ति के बल पर चंद्रगुप्त प्रथम ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की
अब बताओ अगर exam में question आ गया कि गुप्त साम्राज्य की स्थापना किसने की? और अगर option में श्रीगुप्त और चंद्रगुप्त प्रथम दोनों हों तो क्या सही उत्तर होगा?
- वंश का संस्थापक → श्रीगुप्त
- साम्राज्य का संस्थापक → चंद्रगुप्त प्रथम
गुप्त वंश के सभी शासक
| शासक का नाम | शाशन काल (लगभग) | प्रमुख तथ्य / योगदान (Exam Point) |
| श्रीगुप्त | 240–280 ई. | गुप्त वंश के प्रथम ज्ञात शासक, सीमित क्षेत्र |
| घटोत्कच | 280–320 ई. | संक्रमणकालीन शासक, “महाराज” की उपाधि |
| चंद्रगुप्त प्रथम | 320–335 ई. | गुप्त साम्राज्य की स्थापना, लिच्छवि विवाह, गुप्त संवत |
| समुद्रगुप्त | 335–375 ई. | भारत का नेपोलियन, प्रयाग प्रशस्ति, दिग्विजय |
| चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) | 375–415 ई. | स्वर्ण युग, शक क्षत्रपों का अंत, कालिदास |
| कुमारगुप्त प्रथम | 415–455 ई. | नालंदा विश्वविद्यालय, अश्वमेध यज्ञ |
| स्कंदगुप्त | 455–467 ई. | हूण आक्रमण रोके, अंतिम शक्तिशाली शासक |
| पुरुगुप्त | 467–473 ई. | साम्राज्य का पतन आरंभ |
| नरसिंहगुप्त (बालादित्य) | 473–476 ई. | हूण शासक मिहिरकुल पर विजय |
| कुमारगुप्त द्वितीय | 476–477 ई. | अल्पकालीन शासन |
| विष्णुगुप्त | 540–550 ई. | अंतिम गुप्त शासक |
गुप्त साम्राज्य के प्रमुख शासकों के बारे में
1• चंद्रगुप्त प्रथम (320–335 ई.)
तो भाई चन्द्रगुप्त प्रथम के बारे में हम काफी चीजों को इसी ब्लॉग में पढ चुके हैं इनके पिता, इनका विवाह, विवाह के बाद इन्हें महाराजाधिराज की उपाधि मिली। अब आइए थोड़ा और समझते हैं-
स्वयं को महाराजाधिराज घोषित किया एक स्वतंत्र और शक्तिशाली साम्राज्य की घोषणा की यही से गुप्त साम्राज्य की वास्तविक शुरुआत हुई, इसी समय से गुप्त संवत (320 ई.) की शुरुआत मानी जाती है।
समुद्रगुप्त (335–375 ई.)
देखो दोस्तों, अगर हम गुप्त साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली शासक की बात करें तो उसमें कोई शक नहीं कि वह समुद्रगुप्त ही था। उसने अपने शासनकाल में सबसे ज़्यादा ध्यान सैन्य शक्ति के विस्तार पर दिया और एक बहुत बड़ी व संगठित सेना तैयार की। लगातार विजयों और सैन्य अभियानों के कारण ही प्रसिद्ध इतिहासकार V. A. Smith ने उसे “भारत का नेपोलियन” कहा। समुद्रगुप्त केवल एक विजेता ही नहीं, बल्कि एक कुशल रणनीतिकार भी था।
समुद्रगुप्त के विजय अभियानों की जानकारी हमें प्रयाग प्रशस्ति से मिलती है, जिसकी रचना उसके दरबारी कवि हरिषेण ने की थी। उत्तर भारत में उसने कई छोटे-छोटे राज्यों को जीतकर उन्हें अपने साम्राज्य में मिला लिया, जबकि दक्षिण भारत में उसने दिग्विजय नीति अपनाई। इसका मतलब यह था कि वह दक्षिण के राजाओं को हराकर उनसे कर और अधीनता स्वीकार करवाता था, लेकिन उन्हें पूरी तरह अपने राज्य में नहीं मिलाता था। इसी नीति के कारण उसका साम्राज्य बहुत बड़ा और स्थिर बना।
हालाँकि समुद्रगुप्त को केवल युद्ध के लिए जानना गलत होगा। वह कला और संस्कृति का भी महान संरक्षक था। उसे संगीत और कविता में विशेष रुचि थी, जिसका प्रमाण उसके सिक्कों पर अंकित वीणा वादन करते हुए चित्र से मिलता है। उसने विद्वानों, कवियों और ब्राह्मणों को संरक्षण दिया, जिससे गुप्त काल की सांस्कृतिक उन्नति को मजबूत आधार मिला। इसी वजह से समुद्रगुप्त को न सिर्फ एक महान योद्धा, बल्कि एक आदर्श शासक भी माना जाता है।
चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) (375–415 ई.)
देखो दोस्तों समुद्रगुप्त के बाद गुप्त साम्राज्य को जिस शासक ने और अधिक ऊंचाइयों पर पहुंचाया, वह था चंद्रगुप्त द्वितीय, जिसे हम विक्रमादित्य के नाम से भी जानते हैं। उसके शासनकाल में गुप्त साम्राज्य न सिर्फ राजनीतिक रूप से मजबूत हुआ, बल्कि कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में भी अत्यधिक प्रगति हुई। इसी कारण इतिहासकार उसके समय को भारतीय इतिहास का “स्वर्ण युग” कहते हैं।
चंद्रगुप्त द्वितीय की सबसे बड़ी उपलब्धि पश्चिमी भारत के शक क्षत्रपों का अंत था। शक शासक व्यापारिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे गुजरात और मालवा पर नियंत्रण रखते थे। उन्हें हराकर चंद्रगुप्त द्वितीय ने गुप्त साम्राज्य को समुद्री व्यापार से जोड़ दिया, जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति और भी मजबूत हो गई। इसी विजय के बाद उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।
इस शासक के समय संस्कृत साहित्य अपने शिखर पर पहुँच गया। महान कवि कालिदास उसके दरबार में थे, जिनकी रचनाएँ जैसे अभिज्ञान शाकुंतलम् और मेघदूत आज भी विश्व प्रसिद्ध हैं।
इसी काल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया, जिसने यहाँ की शांतिपूर्ण सामाजिक व्यवस्था और समृद्ध जीवन का वर्णन किया है। कुल मिलाकर, चंद्रगुप्त द्वितीय का शासन ऐसा दौर था जिसमें राजनीतिक शक्ति और सांस्कृतिक समृद्धि दोनों साथ-साथ आगे बढ़ीं।
स्कंदगुप्त (455–467 ई.)
अब चलो स्कंदगुप्त के बारे में जानने की कोशिश करते हैं जो कि इतिहासकारों के हिसाब से गुप्त साम्राज्य का अंतिम शक्तिशाली शासक माना जाता है जब स्कंदगुप्त ने सत्ता संभाली, तब गुप्त साम्राज्य पहले जितना मजबूत नहीं रह गया था। अंदरूनी समस्याएँ बढ़ रही थीं और बाहर से हूणों का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा था। ऐसे कठिन समय में स्कंदगुप्त ने शासन की बागडोर संभाली और पूरी तरह से साम्राज्य की रक्षा पर ध्यान केंद्रित किया।
स्कंदगुप्त की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसने हूण आक्रमणों को सफलतापूर्वक रोका। हूण अत्यंत आक्रामक और विनाशकारी माने जाते थे, और उनके हमलों से उत्तर भारत के कई राज्य नष्ट हो चुके थे। स्कंदगुप्त ने अपनी सैन्य क्षमता के बल पर उन्हें पराजित कर गुप्त साम्राज्य को तत्काल पतन से बचा लिया। इसी कारण इतिहास में उसे गुप्तों का अंतिम शक्तिशाली शासक कहा जाता है।
हालाँकि निरंतर युद्धों का गुप्त साम्राज्य की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा। सेना और रक्षा पर अधिक खर्च होने के कारण राजकोष कमजोर हो गया और प्रशासन धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगा। स्कंदगुप्त के बाद गुप्त साम्राज्य पहले जैसी शक्ति फिर कभी हासिल नहीं कर पाया। इसलिए कहा जाता है कि स्कंदगुप्त के शासन के साथ ही गुप्त साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया शुरू हो गई, भले ही उसका अंत कुछ समय बाद हुआ।
अब देखो हमने गुप्त साम्राज्य के बाहरी चीजों को समझ लिया है अब इसके आगे हम अंदर की चीजों को अच्छे से समझने का प्रयास करते हैं जैसे-
- गुप्त काल की प्रशासन व्यव्स्था
- कला-साहित्य-विज्ञान में कितना बिकास हुआ
- सामाजिक-आर्थिक स्थिति कैसी थी?
- स्वर्ण युग- क्यों इस काल को इतिहासकार स्वर्ण युग मानते हैं
- और अंत में इसका पतन
गुप्त काल की प्रशासन व्यव्स्था
देखो जब हम गुप्त प्रशासन की बात करते हैं तो इसे आज के सिस्टम से समझना सबसे आसान होता है। जैसे आज देश में प्रधानमंत्री, मंत्री और अलग-अलग राज्य सरकारें मिलकर काम करती हैं, ठीक उसी तरह गुप्त काल में भी शासन एक व्यक्ति पर नहीं, ब्लकि राजा के नीचे काम करने वाले लोगों पर भी उसकी जिम्मेदारी होती थी।
1. राजा और शासन व्यवस्था–
- गुप्त काल में राजा सबसे बड़ा अधिकारी होता था, जैसे आज देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति
- राजा सेना का प्रमुख भी होता था, जैसे आज हमारे राष्ट्रपति तीनों सेनाओं को control करते हैं।
- कानून, न्याय और कर से जुड़े बड़े फैसले राजा करता था लेकिन राजा अकेले फैसला नहीं करता था, उसके साथ मंत्री भी होते थे।
2. केंद्रीय प्रशासन (आज की केंद्र सरकार जैसा)–
- राजा की मदद के लिए मंत्रिपरिषद होती थी हर मंत्री का अपना काम तय होता था जैसे —
- महामंत्री- मुख्य सलाहकार (आज के Chief Secretary जैसा)
- संधिविग्रहिक- युद्ध और संधि (आज का Foreign + Defence role)
- महासेनापति- सेना प्रमुख
- महादंडनायक- कानून और न्याय से जुड़े मामले
3. प्रांतीय प्रशासन (आज के राज्यों जैसा)–
- पुराने समय में साम्राज्य को आज के राज्यों की तरह भागों में बाँटा जाता था।
- इन हिस्सों को भुक्ति कहा जाता था।
- हर भुक्ति का प्रमुख अधिकारी होता था, जिसे उपरिक कहते थे।
- भुक्ति के अंदर छोटे-छोटे इलाके होते थे, जिन्हें विषय (जिले) कहा जाता था।
- और हर जिले का प्रमुख अधिकारी होता था विषयपति, जो आज के District Magistrate (DM) जैसा काम करता था।
- इस व्यवस्था से शासन सिर्फ राजधानी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे साम्राज्य में फैल गया।
4. स्थानीय प्रशासन (गाँव और नगर स्तर)
गाँव का प्रशासन–
- गाँव सबसे छोटी इकाई थी। गाँव का मुखिया ग्राम प्रधान कहलाता था। उसे ग्रामिक या महत्तर भी कहा जाता था। उसका काम था-
- कर (टैक्स) इकट्ठा करना
- झगड़े सुलझाना
- खेती और सिंचाई की देखरेख करना
नगर का प्रशासन– गाँव से बड़े नगरों में व्यापार और शिल्प (कला-कौशल) का महत्व था।
- व्यापारी मिलकर समूह बनाते थे। ये समूह व्यापार के नियम, कीमत और गुणवत्ता तय करते थे। राजा के आदेश और कर वसूली में भी मदद करते थे।
शिल्पकारों की श्रेणियाँ–
- नगरों में अलग-अलग काम करने वाले शिल्पकार (जैसे लोहार, सुनार, बुनकर, कुम्हार) अपनी-अपनी टोली में रहते थे।
- हर टोली का एक प्रमुख होता था जो काम की देखरेख करता था।
- ये संगठन नगर की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को मजबूत बनाते थे।
5. न्याय व्यवस्था (आज के कोर्ट सिस्टम जैसा)
- उस समय राजा को ही सबसे बड़ा न्यायाधीश माना जाता था।
- जैसे आज हमारे पास डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा दिया गया संविधान है ठीक उसी तरह उस समय कानून बनाने और फैसले करने का आधार धर्मशास्त्र थे। अगर कोई अपराध करता था तो उसे अपराध के हिसाब से सज़ा मिलती थी।
- जुर्माना (पैसे देकर सज़ा काटना)
- शारीरिक दंड (जैसे कोड़े मारना या हल्की शारीरिक सज़ा)
- लेकिन भाई ध्यान देने वाली बात यह है कि मौर्य काल की तुलना में ये दंड कम कठोर थे। मतलब, न्याय व्यवस्था मौजूद थी, पर बहुत ज़्यादा क्रूरता नहीं की जाती थी।
गुप्त काल में कला–साहित्य–विज्ञान का विकास
कला –
- अगर कला की बात करें तो इस काल की सबसे प्रसिद्ध उपलब्धि अजन्ता की गुफाएँ है, जिनका विकास मुख्य रूप से चंद्रगुप्त द्वितीय(लगभग 375 ईस्वी से 415 ईस्वी) के समय हुआ।
- गुप्त काल की मूर्तिकला भी अत्यंत उन्नत अवस्था में पहुँच चुकी थी। विशेष रूप से सारनाथ शैली की बुद्ध प्रतिमाएँ(चंद्रगुप्त द्वितीय) इस काल की पहचान हैं। इन मूर्तियों में चेहरे की शांति, शरीर का संतुलन और भावों की कोमलता दिखाई देती है।
- इसी काल में पत्थरों से बने स्थायी मंदिरों का निर्माण होने लगे। उत्तर प्रदेश के देवगढ़ में स्थित दशावतार मंदिर गुप्त कालीन मंदिर कला का एक नमूना है। मानव की तरह दिखने वाले देवी-देवताओं की मूर्तियां इसी काल में बनाने सुरु हुए थे।
साहित्य–
- इस काल के राजाओं ने विद्वानों और कवियों को संरक्षण दिया, जिससे काव्य, नाटक और शास्त्रीय रचनाएँ बड़ी संख्या में लिखी गईं।
- इस काल के सबसे प्रसिद्ध कवि कालिदास थे, जिनकी रचनाएँ अभिज्ञानशाकुंतलम्, मेघदूत और रघुवंश आज भी पढ़ी जाती हैं। इनके अलावा अमरसिंह द्वारा रचित अमरकोश भी गुप्त काल की एक महत्वपूर्ण साहित्यिक उपलब्धि है।
विज्ञान–
- इस काल के सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक आर्यभट्ट (476 ई.लगभग) थे, जिन्होंने आर्यभटीय की रचना की। उन्होंने शून्य की अवधारणा को स्पष्ट किया, पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूमने की बात कही और सूर्य–ग्रहण तथा चंद्र–ग्रहण की वैज्ञानिक व्याख्या दी। इनके अलावा वराहमिहिर ने खगोल विज्ञान और ज्योतिष से संबंधित ग्रंथ लिखे
- इस समय गणित, खगोल विज्ञान और आयुर्वेद जैसे विषयों पर गंभीर अध्ययन किया गया। विद्वानों ने केवल धार्मिक ज्ञान तक ही सीमित न रहकर प्रकृति, ग्रहों और संख्याओं को समझने का प्रयास किया, जिससे वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा मिला।
इस काल की सामाजिक–आर्थिक स्थिति
गुप्त काल में समाज मुख्य रूप से कृषि पर आधारित था। लोग गाँवों में रहते थे और खेती उनकी जीवन जीने का मुख्य साधन थी। वर्ण व्यवस्था समाज में मौजूद थी, लेकिन उस समय समाज में शांति बनी हुई थी। लोग धार्मिक कार्यों, त्योहारों और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेते थे। उच्च वर्ग की महिलाएँ शिक्षा प्राप्त करती थीं और कुछ महिलाएँ विदुषी(विद्वान) भी मानी जाती थीं। स्त्रियाँ धार्मिक अनुष्ठानों, व्रत-उपवास और सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेती थीं, जिससे यह पता चलता है कि समाज में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी। लेकिन बाल विवाह की प्रथा, और सती प्रथा के शुरूवात होने के संकेत भी गुप्त काल के अंत तक दिखाई देते हैं।
आर्थिक रूप से यह काल समृद्ध माना जाता है। व्यापार और वाणिज्य का विकास हुआ और सोने के सिक्कों का प्रचलन था। भारत का व्यापार विदेशों से भी होता था, जिससे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई।
गुप्त काल को स्वर्ण युग क्यूँ बोला जाता है??
- अब इस बात को अच्छे से समझते हैं चंद्रगुप्त प्रथम(320 – 335 ई.) गुप्त संवत की शुरुआत (320 ई.) गुप्त साम्राज्य को बनाने वाला यहि था।
- इसके बाद समुद्र गुप्त (335– 375 ई.) आता है जो इस काल का सबसे महान शासक माना जाता है इसने साम्राज्य के बिस्तार का काम किया।
- फिर आते हैं चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) 375–415 ई. तक, जिनके शासन काल में लगभग सभी क्षेत्रों(सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक और वैज्ञानिक क्षेत्र) में बिकास हुआ और साम्राज्य में शांति बनी रही।
- कुमारगुप्त प्रथम(415 – 455 ई.) जिसने नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना करवाया। समाज में शांति बनी रही और बिकास होता रहा।
- स्कंदगुप्त (455 – 467 ई.) ने हूणों के आक्रमण को रोका और साम्राज्य को सुरक्षित बनाने का काम किया।
गुप्त साम्राज्य में लंबे समय तक शांति बनी रही, सामाजिक और आर्थिक रूप से भी यह समय समृद्धि का था। व्यापार-व्यवसाय बढ़ रहे थे, किसानों की स्थिति अच्छी थी और समाज में स्थिरता थी। प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावी और सुव्यवस्थित थी। इन सभी कारणों से गुप्त काल को भारतीय इतिहास में “स्वर्ण युग” कहा जाता है।
समुद्रगुप्त → नींव रखने वाला
चंद्रगुप्त द्वितीय → स्वर्ण युग को चरम तक ले जाने वाला
कुमारगुप्त → उस विरासत को आगे बढ़ाने वाला
स्कंदगुप्त → साम्राज्य को बचाने वाला
गुप्त साम्राज्य का पतन
तो दोस्तों गुप्त वंश में समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त द्वितीय जैसे शक्तिशाली शासकों के बाद आने वाले राजा उतने सक्षम नहीं थे। जिसके कारण उनके आसपास के शासक जो उनके अधीन रहते थे वो धीरे-धीरे स्वतंत्र होने लगे और साम्राज्य कमजोर पडने लगा।
दूसरा बड़ा कारण विदेशी आक्रमण थे। विशेष रूप से हूणों के आक्रमण ने गुप्त साम्राज्य को बहुत नुकसान पहुँचाया। स्कंदगुप्त ने कुछ समय तक हूणों को रोका, लेकिन उनके बाद हूणों का दबाव बढ़ गया, जिससे साम्राज्य की सैन्य शक्ति टूटने लगी। लगातार युद्धों से राजकोष खाली होता गया और बड़े साम्राज्य को नियंत्रित करना कठिन हो गया। इन सभी कारणों से धीरे-धीरे गुप्त साम्राज्य का पतन हो गया।