वैशेषिक दर्शन– Atomic Theory

नमस्कार दोस्तों, तो जैसा कि पिछले ब्लॉग में हमने न्याय दर्शन और उसके पहले 🕉️ भारतीय दर्शन का सम्पूर्ण वर्गीकरण (सभी शाखाओं सहित) को बताया था जहाँ तर्क, प्रमाण और ज्ञान को सबसे ज़्यादा अहमियत दी गई है अब उसी तरह आगे बढ़ाते हुए, आज हम वैशेषिक दर्शन की बात करने वाले हैं जिसमे पूरे ब्रह्मांड की रचना को समझाने के लिए परमाणु सिद्धांत(Atomic Theory) को आधार बनाया है।

वैशेषिक दर्शन को खास माना जाता है क्योंकि इसने पदार्थ के भौतिक स्वरूप को समझाने की कोशिश की, जबकि बाकी दर्शनों में ज़्यादातर आध्यात्मिक या दार्शनिक चीजों पर ध्यान दिया गया है। इसी वजह से तो इसे हमारे दर्शन का ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला दर्शन’ भी कहा जाता है। 

तो भाई जैसा कि मैंने पहले ही बताया था कि भारतीय दर्शन में छह आस्तिक दर्शनों को विशेष स्थान मिला है सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा (वेदांत)। इनमें वैशेषिक दर्शन एक ऐसा है जो वास्तविकता(Reality) को पदार्थों(Substances) के रूप में देखता है और उनकी quality के ज़रिए सत्य की खोज करता है।

Contents

अब चलो आगे बढ़ते हैं और अच्छे से समझते हैं—
  • वैशेषिक दर्शन का असली मतलब क्या है  
  • कणाद ऋषि कौन थे और उन्होंने क्या विचार दिए  
  • परमाणुवाद का सिद्धांत क्या कहता है  
  • और कैसे यह दर्शन बाद में न्याय दर्शन के साथ मिलकर “न्याय-वैशेषिक परंपरा” के रूप में विकसित हुआ
  • और इस दर्शन की विशेषता 
  • इसकी कमियां 

वैशेषिक दर्शन का मतलब और उसका परिचय

तो दोस्तों वैशेषिक शब्द संस्कृत के विशेष शब्द से बना है, जिसका मतलब होता है अलग-अलग गुण, भिन्नता या खासियत।

सीधे शब्दों में कहें तो

  • आपने कभी तो ये सुना ही होगा कि हर इंसान एक जैसा नहीं होता सबकी अपनी-अपनी खासियत होती है।
  • ठीक वैसे ही सभी चीज अपने खास गुणों की वजह से दूसरी चीजों से अलग होते हैं। 
  • इस दर्शन के अनुसार, अगर हम किसी वस्तु के गुणों और उसकी भिन्नताओं को समझ लें, तो हम पूरे ब्रह्मांड की रचना और उसके व्यवहार को भी समझ सकते हैं।

वस्तुओं के गुणों के आधार पर दुनिया को समझना।


कणाद ऋषि 

कणाद ऋषि को वैशेषिक दर्शन का प्रवर्तक माना जाता है। लोग उन्हें कभी-कभी उलूक ऋषि या कणभुक भी कहते हैं। कणाद मतलब वह होता है दोस्तों जो कणों (परमाणुओं) को जानता या समझता है।

कणाद का समय लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व (ईशा पूर्व और ईस्वी) माना जाता है। उन्होंने बताया कि जो भी हम देखते हैं जैसे- पहाड़, नदी, पेड़ या इंसान, वे सभी चीजें बहुत ही छोटे-छोटे और अविभाज्य कणों से मिलकर बने हैं और ये कण कभी गायब नहीं होते बस अलग-अलग तरह से जुड़कर नई-नई चीजें बनाते हैं। 

अब आप सभी सोच रहे होंगे कि हम ये सब क्यों बता रहे हैं क्योंकि उनका प्रमुख ग्रंथ है वैशेषिक सूत्र ही है, जिसमें करीब 370 सूत्र हैं। इसमें कणाद जी ने दुनिया को समझने के लिए सात मुख्य चीज़ें बताईं द्रव्य(Substance), गुण(Quality), कर्म(Action), सामान्यता(Generality), विशेषता(Particularity), समवाय (एक-दूसरे से जुड़े रहना- Inherence) और अभाव (न होना- Non-existence)। इन्हीं से उन्होंने ब्रह्मांड की रचना और व्यवहार को सरलता से समझाया।

कणाद के कुछ खास विचार ऐसे थे
  • उन्होंने सबसे पहले दर्शन में परमाणु (Atomic) विचार को रखा।  
  • उनकी सोच थी कि सृष्टि अचानक किसी ईश्वरीय इच्छानुसार नहीं बनी, बल्कि पदार्थों के स्वभाविक मेल-जोल से बनती है।  
  • उन्होंने भौतिक जगत के अध्ययन को भी ज्ञान और मुक्ति का रास्ता माना।  

वैशेषिक दर्शन का मुख्य विचार– परमाणुवाद

वैशेषिक दर्शन की सबसे खास बात है परमाणुवाद यानी यह मानना कि इस पूरी दुनिया की हर चीज़ बहुत ही छोटे-छोटे कणों से मिलकर बनी हुई है, जिन्हें परमाणु कहते हैं, 

कणाद ऋषि ने यह विचार बहुत पहले रखा था, जो आज के Atomic Theory से काफी मिलता-जुलता है।

1. पदार्थ क्या होता है?

कणाद ऋषि ने कहा

  • पदार्थ वही है जिसमें गुण होते हैं, जो किसी काम का कारण बनता है और जिसका अस्तित्व होता है।
  • यानि कोई भी चीज़ जिसमें गुण और क्रिया हो, वो पदार्थ कहलाती है।  
  • दुनिया की हर वस्तु किसी न किसी रूप में पदार्थ से बनी होती है।
उन्होंने पदार्थ को दो तरह का बताया
  • नित्य (हमेशा रहने वाला) — जैसे आत्मा, समय, दिशा, आकाश, मन और परमाणु  
  • अनित्य (जो बदलता या खत्म हो सकता है) — जैसे पेड़, शरीर, पत्थर वगैरह

 2. परमाणु क्या है और कैसा होता है?

इस दर्शन के अनुसार परमाणु

  • बहुत ही छोटा और अविभाज्य होता है इसे और छोटे हिस्सों में नहीं बाँटा जा सकता  
  • इन्द्रियों से दिखाई नहीं देता मतलब बहुत सूक्ष्म होता है  
  • इसका अपना स्वभाव और गुण होता है  
  • यह कभी नष्ट नहीं होता हमेशा बना रहता है
उन्होंने चार तरह के परमाणु बताए
  1. पृथ्वी का  
  2. जल का  
  3. अग्नि का  
  4. वायु का  

(आकाश, समय, दिशा जैसे तत्व परमाणु-रहित और हमेशा रहने वाले माने गए हैं)

 3. सृष्टि कैसे बनती है?

  • कणाद ने बताया कि जब दो परमाणु मिलते हैं, तो द्वयाणुक बनता है।  
  • तीन द्वयाणुक मिलकर त्रयाणुक बनाते हैं और फिर इनसे कोई दिखने वाली चीज़ बनती है।
  • इसी तरह कई परमाणु मिलकर पेड़, पत्थर, शरीर जैसी चीज़ें बनाते हैं।
  • जब ये परमाणु अलग हो जाते हैं, तो वह चीज़ नष्ट हो जाती है।
  • सृष्टि की शुरुआत परमाणुओं के मिलने से होती है, और अंत उनके अलग होने से।

 4. आधुनिक विज्ञान से तुलना

अगर हम वैशेषिक दर्शन की तुलना आज के विज्ञान से करें, तो यह हैरान कर देने वाली बात है कि

  • जॉन डाल्टन ने 19वीं शताब्दी में Atomic Theory दी  
  • लेकिन कणाद ऋषि ने ढाई हज़ार साल पहले ही यह सोच रख दी थी!

फर्क बस इतना है कि आधुनिक विज्ञान ने इसे प्रयोगों से साबित किया, जबकि कणाद ने इसे तर्क और चिंतन से समझाया। इसलिए वैशेषिक दर्शन को भारतीय विज्ञान की शुरुआती नींव भी कहा जा सकता है।


वैशेषिक दर्शन के मुख्य तत्त्व पदार्थ(Padarth)

कणाद ऋषि जी ने कहा था कि इस दुनिया में जो कुछ भी हम देखते, सुनते या महसूस करते हैं वो सब कुछ कुछ खास श्रेणियों में आता है। उन्होंने इन श्रेणियों को पदार्थ कहा। और इन पदार्थों के ज़रिए ही उन्होंने समझाया कि दुनिया कैसे बनी, कैसे बदलती है और कैसे चलती है??

इसी सोच के आधार पर उन्होंने मुख्य सात पदार्थ बताए–

1. द्रव्य(Substance)

द्रव्य क्या होता है ये तो आप सबने पढा ही होगा, इसके 3 प्रकार- ठोस,  द्रव, गैस ये सब तो जानते ही होंगे, अब देखो हमारे कणाद ऋषि ने इसी द्रव्य को आध्यात्मिक रूप में समझाया है चीजे वही है बस example बदला है।

  • वो चीज़ जो खुद मौजूद हो और जिसमें गुण और क्रिया दोनों पाए जाएँ। जैसे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, समय (काल), दिशा, आत्मा और मन।

2. गुण (Quality)

 जो किसी द्रव्य में होता है लेकिन खुद कोई काम नहीं करता। जैसे रंग, स्वाद, गंध, संख्या, आकार, स्पर्श आदि।

3. कर्म (Action)

द्रव्य में होने वाली कोई भी गति या बदलाव। जैसे ऊपर-नीचे जाना, सिकुड़ना, फैलना, घूमना वगैरह।

4. सामान्य (Generality)

जो कई चीज़ों में एक जैसा पाया जाए। जैसे ‘गाय’ शब्द सभी गायों के लिए एक सामान्य पहचान है।

5. विशेष (Particularity)

जो हर चीज़ को दूसरी से अलग बनाता है। यही किसी वस्तु की अपनी खास पहचान होती है।

6. समवाय (Inherence)

ऐसा गहरा संबंध जो दो चीज़ों को इस तरह जोड़ता है कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। जैसे कपड़े और धागे का रिश्ता, या शरीर और आत्मा का संबंध।

7. अभाव (Non-existence)

जिसका वहाँ होना नहीं है यानी किसी चीज़ की अनुपस्थिति। जैसे क्लास में राहुल नहीं आया राहुल का अभाव है। 

इन सात पदार्थों के ज़रिए कणाद ऋषि जी ने पूरी दुनिया की रचना और उसके काम करने के तरीके को समझाने की कोशिश की और वो भी एकदम तर्क और अनुभव के आधार पर।


वैशेषिक दर्शन की नज़र से ज्ञान और मोक्ष 

तो भाई यह दर्शन सिर्फ दुनिया कैसे बनी है यहि नहीं समझाता बल्कि यह भी बताता है कि हम कैसे सच्चा ज्ञान पाकर दुखों से मुक्त हो सकता है।

कणाद ऋषि जी का मानना था कि अगर हमें सही ज्ञान मिल जाए, तो हम जीवन की परेशानियों से छुटकारा पा सकते हैं।

ज्ञान कैसे मिलता है?

इस के अनुसार ज्ञान पाने के दो मुख्य तरीके हैं–

  1. प्रत्यक्ष ज्ञान- यानी जो हम अपनी इंद्रियों से सीधे अनुभव करते हैं। जैसे आँखों से रंग देखना, कानों से आवाज़ सुनना, जीभ से स्वाद चखना।  यह सबसे सीधा और भरोसेमंद तरीका है।
  2. अनुमान ज्ञान- यानी जब हम किसी चीज़ को उसके संकेतों से समझते हैं। जैसे अगर कहीं धुआँ दिखे, तो हम समझ जाते हैं कि वहाँ आग भी होगी। यह तरीका बिना सीधे अनुभव के भी हमें सही जानकारी तक पहुँचाता है।

इन दोनों तरीकों से हम दुनिया और सच्चाई को समझते हैं।

जब कोई व्यक्ति सही ज्ञान पा लेता है, तो उसे चीज़ों का असली रूप समझ में आता है। फिर वह उनसे जुड़ी मोह-माया छोड़ देता है। और यही स्थिति मोक्ष कहलाती है।

मोक्ष का मतलब है आत्मा का शरीर, इंद्रियों और मन से पूरी तरह अलग हो जाना। इस अवस्था में आत्मा न सुख महसूस करती है, न दुख वह बस शुद्ध और स्वतंत्र रहती है। कणाद जी ने बताया कि मोक्ष पाने के लिए इंसान को अपनाना चाहिए–

  • सही ज्ञान  
  • अच्छा आचरण  
  • और वैराग्य यानी मोह-माया से दूरी

न्याय दर्शन के साथ संबंध (न्याय-वैशेषिक) परंपरा

वैशेषिक और न्याय दर्शन में कई बातें एक जैसी हैं। दोनों ही सोचते हैं कि यह दुनिया सच में है कोई भ्रम नहीं। और इसे समझने के लिए तर्क, अनुभव और सही ज्ञान ज़रूरी है। न्याय दर्शन – गौतम ऋषि का तर्क आधारित भारतीय दर्शन

दोनों दर्शनों की समानताएँ

1.यथार्थवादी सोच  

  • न्याय और वैशेषिक दोनों मानते हैं कि यह जगत असली है। इसे समझने के लिए तर्क और अनुभव का सहारा लेना चाहिए।

2.ज्ञान का मकसद (मोक्ष)  

  • दोनों दर्शनों का अंतिम लक्ष्य है सच्चा ज्ञान पाकर दुखों से मुक्ति यानी कि मोक्ष।

3.ज्ञान के स्रोत (प्रमाण)  

  • न्याय दर्शन चार तरीके मानता है प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द।  
  • वैशेषिक दर्शन दो को मानता है प्रत्यक्ष और अनुमान।  

यानि दोनों में ज्ञान की नींव काफी हद तक एक जैसी है।

4.तर्क और सोच का महत्व  

  • दोनों दर्शनों में यह बात साफ है सच्चाई को समझने के लिए सोच-विचार, तर्क और अनुभव ज़रूरी हैं। अंधविश्वास से नहीं, बल्कि समझदारी से ज्ञान मिलता है।

कैसे बनी न्याय-वैशेषिक परंपरा?

समय के साथ जब लोगों ने देखा कि न्याय और वैशेषिक दर्शन एक-दूसरे को अच्छी तरह पूरा करते हैं, तो उन्हें साथ पढ़ाया और समझाया जाने लगा।

  • न्याय दर्शन ने तर्क और प्रमाण की विधि दी  
  • वैशेषिक दर्शन ने पदार्थों की रचना और उनके गुणों की जानकारी दी
  • इस तरह दोनों मिलकर एक ऐसा दर्शन बने जो ज्ञान और जगत दोनों को समझने में मदद करता है।

दोनों की साझा सोच न्याय-वैशेषिक दर्शन कहता है कि सच्चाई को जानने के लिए तर्क ज़रूरी है, और दुनिया को समझने के लिए पदार्थों का ज्ञान। इस सोच ने भारतीय दर्शन में दो बड़े क्षेत्रों को जन्म दिया

  1. तर्कशास्त्र (Logic)  
  2. भौतिक तत्वज्ञान (Metaphysics)

इसी वजह से न्याय-वैशेषिक परंपरा को कहा जाता है ज्ञान और पदार्थ दोनों का विज्ञान


वैशेषिक दर्शन की मुख्य विशेषताएँ 

वास्तविकता को मान्यता  

  • यह दर्शन मानता है कि संसार असली है माया या भ्रम नहीं। जो कुछ हम अनुभव करते हैं, वह वास्तव में मौजूद है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण  

  • कणाद ऋषि जी ने बताया कि दुनिया परमाणुओं से बनी है। यह सोच आधुनिक Atomic Theory से काफी मिलती है।

तर्क पर आधारित समझ  

  • हर बात को तर्क और प्रमाण से परखा जाता है। बिना तर्क के कोई चीज़ सत्य नहीं मानी जाती।

ज्ञान से मोक्ष की ओर  

  • सच्चा ज्ञान मिलने पर इंसान दुखों से मुक्त होकर मोक्ष पा सकता है। यह ज्ञान इंद्रियों, सोच और अनुभव से आता है।

ज्ञान के स्रोत  

वैशेषिक दर्शन दो प्रमाण मानता है —  

  • प्रत्यक्ष (इंद्रियों से अनुभव)  
  • अनुमान (तर्क से निष्कर्ष)

प्रत्यक्ष और अनुमान बिस्तार पूर्वक


इस दर्शन की कमियाँ या कमजोरियाँ

तो दोस्तों जैसा कि हम वैशेषिक दर्शन के बारे में पढ़ रहे हैं तो इसकी कोन सी कड़ी कमजोर है इसके बारे में जानने की कोशिश करते हैं 

भौतिक पक्ष पर ज़्यादा ज़ोर  

परमाणुवाद में कमी  

  • कणाद जी ने बताया कि सृष्टि परमाणुओं से बनी है, लेकिन यह नहीं बताया कि उनमें पहली बार गति कैसे आई।

ज्ञान के सीमित स्रोत  

  • वैशेषिक ने सिर्फ प्रत्यक्ष और अनुमान को प्रमाण माना। शब्द और उपमान जैसे अन्य प्रमाणों को नहीं माना जिसे न्याय और मीमांसा ने अधूरा बताया।

मोक्ष की अस्पष्ट व्याख्या  

  • इस दर्शन में मोक्ष को सुख-दुख से दूर रहने स्थिति को कहा गया, जबकि वेदांत में मोक्ष को ब्रह्म से एकता और आनंद की अवस्था माना गया।

स्वतंत्र पहचान का अभाव  

  • समय के साथ यह दर्शन न्याय दर्शन में समाहित हो गया और इसकी अलग पहचान कमज़ोर पड़ गई।

इस वैशेषिक दर्शन ने दुनिया को वैज्ञानिक रूप से समझने की दिशा दी, परंतु आत्मा और ईश्वर जैसे तत्वों की व्याख्या में यह अधूरा रह गया। शायद इसी वजह से आज हम अपने इस दर्शन के बारे में जानते तक नहीं। 


आज का ये topic समाप्त होता है अगर इसमे आपको कुछ कमी लगती है तो आप हमसे contact करके जरूर बताएं इससे हमारे और बहुत से लोगों को मदद मिलेगी। हमारा इतिहास ही हमारी असली पहचान है इसे हम यूँ अधूरा नहीं छोड़ सकते ,……..धन्यवाद।

वेदों का विभाजन कब, क्यों और कैसे हुआ???

सांख्य दर्शन – भारतीय दर्शन का वैज्ञानिक आधार

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