वेदों का विभाजन कब, क्यों और कैसे हुआ???

(Introduction—
नमस्कार दोस्तों , जब भी हम अपने इतिहास को देखते हैं, तो एक बात साफ़ समझ में आती है—हमारी संस्कृति की जड़ें बहुत गहरी हैं। और इन जड़ों को सींचने का काम अगर किसी ने सबसे पहले किया है, तो वो हैं हमारे वेद। वेद केवल पुराने धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि उस समय की जीवंत(जिवित) आवाज़ हैं, जब मनुष्य प्रकृति से संवाद(बात) करता था, अग्नि, वायु, इंद्र और वरुण को देवता मानकर उनकी स्तुति करता था, और जीवन को एक साधना की तरह जीता था।
हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसमें आध्यात्म और विज्ञान दोनों का संगम है। यहाँ परंपरा भी है और तर्क भी। यही समन्वय(तालमेल) वेदों में देखने को मिलता है। वेद हमें केवल पूजा-पाठ का ज्ञान नहीं देते, बल्कि सोचने का तरीका, जीने का सलीका और समाज को समझने की दृष्टि भी प्रदान करते हैं। इसीलिए इन्हें अपौरुषेय कहा गया है—यानि ये किसी मनुष्य की रचना नहीं, बल्कि शाश्वत सत्य का स्वरूप हैं।


Contents

मौखिक परंपरा (श्रुति परंपरा)

लिखित रूप आने से बहुत पहले, वेदों का संचार केवल मौखिक परंपरा से हुआ। गुरुकुलों में शिष्य वेदों को अपने आचार्य से सुनते और बार-बार दोहराकर याद करते।

इस परंपरा में उच्चारण, स्वर और क्रम का इतना ध्यान रखा जाता था कि एक भी शब्द या ध्वनि गलत न हो।

इसके लिए विशेष पद्धतियाँ विकसित की गईं, जैसे—

  • पदपाठ – शब्द-शब्द अलग करके पढ़ना।
  • पदपाठ – शब्द-शब्द अलग करके पढ़ना।
  • जटापाठ और घनपाठ – शब्दों को आगे-पीछे घुमा-फिराकर गाना ताकि भूल की संभावना न रहे।

इन जटिल और वैज्ञानिक पद्धतियों की वजह से, हजारों वर्षों तक वेद मौखिक परंपरा से सुरक्षित बने रहे, यहाँ तक कि लिखित रूप में आने के बाद भी मूल स्वरूप लगभग वैसा ही रहा।

मौखिक परंपरा ने वेदों को सही रूप में संरक्षित किया। इससे हमें आज भी वेदों की वही भाषा और स्वर मिलते हैं, जो हजारों साल पहले प्रचलित थे। यही कारण है कि वेद विश्व की सबसे प्राचीन और अखंड साहित्यिक परंपरा माने जाते हैं।


  वेदों की उत्पत्ति

🕉️ आध्यात्मिक दृष्टिकोण —

वेदों को अपौरुषेय माना गया है, यानी ये मानव-निर्मित नहीं हैं। इन्हें परमेश्वर ने सृष्टि के प्रारंभ में चार ऋषियों के हृदय में प्रकट किया था:

  •  ऋग्वेद – अग्नि ऋषि को प्राप्त हुआ, ज्ञान कांड का प्रतिनिधित्व करता है।
  • यजुर्वेद – वायु ऋषि को प्राप्त हुआ, कर्म कांड से संबंधित है।
  •   सामवेद – आदित्य ऋषि को प्राप्त हुआ, उपासना कांड का प्रतिनिधित्व करता है।
  •  अथर्ववेद – अङ्गिरा ऋषि को प्राप्त हुआ, विज्ञान और जीवन की समस्याओं के समाधान पर केंद्रित 
आध्यात्मिक दृष्टिकोण → वेद शाश्वत हैं, सृष्टि के प्रारंभ से विद्यमान।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण

वेदों को अपौरुषेय (मनुष्यकृत नहीं) माना गया है। इसका अर्थ है कि ये किसी एक ऋषि या व्यक्ति द्वारा रचित नहीं हैं, बल्कि ये शाश्वत ज्ञान हैं जिन्हें ऋषियों ने श्रुति (सुनकर) प्राप्त किया।

  • परंपरा के अनुसार, ऋषि ध्यान और तपस्या की अवस्था में दिव्य ध्वनि (नाद/श्रुति) को सुनते थे और फिर उसे अपने शिष्यों को सुनाते थे।

इसीलिए वेदों को “श्रुति” कहा जाता है—क्योंकि इन्हें सुना और सुनाया गया, लिखा नहीं गया।

बाद के काल में वेदव्यास ने इन विशाल मंत्रों और सूक्तों को व्यवस्थित करके चार भागों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद) में बाँट दिया।

ऐतिहासिक/भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोण → वैदिक साहित्य (संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद) की रचना और विकास लगभग 1500–500 ई.पू. के बीच हुआ।

तो दोस्तों जैसा कि हम अपने इतिहास को पढ रहें हैं तो इसलिए हम आध्यात्मिक दृष्टिकोण को किनारे करते हैं और ऐतिहासिक नजरिए से चीजों को समझने का प्रयास करते हैं —


वेदों का विभाजन क्यूँ आवश्यक हुआ??

जब हम वेदों के इतिहास की ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि उनका विभाजन सिर्फ़ धार्मिक कारणों से नहीं हुआ था, बल्कि व्यवहारिक और सामाजिक कारणों से भी जरूरी था। जो विशेष रूप से द्वापर युग के अंत और कलियुग की शुरुआत में महसूस की गई। इसके पीछे कई महत्वपूर्ण कारण थे—

  • वेदों की विशालता और जटिलता — प्रारंभ में वेद एक ही ग्रंथ था, जिसमें एक लाख से अधिक मंत्र थे। यह इतना विशाल था कि एक व्यक्ति के लिए पूरे वेद को कंठस्थ करना कठिन हो गया था।
  • वेदव्यास और वेदों का संकलन कार्य– द्वापर युग के अंत में जब कलियुग का आरंभ हुआ, तब मनुष्यों की स्मरण शक्ति और अध्ययन क्षमता घटने लगी। इसलिए सम्पूर्ण वेद का अध्ययन और स्मरण असंभव हो गया। 

आज हमारे पास जो संहिताएँ उपलब्ध हैं, उनमें लगभग 20,000 मंत्र ही हैं। क्योंकि वेदों की अनेक शाखाएँ समय के साथ लुप्त हो गईं, स्मरण परंपरा कमजोर पड़ गई और अनेक मंत्र भूल या नष्ट हो गए। इसलिए विभाजन के बाद सुरक्षित रह पाए लगभग 20,000 मंत्र ही।

  • यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों की जटिलता– वैदिक काल में यज्ञों और अनुष्ठानों का महत्व बहुत बढ़ गया था। अलग-अलग कर्म (जैसे मंत्रोच्चारण, यज्ञ की क्रियाएँ, गान और व्याख्या) के लिए अलग-अलग विशेषज्ञों की ज़रूरत पड़ी। इसलिए वेदों को ऐसे बाँटा गया कि हर पुरोहित अपनी-अपनी भूमिका निभा सके।
  • चार पुरोहितों की आवश्यकता—

वैदिक यज्ञों में चार प्रमुख पुरोहित होते थे

होता → ऋग्वेद के मंत्रों का पाठ करता।

अध्वर्यु → यजुर्वेद से यज्ञ की क्रियाएँ करता।

उद्गाता → सामवेद के मंत्र गाता।

ब्रह्मा → अथर्ववेद के मंत्रों और ज्ञान से पूरे यज्ञ की शुद्धता देखता।

इस विभाजन ने यज्ञ की विधियों को व्यवस्थित और सरल बनाया।

  • ज्ञान को सुरक्षित रखने की आवश्यकता– विभाजन ने वेदों को अलग–अलग शिष्यों को सौंपकर मौखिक परंपरा को मज़बूत किया। इससे मंत्रों के नष्ट होने की संभावना कम हुई। हर पुरोहित अपने वेद में निपुण हो गया। इससे अनुष्ठान और सही ढंग से, बिना गलती के पूरे किए जा सके।

वेदव्यास और वेदों का संकलन कार्य

महर्षि वेदव्यास ने वेदों का जो संकलन किया, वो एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक उपलब्धि थी। उन्होंने एक ही विशाल वेद को चार भागों में बाँट दिया — ताकि लोग आसानी से उन्हें पढ़ सकें, समझ सकें और अपने जीवन में लागू कर सकें।  

अगर आपने ऊपर सही से पढा होगा तो “क्यों किया” ये तो आपको पता ही चल गया होगा। अब चलिए समझते हैं कि उन्होंने ये काम कब और कैसे किया?

वेदों का संकलन कब हुआ?

पारंपरिक मान्यता—

  • पुराणों और आस्था के अनुसार वेदों का विभाजन द्वापर युग के अंत में महर्षि वेदव्यास ने किया।
  • हिन्दू कालगणना के मुताबिक एक चतुर्युग (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि) मिलाकर लगभग 43,20,000 वर्ष का होता है। इसमें द्वापर युग की अवधि लगभग 8,64,000 वर्ष मानी जाती है।
  • कलियुग की शुरुआत परंपरा के अनुसार 3102 ईसा पूर्व से मानी जाती है।

यानी द्वापर युग के बिलकुल अंतिम चरण (लगभग 5000–5100 वर्ष पहले) वेदों का विभाजन हुआ माना जाता है।

ऐतिहासिक-दृष्टिकोण (इतिहासकारों की मान्यता)—

  • विद्वानों के अनुसार वेदों की रचना और विभाजन का काल लगभग 1500 ई.पू. से 500 ई.पू. के बीच का माना जाता है।
  • इस समय तक मौखिक परंपरा में एकत्रित वेद धीरे-धीरे चार भागों में व्यवस्थित किए गए।
  • इसे ही “वेदों का संकलन और विभाजन काल” कहा जाता है।

वेदों का संकलन कैसे हुआ?

पारंपरिक मान्यता–

1. वेदों को चार भागों में विभाजित किया 

   पहले वेद एक ही विशाल ग्रंथ था, जिसमें एक लाख से अधिक मंत्र थे।

   वेदव्यास ने इसे चार भागों में बाँटा—

   ऋग्वेद – स्तुति और प्रार्थना के मंत्र

   यजुर्वेद – यज्ञ की विधियाँ

   सामवेद – संगीतात्मक मंत्र

   अथर्ववेद – घरेलू, तांत्रिक और औषधीय ज्ञान

2. चार शिष्यों को सौंपा

  वेदव्यास ने चार प्रमुख शिष्यों को चार वेदों का ज्ञान दिया— 

     पैल को ऋग्वेद

     वैशम्पायन को यजुर्वेद

     जैमिनि को सामवेद

     सुमन्तु को अथर्ववेद

3. शाखाओं का निर्माण

   इन शिष्यों ने अपने-अपने वेदों की शाखाएँ बनाईं, जिससे वेदों का प्रचार-प्रसार हुआ और वे सुरक्षित रहे।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण (Academic History)—

 आधुनिक इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के अनुसार, वेदों की रचना और संकलन का समय लगभग 1500 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है।  

  • इस काल को वैदिक काल कहा जाता है, जिसमें आर्य सभ्यता भारत में स्थापित हुई और वेदों का मौखिक रूप से प्रचार हुआ। 
  • वेदों को लिखित रूप में बहुत बाद में संकलित किया गया पहले ये पीढ़ी दर पीढ़ी श्रुति परंपरा से याद किए जाते थे।
  • इतिहासकारों को अभी तक वेदव्यास के अस्तित्व का प्रत्यक्ष पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिला है, इसलिए वे उन्हें प्रतीकात्मक या पौराणिक व्यक्तित्व मानते हैं। 
🤔 तो फिर "वेदव्यास ने वेदों का विभाजन किया" — इसका क्या मतलब?
यह कथन ऐतिहासिक रूप से नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से सत्य माना जाता है।
"वेदव्यास" नाम एक उपाधि भी हो सकती है — यानी वेदों का व्यास (विभाजक)। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह कार्य कई पीढ़ियों में हुआ, और "वेदव्यास" एक संस्थागत नाम हो सकता है।

चार वेदों का निर्माण और स्वरूप

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वेदों के अंग – संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद

जब वेदव्यास ने वेद को चार भागों में बांटकर अपने शिष्यों को दे दिया, तो असल में यह ज्ञान के बंटवारे की पहली सीढ़ी थी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई—

उन शिष्यों ने जब वेदों को गहराई से पढ़ा, तो पाया कि इनमें तो अलग-अलग प्रकार की बातें हैं:

  • कहीं सिर्फ़ मंत्र और सूक्त,
  • तो कहीं यज्ञ की विधि और नियम,
  • और कहीं जंगल में साधना और ध्यान,
  • और कहीं-कहीं आत्मा-ब्रह्म जैसे गहरे रहस्य।

यही कारण था कि उन शिष्यों ने वेदों को अंदर से बांटकर चार भागों में कर दिया गया। 

  • वेद = संहिता(मूल ग्रंथ) + ब्राम्हण + आरण्यक + उपनिषद

संहिता (लगभग 1500 ईसा पूर्व)

  • वेदों का सबसे पुराना और मुख्य हिस्सा, जिसमें मंत्र और सूक्त हैं। 

ब्राह्मण (1000 – 800 ईसा पूर्व)

  • संहिता के मंत्रों को किस तरह से यज्ञों में प्रयोग करना है, इसकी पूरी जानकारी ब्राह्मण ग्रंथों में मिलती है।

आरण्यक (800 – 600 ईसा पूर्व) –

  • जब कुछ ऋषियों ने यज्ञ छोड़कर जंगलों में साधना करने लगे, तब उन्होंने जीवन और आत्मा पर गहराई से लिखा। 
  • ये ब्राह्मण और उपनिषद के बीच की कड़ी कहे जाते हैं। 

उपनिषद (700 – 500 ईसा पूर्व) –

  • वेदों का अंतिम और सबसे दार्शनिक हिस्सा। इसमें आत्मा (आत्मन), परमसत्य (ब्रह्म) और मोक्ष जैसे सवालों के जवाब खोजे गए। 
  • इसी को वेदांत भी कहा जाता है।
तो समझिए, वेदों बांटकर केवल चार वेदों तक सीमित नहीं रखा गया 
असल में, हर वेद के अंदर भी एक आंतरिक विभाजन हुआ, जो हमें कर्मकांड से लेकर आत्मज्ञान तक की पूरी बातेँ बताता है।

वेदों का लिखित रूप – कब और कैसे आया?

इतिहासकारों की दृष्टि से

  • वेदों की रचना वैदिक काल (लगभग 1500 ई.पू.–500 ई.पू.) में हुई थी, लेकिन उस समय लिखने की कोई लिपि प्रचलित नहीं थी।
  • भारत में लिखने की सबसे प्राचीन लिपियाँ ब्राह्मी और खरोष्ठी मानी जाती हैं, जिनका उपयोग मौर्य काल (3री शताब्दी ई.पू.) से मिलता है।
  • हमारे इतिहासकार मानते हैं कि वेद लिखित रूप में मौर्य काल के बाद धीरे-धीरे तैयार होना शुरू हुए और गुप्तकाल (4थी–6ठी शताब्दी ईस्वी) तक आते-आते वेद लिखित रूप में उपलब्ध होने लगे।

2. परंपरा की दृष्टि से

  • वेद बहुत पवित्र थे, इसलिए ऋषि-मुनियों ने उन्हें लंबे समय तक लिखित रूप में नहीं लाया। 
  • उनका मानना था कि अगर वे लिख दिए जाएंगे तो उच्चारण और लय बिगड़ सकती है।
  • इसलिए काफी समय बाद, जब याद रखने में कठिनाई होते हुए दिखाई दी, तभी उन्हें ताड़पत्र और भोजपत्र पर लिखित रूप दिया गया।
वेदों का लिखित रूप पहले भोजपत्र और ताड़पत्र पर था।
भारत में कागज़ का उपयोग 11वीं शताब्दी के बाद शुरू हुआ।
12वीं–13वीं शताब्दी से वेद और अन्य ग्रंथ भी कागज़ पर लिखे जाने लगे।

तो दोस्तों, आखिर में यही समझना ज़रूरी है कि वेदों का विभाजन सिर्फ़ धार्मिक काम नहीं था। यह उस समय की सामाजिक और शैक्षिक ज़रूरत भी थी। महर्षि वेदव्यास ने जिस तरह चारों वेदों को अलग-अलग रूप में बाँटा, उसी ने आने वाली पीढ़ियों के लिए वेदों के ज्ञान को बचाए रखा।

कह सकते हैं कि यही विभाजन हमारे धर्म, समाज और संस्कृति – तीनों की नींव को और मजबूत बनाता है। यही वजह है कि आज भी वेद हमारे लिए केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि जीने की राह दिखाने वाले ज्ञान के दीपक हैं।

वेदों का विभाजन किसने किया था?

वेदों का विभाजन महर्षि वेदव्यास ने किया था। उन्होंने ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद को अलग-अलग शिष्यों को सौंपा।

वेदों का विभाजन कब हुआ था?

वेदों का विभाजन लगभग द्वापर युग के अंत और महाभारत काल के आसपास माना जाता है, ताकि ज्ञान को संरक्षित और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे पहुँचाया जा सके।

वेदों का विभाजन क्यों आवश्यक हुआ?

वेद बहुत विशाल और जटिल थे। इन्हें एक ही बार में याद रखना कठिन था, इसलिए धार्मिक, सामाजिक और शैक्षिक कारणों से विभाजन करना पड़ा।

वेदों का विभाजन कितने भागों में हुआ?

वेदों का विभाजन चार भागों में हुआ – ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद।

वेदों के विभाजन से क्या लाभ हुआ?

विभाजन से अध्ययन आसान हुआ, समाज में शिक्षा का प्रसार हुआ और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अलग-अलग वेदों का प्रयोग संभव हो पाया।

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