नमस्कार दोस्तों हमने पिछले ब्लॉग में आरण्यक ग्रंथों के बारे में बिस्तार से चर्चा की थी आज हम उसी क्रम में आगे बढ़ते हुए (वेद = संहिता + ब्राम्हण ग्रंथ + आरण्यक ग्रंथ + उपनिषद ग्रंथ) उपनिषदों के बारे में पढ़ते हैं।
उपनिषद हमारे वेद का अंतिम हिस्सा है और इन्हें “वेदांत” भी कहा जाता है, अब बताइए आपने कभी सोचा है कि इन्हें वेदांत क्यूँ कहा जाता है क्योंकि ये वेदों के अंत में आते हैं।
उपनिषद ग्रंथों में हमें जीवन, आत्मा, ब्रह्म (परम सत्य) और मोक्ष जैसे सवालों के जवाब आसानी से मिलते हैं। इनका मकसद है हमें यह सिखाना कि असली ज्ञान तो हमारे भीतर ही है, बस उसे पहचानने की ज़रूरत है।
आज हम इस ब्लॉग में बहोत से महत्तवपूर्ण बातों को जानने वाले हैं उपनिषदों के बारे में, जैसे —
उपनिषद क्या हैं,
- इनकी शुरुआत कैसे हुई??
- कौन-कौन से प्रमुख उपनिषद हैं??
- और आज के समय में ये हमारे लिए क्यों ज़रूरी हैं??
Contents
- 1 उपनिषद शब्द का अर्थ और उत्पत्ति
- 2 लेकिन अब सवाल आता है, इनकी उत्पत्ति क्यों और कैसे हुई?
- 3 जन्म क्यूँ हुआ ये बात तो हम सभी जान ही गए अब कैसे हुआ उसकी तरफ चलते हैं –
- 4 आध्यात्मिक दृष्टि से
- 5 वैज्ञानिक दृष्टि से
- 6 भाषा और शैली—
- 7 उपनिषदों की भाषा कैसी है?
- 8 शैली कैसी है?
- 9 कुल उपनिषदों की संख्या
- 10 मुख्य 10 (या 11) उपनिषद हैं –
- 11 उपनिषदों का दर्शन (Philosophy of the Upanishads)
- 12 मोक्ष, कर्म, ज्ञान और ध्यान की भूमिका
- 13 कर्म (Karma) –
- 14 ज्ञान–
- 15 ध्यान (Dhyana / Meditation) –
- 16 मोक्ष (Moksha) – जीवन का लक्ष्य
- 17 महावाक्य
- 18 उपनिषदों में सामाजिक और नैतिक मूल्य (Social and Moral Values in the Upanishads)
- 19 सत्य (Satya)
- 20 अहिंसा (Ahimsa)
- 21 करुणा (Karuna)
- 22 ब्रह्मचर्य (Brahmacharya)
- 23 शिक्षा और गुरु-शिष्य परंपरा
- 24 मानवता और सार्वभौमिकता की भावना
- 25 उपनिषदों का प्रभाव और महत्व
- 26 भारतीय दर्शन पर प्रभाव (सांख्य, योग, वेदांत)
- 27 बुद्ध, महावीर और बाद के संतों पर प्रभाव
- 28 भक्ति संतों पर प्रभाव
- 29 आधुनिक काल में उपनिषदों का महत्व (स्वामी विवेकानंद, राधाकृष्णन आदि)
- 30 स्वामी विवेकानंद-
- 31 डॉ. राधाकृष्णन
- 32 अन्य आधुनिक प्रभाव–
- 33 क्यों ज़रूरी हैं उपनिषद आज?
- 34 Like this:
उपनिषद शब्द का अर्थ और उत्पत्ति
“उपनिषद” शब्द संस्कृत के तीन शब्दों से मिलकर बना है-
उप + नि + सद।
- ‘उप’ का मतलब होता है — पास आना
- ‘नि’ का मतलब — ध्यानपूर्वक या पूरी तरह
- और ‘सद’ का मतलब — बैठना या जानना
अब तो आप सभी को पता चल ही गया होगा कि “उपनिषद” शब्द का अर्थ है– ‘गुरु के पास बैठकर ज्ञान प्राप्त करना’।
लेकिन अब सवाल आता है, इनकी उत्पत्ति क्यों और कैसे हुई?
तो मैं आज आप सभी को बताना चाहूँगा कि वैदिक काल के शुरुआती दौर में ज़्यादातर लोग कर्मकांड और यज्ञों में विश्वास करते थे।
धीरे-धीरे हम सभी के पूर्वजों ने महसूस किया कि सिर्फ बाहरी यज्ञ और पूजा से मनुष्य को शांति या मुक्ति तो नहीं मिलने वाली…..।
तब उन लोगों ने सोचना शुरू किया–
- “क्या जीवन का कोई गहरा उद्देश्य नहीं हो सकता है?”
- “क्या ईश्वर हमारे भीतर नहीं हो सकता?”
इसी खोज ने उपनिषदों को जन्म देना सुरु किया।
जन्म क्यूँ हुआ ये बात तो हम सभी जान ही गए अब कैसे हुआ उसकी तरफ चलते हैं –
आध्यात्मिक दृष्टि से
जब हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान, साधना और आत्म-चिंतन के माध्यम से अपने जीवन के रहस्यों को समझना शुरू किया। और उस दौरान उन्होंने जो भी महसूस किया और जो अनुभव प्राप्त किया उसे अपने शिष्यों को बताया — और यही संवाद(बातचीत) “उपनिषद” कहलाए।
इनमें यही समझाया गया है कि ब्रह्म (परम सत्य) और आत्मा (स्वयं) वास्तव में एक ही चीज हैं— और यही ज्ञान मोक्ष की राह है।
वैज्ञानिक दृष्टि से
जब हम सबने सिर्फ खाने-पीने और जीने की चीज़ों से आगे बढ़कर सोचना शुरू किया तो हमारे मन में सवाल उठने सुरु हो
- मैं कौन हूँ?,
- मरने के बाद क्या होता है?,
और ये हमारे सोचने के तरीके में एक बहुत बड़ा बदलाव था, यही बदलाव एक नई समझ और चेतना की शुरुआत थी अब इसी दौर को उपनिषद काल कहा जाता है।
- इतिहासकारों का मानना है कि उपनिषद करीब 800 से 500 ईसा पूर्व के बीच लिखे गए।
- ये वही समय था जब हम सभी गहराई से सोचने लगे थे,
- और जीवन, आत्मा, और ब्रह्मांड के बारे में सवाल पूछने लगे थे।
- इसलिए इस समय को हमारे देश में दार्शनिक सोच का सबसे सुनहरा समय माना जाता है।
भाषा और शैली—
उपनिषदों की भाषा कैसी है?
- तो दोस्तों जैसे हमारे सभी वैदिक ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए हैं ठीक वैसे ही उपनिषद भी संस्कृत में ही लिखे गए हैं, लेकिन ये भारी-भरकम नहीं, बल्कि सोचने वाले अंदाज में है।
- इसमें गहरे सवाल-जवाब होते हैं, जैसे- मैं कौन हूँ?, आत्मा क्या है? और ऐसे ही कुछ….।
- शांत और गंभीर भाषा होती है, जो ध्यान, समझ और सोचने पर मजबूर करती है।
शैली कैसी है?
- बात-चीत वाली शैली होती है — मतलब गुरु और शिष्य के बीच बातचीत के रूप में लिखा गया है।
- कहानियों और उदाहरणों से समझाया गया है, ताकि कठिन बातें भी आसान लगने लगे।
- छोटी-छोटी बातों में भी बड़ा ज्ञान छिपा होता है, जैसे एक ही लाइन में पूरी जिंदगी का मतलब समझा दिया गया हो।
एक छोटा सा उदाहरण-
"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्"
तो दोस्तों इसका मतलब है— इस पूरी दुनिया में जो कुछ भी है, उसमें ईश्वर का वास है।
सबसे खास बात ये है कि इनके वाक्य बहुत छोटे लेकिन अर्थपूर्ण हैं। जैसे –
- “अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ही ब्रह्म हूँ)
- “तत्त्वमसि” (तू वही है)
ऐसे ही वाक्यों से पूरे उपनिषदिक को कुछ शब्दों में बयान कर देते हैं।
कुल उपनिषदों की संख्या
भारतीय परंपरा में उपनिषदों की संख्या 108 मानी गई है।
हालांकि, विद्वानों के अनुसार समय-समय पर नई रचनाएँ जुड़ती रहीं, इसलिए संख्या में कुछ अंतर देखने को मिलता है। ‘मुख्य’ (Principal) उपनिषद लगभग 10 या 11 माने जाते हैं जिन्हें आदि शंकराचार्य ने अपने भाष्यों में स्वीकार किया था।यही कारण है कि इन्हें ‘मुख्य या प्रमुख उपनिषद’ कहा जाता है।
मुख्य 10 (या 11) उपनिषद हैं –
ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, बृहदारण्यक (और कभी-कभी श्वेताश्वतर को 11वाँ माना जाता है)।
उपनिषदों को चारों वेदों से सम्बद्ध माना गया है।
हर वेद के अंत में जो दार्शनिक भाग आता है, वही उसका उपनिषद खंड होता है।
| वेद | संलग्न प्रमुख उपनिषद | टीप / विषयात्मक संकेत |
|---|---|---|
| ऋग्वेद | ऐतरेय उपनिषद | सृष्टि और आत्मा की उत्पत्ति |
| सामवेद | छांदोग्य, केन उपनिषद | भक्ति, ध्यान और ब्रह्मज्ञान |
| यजुर्वेद | ईश, कठ, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक, श्वेताश्वतर | कर्म और ज्ञान का समन्वय |
| अथर्ववेद | मुण्डक, माण्डूक्य, प्रश्न उपनिषद | आध्यात्मिक प्रश्न, प्राण और चेतना |
उपनिषदों का दर्शन (Philosophy of the Upanishads)
मोक्ष, कर्म, ज्ञान और ध्यान की भूमिका
तो दोस्तों उपनिषदों के जितने भी पाठ हैं वो सभी हमारे आध्यात्मिक विकास पर जोर देते हैं। इसमे हमें बताया गया है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल भौतिक सुख-सुविधा नहीं है, बल्कि मोक्ष की प्राप्ति है। आपने ऐसे बहुत से लोगों को देखा होगा, जो बोलते हैं कि वो रोज पूजा पाठ, दान…..और भी बहुत से धार्मिक कार्य करते हैं तो उन्हें मोक्ष मिलेगा लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। मोक्ष तक पहुँचने के लिए हमारे उपनिषद में तीन प्रमुख रास्ते बताय गए हैं— कर्म, ज्ञान और ध्यान,
कर्म (Karma) –
दोस्तों जैसा कि मैंने आपको पहले ही बताया कि केवल कर्म (यज्ञ, पूजा, दान आदि) करने से मुक्ति नहीं मिलती। यह तो बस मन को शुद्ध करने का रास्ता है। कठ उपनिषद (2.23) में बताया गया है कि — “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।” आत्मा की पहचान बाहर से नहीं, बल्कि भीतर की समझ से होती है।
ज्ञान–
मोक्ष को प्राप्त करने का मुख्य साधन ज्ञान है और यह ज्ञान हमें केवल शास्त्र पढ़ने से नहीं होता बल्कि खुद को पढने (Self-realization) से होता है। बृहदारण्यक उपनिषद (4.4.14) में कहा गया है — “तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति।” केवल ब्रह्म को जानकर ही मनुष्य मृत्यु को पार करता है। ज्ञान के बिना तो कर्म भी फल नहीं देता है मेरे भाई और न ही ध्यान सही दिशा में ले जाता है। इसलिए ज्ञान को ही मोक्ष का द्वार खोलने वाली चाभी कहा गया है।
ध्यान (Dhyana / Meditation) –
ध्यान ही हमारे मन को शांत करके आत्मा से जुड़ने में हमारी सहायता करते है। और धीरे-धीरे हम ब्रह्म का अनुभव करने लगते हैं। माण्डूक्य उपनिषद कहता है — ध्यान के द्वारा हम ओंकार (ॐ) के कंपन में ब्रह्म को महसूस कर सकते हैं। ध्यान से मन की चंचलता खत्म हो जाती है, और हम “मैं और ब्रह्म एक हैं” को महसूस करने लगते हैं।
मोक्ष (Moksha) – जीवन का लक्ष्य
कर्म मन को शुद्ध करता है,
ज्ञान सत्य का बोध कराता है,
ध्यान उस बोध को अनुभव में बदलता है,
और इन तीनों के मेल से हमें मोक्ष की प्राप्ति होती है।
महावाक्य
1. प्रज्ञानं ब्रह्म
2. अहं ब्रह्मास्मि
3. तत्त्वमसि
4. अयमात्मा ब्रह्म
अब इन महावाक्यों के बारे में बिस्तार पूर्वक जानने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर click करें
आदि शंकराचार्य और अद्वैत वेदांत: मठ, महावाक्य और दर्शन
उपनिषदों में सामाजिक और नैतिक मूल्य (Social and Moral Values in the Upanishads)
देखो अगर आपको लगता है कि उपनिषद में सिर्फ आध्यात्मिक बातेँ है तो ऐसा नहीं है मैं आपको बताना चाहूँगा कि ये जीवन को समझने का तरीका सिखाती हैं। इनमें जो बातें हैं, वो आज भी हमारे दिल और समाज को बेहतर बना सकती हैं।
सत्य (Satya)
- सच बोलना ही नहीं, बल्कि सोच, व्यवहार और रिश्तों में भी सच्चाई जरूरी है दोस्त।
- उपनिषदों में सत्य को ब्रह्म के रूप में माना गया है, “सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म”।
- उपनिषद कहते हैं कि सत्य ही ब्रह्म है। यानी जो सच्चा है, वही परम है।
अहिंसा (Ahimsa)
- हमारे उपनिषद कहते हैं कि हर जीव में एक ही आत्मा है, तो फिर किसी को चोट पहुँचाना कैसे सही हो सकता है, आप ही बताओ?
- अहिंसा का मतलब ही यहि है कि मन, वाणी और कर्म से किसी को भी नुकसान न पहुँचाना।
करुणा (Karuna)
- जब हम समझते हैं कि सबमें वही आत्मा है, तो दिल में अपने-आप ही करुणा का भाव आ जाता है।
- हमारे उपनिषद भी हमें यही सिखाते हैं — “सब सुखी हों, कोई दुखी न हो।” “सर्वे भवन्तु सुखिनः…”
ब्रह्मचर्य (Brahmacharya)
- ब्रह्मचर्य का मतलब केवल यौन संयम नहीं, ब्लकि अपने मन और इंद्रियों को भी काबू में रखना होता है।
- यह सिर्फ संयम नहीं, बल्कि ध्यान, पढ़ाई और आत्म-चिंतन का रास्ता है ब्रम्हचर्य।
शिक्षा और गुरु-शिष्य परंपरा
- हमारे उपनिषदों के अनुसार ज्ञान पाने के लिए गुरु का होना जरूरी है, “गुरुं एव अभिगच्छेत…”
- हर शिष्य को अपने गुरु से सवाल जवाब करना चाहिए हमारे गुरु हमें सिर्फ पढ़ते ही नहीं है ब्लकि वो हमारे जीवन को सही दिशा भी देते हैं।
मानवता और सार्वभौमिकता की भावना
- उपनिषद के अनुसार– “मैं एक हूँ, अनेक रूपों में फैला हूँ।”
- इससे हमें समझ आता है कि सब इंसान बराबर हैं, कोई छोटा-बड़ा नहीं।
- जाति, धर्म, देश ये सब बाहरी बातें हैं। अंदर से हम सब एक ही चेतना हैं।
- यह दृष्टिकोण समस्त विश्व को एक चेतना से जोड़ता है, “एकोऽहम बहुस्याम…”(मैं एक हूँ, अनेक बनना चाहता हूँ।)
वसुधैव कुटुम्बकम्
यह वाक्य महा उपनिषद के छठे अध्याय में आता है।
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
यह मेरा है, वह पराया है, यह सोच छोटे मन वालों की होती है। पूरी पृथ्वी ही परिवार है।
उपनिषदों का प्रभाव और महत्व
भारतीय दर्शन पर प्रभाव (सांख्य, योग, वेदांत)
- वेदांत दर्शन की नींव- जैसा कि मैंने पिछले ब्लॉग में बताया है कि उपनिषदों ने अद्वैत वेदांत की नींव रखी है। ब्रह्म और आत्मा की एकता, माया की अवधारणा, और मोक्ष का मार्ग, ये सभी वेदांत के मूल स्तंभ हैं। और इन सभी के बारे में हम पहले ही बता चुके हैं।
- योग दर्शन में- पतंजलि के योगसूत्रों में ईश्वर और आत्मा की अवधारणा उपनिषदों से ही प्रेरित है। ध्यान, समाधि, और आत्मसाक्षात्कार की दिशा सब इससे से मिलती है।
- सांख्य दर्शन में- सांख्य के पुरुष और प्रकृति की द्वैतवादी व्याख्या उपनिषदों के आत्मा-ब्रह्म विमर्श से प्रभावित है। यद्यपि दृष्टिकोण भिन्न है, परंतु तात्त्विक गहराई उपनिषदों से ही आई।
बुद्ध, महावीर और बाद के संतों पर प्रभाव
- बुद्ध- यद्यपि गौतम बुद्ध जी ने आत्मा के स्थायित्व को नकारा, परंतु उपनिषदों की वैराग्य, तृष्णा का त्याग, और ध्यान की परंपरा सब कुछ बौद्ध धर्म में दिखाई देता है।
- महावीर का आत्म-शुद्धि मार्ग- आत्मा की स्वतंत्र सत्ता, कर्मबंधन, और मोक्ष की अवधारणा उपनिषदों से गहराई से जुड़ी है।
भक्ति संतों पर प्रभाव
- कबीर, रैदास, गुरु नानक जैसे संतों ने उपनिषदों के अद्वैत भाव को अलग अलग रूप में प्रस्तुत किया—“जो ब्रह्म है, वही आत्मा है।”
- रामानुज और मध्वाचार्य ने उपनिषदों की व्याख्या विशिष्ट अद्वैत और द्वैत दृष्टिकोण से की। इसके बारे में भी हम चर्चा कर चुके हैं पिछले ब्लॉग में।
आधुनिक काल में उपनिषदों का महत्व (स्वामी विवेकानंद, राधाकृष्णन आदि)
स्वामी विवेकानंद-
- उपनिषदों को उन्होंने “मानवता का सर्वोच्च ज्ञान” कहा।
- उनके भाषणों में तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि जैसे महावाक्यों का बार-बार उल्लेख हुआ।
- उन्होंने आत्मबोध को सामाजिक जागरण से जोड़ा और कहा, “उठो, जागो, और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।”
डॉ. राधाकृष्णन
- उन्होंने उपनिषदों को “भारतीय दर्शन की आत्मा” कहा।
- पश्चिमी दर्शन के साथ तुलनात्मक अध्ययन में उपनिषदों को उन्होंने केंद्रीय स्थान दिया।
- शिक्षा, नैतिकता, और मानवता के मूल्यों को उपनिषदों से जोड़कर आधुनिक भारत की दिशा तय की।
अन्य आधुनिक प्रभाव–
- श्री अरविंद (Sri Aurobindo) ने उपनिषदों को योग और चेतना के विकास से जोड़ा।
- जर्मन दार्शनिक शोपेनहावर ने उपनिषदों को “मानव जाति की सबसे मूल्यवान धरोहर” कहा।
जब हम आज के इस दौर की बात करते हैं तो स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, एआई, और भागदौड़ भरी ज़िंदगी, लगता है कि सब कुछ बदल गया है। लेकिन एक सवाल आज भी वैसा ही है जैसा हजारों साल पहले था: “मैं कौन हूँ?”
क्यों ज़रूरी हैं उपनिषद आज?
आज का इंसान बाहर की दुनिया में सब कुछ खोज रहा है नौकरी, पैसा, पहचान। लेकिन भीतर की शांति गायब है। उपनिषद कहते हैं- “तत्त्वमसि” तू वही है। यह आत्मबोध आज की मानसिक अशांति का इलाज है।
जहाँ ध्यान आज एक “ट्रेंड” बन गया है, उपनिषदों में यह आत्मा से जुड़ने का माध्यम है। “ध्यानम ब्रह्म” ध्यान ही ब्रह्म है। यह तकनीक नहीं, जीवन की कला है।
आज के समाज में नैतिक संकट है झूठ, लालच, हिंसा। उपनिषद हमें सिखाते हैं: “सत्यं वद, धर्मं चर” सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो। ये सिर्फ उपदेश नहीं, जीवन जीने की दिशा है।
उपनिषद कहते हैं “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” सब कुछ ब्रह्म है। इसका मतलब है कि हर जीव, हर वस्तु एक ही चेतना से बनी है। यह विचार आज के ग्लोबल युग में एकता और सह-अस्तित्व की नींव रखता है।
उपनिषदों में ‘ऋत’ की बात होती है यानी प्रकृति का संतुलन। आज जब पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, उपनिषद हमें सिखाते हैं कि प्रकृति के साथ तालमेल ही सच्चा धर्म है।
उपनिषद कोई पुरानी किताब नहीं, बल्कि आज के इंसान की ज़रूरत हैं। ये हमें याद दिलाते हैं कि तकनीक से जीवन आसान हो सकता है, लेकिन अर्थपूर्ण तभी होगा जब हम आत्मा से जुड़ें।