हमने अपने पिछले ब्लॉग्स में लौकिक साहित्य की कुछ प्रमुख विधाओं को देखा था और आज हम इस लेख में संस्कृत के समृद्ध काव्य, महाकाव्य, गद्य, ऐतिहासिक ग्रंथों और विज्ञान-गणित से जुड़े ग्रंथों को अच्छे से समझने वाले हैं।
संस्कृत साहित्य न केवल साहित्यिक दृष्टि से महान है, बल्कि यह हमें उस समय की संस्कृति, समाज, राजनीति और वैज्ञानिक उपलब्धियों की जानकारी भी देते हैं।
Contents
- 1 महाकाव्य—
- 2 संस्कृत महाकाव्य (अष्टमहाकाव्य)
- 3 काव्य—
- 4 संस्कृत काव्य (प्रमुख, Exam-oriented)
- 5 गद्य साहित्य—
- 6 संस्कृत गद्य साहित्य (प्रमुख, Exam-Oriented)
- 7 ऐतिहासिक ग्रंथ
- 8 संस्कृत के ऐतिहासिक ग्रंथ
- 9 विज्ञान और गणित—
- 10 संस्कृत के विज्ञान और गणित ग्रंथ
- 11 संभावित प्रश्न (काव्य साहित्य)
- 12 संभावित प्रश्न (महाकाव्य साहित्य)
- 13 गद्य साहित्य (संस्कृत)
- 14 ऐतिहासिक ग्रंथ
- 15 ध्यान देने योग्य बातेँ —
- 16 . लौकिक साहित्य मुख्यतः संस्कृत में ही रचा गया था
- 17 . “लौकिक साहित्य” शब्द का संबंध संस्कृत परंपरा से है
- 18 कुमारसम्भव की रचना किसने की?
- 19 संस्कृत का सबसे प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथ कौन सा है?
- 20 मेघदूत किस प्रकार का काव्य है?
- 21 हर्षचरित किसने रचित की और यह किस पर आधारित है?
- 22 कादम्बरी का लेखक कौन है?
- 23 आर्यभटीय किसने लिखा और इसमें क्या उल्लेख है?
- 24 सुल्वसूत्र का गणित से क्या संबंध है?
- 25 Like this:
महाकाव्य—
दोस्तों, जब हम संस्कृत साहित्य की बात करते हैं तो सबसे पहले जो नाम ज़हन में आता है, वह है महाकाव्य। इसे आप संस्कृत साहित्य की “शान” भी कह सकते हैं। महाकाव्य सिर्फ़ लंबी कविता नहीं होते, बल्कि इनमें इतिहास, संस्कृति, धर्म और जीवन मूल्यों का संगम होता है।
इन रचनाओं में हमें कहीं राम और कृष्ण जैसे चरित्र मिलते हैं, तो कहीं नल–दमयंती जैसी प्रेम कहानियाँ। संस्कृत महाकाव्यों को पढ़कर ऐसा लगता है जैसे हम किसी राजमहल की भव्यता, युद्धभूमि का साहस और ऋषियों का ज्ञान सब कुछ एक साथ देख रहे हों।
संस्कृत महाकाव्य (अष्टमहाकाव्य)
| क्रमांक | महाकाव्य का नाम | रचनाकार | विषय / विशेषता |
|---|---|---|---|
| 1 | रघुवंश | कालिदास | रघु वंश के राजाओं का वर्णन |
| 2 | कुमारसम्भव | कालिदास | पार्वती–शिव विवाह कथा |
| 3 | किरातार्जुनीय | भारवि | महाभारत प्रसंग—अर्जुन व शिव |
| 4 | शिशुपालवध | माघ | कृष्ण द्वारा शिशुपाल वध |
| 5 | नैषधीयचरित | श्रीहर्ष | नल–दमयंती कथा |
| 6 | बुद्धचरित | अश्वघोष | भगवान बुद्ध का जीवन |
| 7 | भट्टिकाव्य (रावणवध) | भट्टि | रामकथा; व्याकरण-शिक्षण हेतु प्रसिद्ध |
| 8 | हरविजय (हरविजयम्) | रत्नाकर | शिव-विजय का वर्णन; परंपरानुसार प्रमुख महाकाव्य |
महाकाव्य – Exam Notes
रघुवंश (कालिदास) → रघुवंशी राजाओं की गाथा; रामकथा का भी उल्लेख।
कुमारसंभव (कालिदास) → शिव–पार्वती विवाह और कार्तिकेय जन्म कथा।
किरातार्जुनीय (भारवि) → अर्जुन और किरात (शिव) का संवाद।
शिशुपालवध (माघ) → श्रीकृष्ण द्वारा शिशुपाल वध।
नैषधीयचरित (श्रीहर्ष) → नल और दमयंती की प्रेमकथा।
भट्टिकाव्य (भट्टि) → रामकथा के माध्यम से संस्कृत व्याकरण की शिक्षा।
रामचरित (संध्याकर नन्दि) → राम और पाल वंश के रामपाल का मिलाजुला आख्यान।
हर्षचरित (बाणभट्ट) → हरषवर्धन की जीवनकथा (आंशिक रूप से ऐतिहासिक भी)।
मतलब – Exam में महाकाव्य की गिनती अष्टमहाकाव्य तक ही सीमित रहती है।
काव्य—
संस्कृत साहित्य की खूबसूरती का दूसरा बड़ा हिस्सा है काव्य। अगर महाकाव्य विशाल समुद्र है तो काव्य छोटी-छोटी नदियों की तरह हैं, जो अपने सौंदर्य, भावनाओं और कल्पना से हमें मोहित कर लेते हैं।
काव्य साहित्य में हमें कभी प्रकृति के अद्भुत चित्रण देखने को मिलते हैं, जैसे कालिदास का ऋतुसंहार, तो कभी श्रृंगार और प्रेम की मधुर झलक, जैसे मेघदूत। वहीं कादंबरी और दशकुमारचरित जैसे गद्य-काव्य हमें रोमांचक कहानियों और जीवन की गहराइयों से परिचित कराते हैं।
संस्कृत काव्य (प्रमुख, Exam-oriented)
| क्रमांक | काव्य / ग्रंथ का नाम | रचनाकार | विशेषता |
|---|---|---|---|
| 1 | मेघदूत | कालिदास | विरह-चित्रण; दूतक-काव्य का श्रेष्ठ उदाहरण |
| 2 | ऋतुसंहार | कालिदास | छः ऋतुओं का काव्यात्मक वर्णन |
| 3 | अभिज्ञानशाकुन्तलम् | कालिदास | नाटक; शकुंतला–दुष्यंत कथा (काव्य-शैली) |
| 4 | सौन्दरानन्द | अश्वघोष | नन्द के वैराग्य व मोक्ष का आख्यान |
| 5 | हर्षचरित | बाणभट्ट | हर्षवर्धन की जीवनकथा (चरित-काव्य) |
| 6 | कादम्बरी | बाणभट्ट | गद्यकाव्य / उपन्यास-स्वरूप |
| 7 | दशकुमारचरित | दंडी | दस कुमारों के साहसिक प्रसंग; गद्यकाव्य |
| 8 | काव्यादर्श | दंडी | अलंकार-शास्त्र का प्रमुख ग्रंथ |
| 9 | गीतगोविन्द | जयदेव | कृष्ण–राधा प्रेम की भक्ति-रस प्रधान रचना |
| 10 | उत्तररामचरित | भवभूति | रामकथा का उत्तर भाग; करुण-रस की प्रधानता |
| 11 | महावीरचरित | भवभूति | राम के आरंभिक जीवन का चित्रण |
| 12 | स्वप्नवासवदत्तम् | भास | प्रसिद्ध नाट्य-कृति; काव्यात्मक शैली |
काव्य – Exam Notes
मेघदूत (कालिदास) → निर्वासित यक्ष द्वारा बादल के माध्यम से संदेश प्रेषण।
ऋतुसंहार (कालिदास) → छह ऋतुओं का प्राकृतिक चित्रण।
कादंबरी (बाणभट्ट) → गद्य-काव्य; प्रेमकथा, संस्कृत का श्रेष्ठ गद्य ग्रंथ।
दशकुमारचरित (दंडी) → दस राजकुमारों के रोमांचक साहसिक वृत्तांत।
गद्यचिंतामणि (हेमचन्द्र) → संस्कृत गद्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण।
सतसाई (भर्तृहरि/हितोपदेश शैली) → नीति, श्रृंगार व वैराग्य शतक।
भामिनीविलास (जगन्नाथ पंडितराज) → श्रृंगार प्रधान काव्य।
गद्यकाव्य “प्रबोधचंद्रोदय” (कृष्णमिश्र) → सांप्रदायिक एकता व दार्शनिक विचार।
हितोपदेश व पंचतंत्र → नीति और शिक्षा प्रधान कथाएँ।
गद्य साहित्य—
हमने अब तक अपने ब्लॉग में देखा कि संस्कृत में महाकाव्य और काव्य साहित्य का कितना बड़ा महत्व है। लेकिन दोस्तों, संस्कृत की असली खूबसूरती सिर्फ़ कविता तक ही सीमित नहीं है, बल्कि गद्य (प्रोज़) में भी उतनी ही चमक दिखाई देती है।
अगर काव्य और महाकाव्य हमें भावना और कल्पना की ऊँचाइयों पर ले जाते हैं, तो गद्य साहित्य हमें समाज, राजनीति, इतिहास और नीति से सीधा परिचित करवाता है। यहाँ आपको कभी राजाओं का जीवन-वृत्त मिलेगा, कभी प्रेम और रोमांच की कथाएँ, तो कभी नीति और शिक्षा से भरे उपदेश।
हर्षचरित किसकी रचना है?
दशकुमारचरित का लेखक कौन था?
पंचतंत्र का मुख्य उद्देश्य क्या है?
संस्कृत गद्य साहित्य (प्रमुख, Exam-Oriented)
| क्रमांक | ग्रंथ / गद्य-कृति | रचनाकार | विशेषता |
|---|---|---|---|
| 1 | हर्षचरित | बाणभट्ट | सम्राट हर्षवर्धन की जीवनी; ऐतिहासिक गद्य |
| 2 | कादम्बरी | बाणभट्ट | प्रथम संस्कृत उपन्यास; रोमांटिक गद्यकाव्य |
| 3 | दशकुमारचरित | दंडी | दस कुमारों की रोमांचक कथाएँ; गद्यकाव्य |
| 4 | अवन्तिकथासप्तशती | ईश्वरदत्त | 700 कथाएँ; प्राचीन कथासंग्रह |
| 5 | बृहत्कथा | गुणाढ्य | पैशाची भाषा में रचित; मूल ग्रंथ लुप्त, पर कथाएँ संस्कृत में आईं |
| 6 | कथासरित्सागर | सोमदेव | बृहत्कथा पर आधारित; विश्व का सबसे बड़ा कथासंग्रह |
| 7 | बृहत्कथामंजरी | क्षेमेन्द्र | बृहत्कथा का संक्षिप्त संस्कृत रूप |
| 8 | पंचतंत्र | विश्णु शर्मा | नीति-कथा संग्रह; विश्व-प्रसिद्ध |
| 9 | हितोपदेश | नारायण पंडित | पंचतंत्र से प्रेरित नीति-कथाएँ |
| 10 | कम्पिल्लकथा | क्षेमेन्द्र | कथाओं का संकलन; मनोरंजन व नीति |
| 11 | राजतरंगिणी | कल्हण | कश्मीर का ऐतिहासिक वृत्तांत (1148 ई.); एकमात्र ऐतिहासिक संस्कृत गद्य |
गद्य साहित्य – Exam Notes
कादंबरी (बाणभट्ट) → संस्कृत का सर्वोत्तम गद्य-काव्य; रोमांटिक प्रेमकथा।
दशकुमारचरित (दंडी) → दस राजकुमारों के साहसिक रोमांच; सरल व रोचक गद्य।
अवन्तीसुंदरीकथा (दंडी) → अपूर्ण कृति; प्रेम और साहसिक कथाओं पर आधारित।
गद्यचिंतामणि (हेमचन्द्र) → संस्कृत गद्य की सर्वोत्तम शैली का उदाहरण।
प्रबोधचंद्रोदय (कृष्णमिश्र) → दार्शनिक-आध्यात्मिक नाटक रूप गद्य; सांप्रदायिक सहिष्णुता।
हितोपदेश (नारायण पंडित) → नीति कथाएँ; पंचतंत्र से प्रभावित।
पंचतंत्र (विश्णु शर्मा) → विश्वविख्यात नीति ग्रंथ; नैतिक व व्यावहारिक शिक्षा।
कथासरित्सागर (सোমदेव) → ब्रह्मंड की सबसे बड़ी कथा-रचना; लोककथाओं का विशाल संग्रह।
बृहत्कथा (गुणाढ्य) → मूल ग्रंथ प्राकृत में; सोमदेव ने संस्कृत में “कथासरित्सागर” के रूप में प्रस्तुत किया।
ऐतिहासिक ग्रंथ
दोस्तों, जब हम संस्कृत साहित्य को पढ़ते हैं तो हमें ज़्यादातर जगह काव्य, महाकाव्य और नाटक की चर्चा मिलती है। लेकिन एक ऐसा हिस्सा भी है जो सीधे हमारे अतीत से हमें जोड़ता है – वह है ऐतिहासिक ग्रंथ।
ये ग्रंथ केवल साहित्य नहीं हैं, बल्कि इनमें उस समय के राजाओं, समाज, संस्कृति और घटनाओं का प्रत्यक्ष वर्णन मिलता है। कहा जा सकता है कि अगर हम अपने देश के प्राचीन इतिहास को जानना चाहते हैं, तो संस्कृत के ऐतिहासिक ग्रंथ हमारी खिड़की हैं।
इनमें हमें कभी हर्षवर्धन का जीवन पढ़ने को मिलता है (हर्षचरित), कभी गुप्तकालीन राजनीति और संस्कृति (देवीचंद्रगुप्तम्) का उल्लेख मिलता है, और कभी राजतरंगिणी जैसी कृति पूरी तरह इतिहास की पुस्तक के रूप में सामने आती है।
संस्कृत के ऐतिहासिक ग्रंथ
| क्रमांक | ग्रंथ का नाम | रचनाकार | विशेषता |
|---|---|---|---|
| 1 | राजतरंगिणी | कल्हण (12वीं शताब्दी) | कश्मीर का इतिहास; एकमात्र प्रामाणिक संस्कृत ऐतिहासिक ग्रंथ |
| 2 | हर्षचरित | बाणभट्ट | सम्राट हर्षवर्धन की जीवनी; गद्य-आख्यान |
| 3 | विक्रमांकदेवचरित | बिल्हण | चालुक्य राजा विक्रमांक देव का ऐतिहासिक आख्यान |
| 4 | गौड़वहो (गौड़वध) | वाक्पति | गुर्जर-प्रतिहार राजा यशोवर्मन की विजयों का वर्णन |
| 5 | कुमारपालचरित | जयसिंह सिद्धांतसूरी | सोलंकी राजा कुमारपाल का चरित |
| 6 | प्रबोधचन्द्र्रोदय | कृष्णमिश्र | दार्शनिक-आधारित नाट्यकृति; पर इसमें समकालीन सामाजिक चित्र भी है |
| 7 | चन्द्रगुप्तचरित | विशाखदत्त | मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त का चरित (अब आंशिक रूप में उपलब्ध) |
| 8 | अशोकवदन | अज्ञात (संभवत: क्षेमेन्द्र) | सम्राट अशोक से संबंधित कथा-साहित्य |
संस्कृत में वास्तविक ऐतिहासिक ग्रंथ बहुत कम हैं।
सबसे प्रामाणिक राजतरंगिणी (कल्हण) है।
शेष ग्रंथ (हर्षचरित, विक्रमांकदेवचरित, गौड़वहो, कुमारपालचरित आदि) अर्ध-ऐतिहासिक / चरित-काव्य शैली में हैं।
Competitive Exams में सबसे ज़्यादा पूछा जाता है:
राजतरंगिणी – कल्हण
हर्षचरित – बाणभट्ट
विक्रमांकदेवचरित – बिल्हण
गौड़वहो – वाक्पति
विज्ञान और गणित—
संस्कृत साहित्य की एक और अनोखी पहचान है – इसका वैज्ञानिक और गणितीय ज्ञान। हममें से ज़्यादातर लोग संस्कृत को केवल धार्मिक ग्रंथों या काव्य-नाटकों की भाषा मानते हैं, लेकिन दोस्तों, सच्चाई यह है कि हमारे प्राचीन विद्वानों ने इसी भाषा में खगोल, गणित और विज्ञान के अद्भुत सिद्धांत लिखे।
आर्यभट, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे महागणितज्ञों ने ऐसे ग्रंथ लिखे जिनमें शून्य, दशमलव, पाई (π), ग्रहों की गति, ऋणात्मक संख्याएँ, बीजगणित और ज्यामिति का विस्तार से वर्णन मिलता है। आज की आधुनिक गणित और विज्ञान की नींव इन्हीं रचनाओं पर टिकी है।
संस्कृत के विज्ञान और गणित ग्रंथ
| क्रमांक | ग्रंथ का नाम | रचनाकार | विषय / विशेषता |
|---|---|---|---|
| 1 | आर्यभटीय | आर्यभट (476 ई.) | गणित व खगोलशास्त्र; पाई का मान, शून्य व ग्रहों की गति का वर्णन |
| 2 | सूर्यसिद्धांत | अज्ञात (प्राचीन) | खगोलशास्त्र का प्राचीनतम ग्रंथ; ग्रहों की स्थिति और समय-गणना |
| 3 | ब्रह्मस्फुटसिद्धांत | ब्रह्मगुप्त (598 ई.) | गणित व खगोल का महान ग्रंथ; शून्य और ऋणात्मक संख्याओं की अवधारणा |
| 4 | लीलावती | भास्कराचार्य (1114 ई.) | गणित की प्रसिद्ध पुस्तक; सरल भाषा में बीजगणित व अंकगणित |
| 5 | बीजगणित | भास्कराचार्य | बीजगणित पर विशेष ग्रंथ |
| 6 | सिद्धांतशिरोमणि | भास्कराचार्य | चार भागों में – लीलावती, बीजगणित, ग्रहगणित, गोलाध्याय |
| 7 | पंचसिद्धांतिका | वराहमिहिर | खगोल व ज्योतिष; पाँच सिद्धांतों का संकलन |
| 8 | बृहत्संहिता | वराहमिहिर | खगोल, ज्योतिष, वास्तु, मौसम, वनस्पति – विश्वकोशीय ग्रंथ |
| 9 | सुल्वसूत्र | वैदिक कालीन ऋषि (बौधायन, आपस्तम्ब आदि) | यज्ञ-स्थल निर्माण; ज्यामिति और पाइथागोरस प्रमेय का उल्लेख |
आर्यभटीय – आर्यभट → पाई (π) का मान, पृथ्वी की गोलाई, ग्रहों की गति।
ब्रह्मस्फुटसिद्धांत – ब्रह्मगुप्त → शून्य और ऋणात्मक संख्याएँ।
लीलावती – भास्कराचार्य → गणित की सबसे लोकप्रिय पुस्तक।
सूर्यसिद्धांत → खगोल शास्त्र का आधार।
वराहमिहिर – पंचसिद्धांतिका, बृहत्संहिता → ज्योतिष और विज्ञान।
सुल्वसूत्र → प्राचीनतम ज्यामिति।
संभावित प्रश्न (काव्य साहित्य)
1. मेघदूत का नायक कौन है?
मेघदूत का नायक एक यक्ष है, जो कि अपने स्वामी कुबेर के शाप से वह अलकापुरी से दूर कर दिया गया था और अपनी पत्नी से बिछुड़ गया। इसलिए वह बादलों के माध्यम से संदेश भेजता है।
लेखक- कालिदास
काल‐ लगभग 5वीं शताब्दी ईस्वी
2. ऋतुसंहार में कितनी ऋतुओं का वर्णन है?
👉 ऋतुसंहार में कुल छः ऋतुओं (वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर) का सुंदर वर्णन किया गया है। पढ़ते समय हर ऋतु की छवि आंखों के सामने जाग जाती है।
लेखक‐ कालिदास
काल– लगभग 5वीं शताब्दी ईस्वी
संभावित प्रश्न (महाकाव्य साहित्य)
1. किरातार्जुनीय किसकी रचना है?
👉 किरातार्जुनीय की रचना भारवि ने की थी। इसमें महाभारत की वह घटना वर्णित है जब अर्जुन ने तपस्या की और भगवान शिव किरात (शिकारी) के रूप में प्रकट होकर उससे युद्ध किया। युद्ध के बाद शिव ने अर्जुन को पाशुपतास्त्र दिए थे।
लेखक- भारवि
काल- लगभग 6वीं शताब्दी ईस्वी
2. कुमारसंभव में किस घटना का वर्णन है?
👉 कुमारसंभव की रचना कालिदास ने की थी। इसमें देवी पार्वती और भगवान शिव के विवाह तथा उनके पुत्र कार्तिकेय (कुमार) के जन्म का सुंदर वर्णन मिलता है। कार्तिकेय को ही आगे चलकर तरकासुर का वध करना था।
लेखक- कालिदास
काल- लगभग 5वीं शताब्दी ईस्वी
3. भट्टिकाव्य की विशेषता क्या है?
👉 भट्टिकाव्य की रचना भट्टि ने की थी। इसकी खासियत यह है कि इसमें रामकथा के साथ-साथ संस्कृत व्याकरण के नियम भी सिखाए गए हैं। इसीलिए इसे साहित्य और शिक्षा दोनों का अद्भुत संगम कहा जाता है।
लेखक- भट्टि
काल– लगभग 6वीं–7वीं शताब्दी ईस्वी
गद्य साहित्य (संस्कृत)
1. कादंबरी किसकी रचना है?
👉 कादंबरी संस्कृत गद्य का पहला और सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है। इसमें प्रेम और रोमांच की कथा है।
लेखक- बाणभट्ट
काल– 7वीं शताब्दी ईस्वी (हर्षवर्धन के समय)
2. हर्षचरित किसकी रचना है और किस पर आधारित है?
👉 हर्षचरित की रचना बाणभट्ट ने की थी। इसमें सम्राट हर्षवर्धन का जीवन-वृत्तांत दिया गया है।
लेखक– बाणभट्ट
काल– 7वीं शताब्दी ईस्वी
3. दशकुमारचरित किसकी रचना है?
👉 दशकुमारचरित की रचना दंडी ने की थी। इसमें दस राजकुमारों के रोमांचक और रोचक अनुभवों का वर्णन किया गया है।
लेखक- दंडी
काल- 7वीं शताब्दी ईस्वी
ऐतिहासिक ग्रंथ
1. देवीचंद्रगुप्तम् का लेखक कौन है?
👉 Ans— देवीचंद्रगुप्तम् की रचना विशाखदत्त ने की थी। इसमें गुप्तकाल की राजनीतिक घटनाओं का उल्लेख है।
काल- लगभग 5वीं शताब्दी ईस्वी
2. राजतरंगिणी को भारत का पहला ऐतिहासिक ग्रंथ क्यों माना जाता है?
👉Ans– राजतरंगिणी की रचना कल्हण ने 12वीं शताब्दी में की थी। इसमें कश्मीर के राजाओं का क्रमबद्ध इतिहास दिया गया है, इसलिए इसे भारत का पहला प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथ माना जाता है।
लेखक- कल्हण
काल- 12वीं शताब्दी ईस्वी
विज्ञान और गणित
1. आर्यभटीय किसने लिखा और इसमें क्या उल्लेख है?
👉 आर्यभटीय की रचना आर्यभट ने की थी। इसमें π (पाई) का मान, पृथ्वी की गोलाई और ग्रहों की गति का उल्लेख है।
लेखक- आर्यभट
काल- 5वीं शताब्दी ईस्वी
2. लीलावती किस विषय पर आधारित है?
👉 लीलावती की रचना भास्कराचार्य ने की थी। यह गणित की सबसे लोकप्रिय पुस्तक है, जिसमें अंकगणित और बीजगणित का सरल वर्णन है।
लेखक- भास्कराचार्य
काल- 12वीं शताब्दी ईस्वी
3. सुल्वसूत्र का गणित से क्या संबंध है?
👉 सुल्वसूत्र वैदिक कालीन ग्रंथ है। इसमें यज्ञ वेदियों के निर्माण से जुड़ी जानकारी ज्यामिति और गणितीय सूत्र दिए गए हैं। इसे भारत का सबसे प्राचीन गणितीय ग्रंथ माना जाता है।
काल– लगभग ईसा पूर्व 8वीं–6वीं शताब्दी
देखो भाई, संस्कृत का लौकिक साहित्य वास्तव में हमारे अतीत की जीवंत धरोहर है। चाहे वह कालिदास का मेघदूत और कुमारसंभव हो, बाणभट्ट की कादंबरी और हर्षचरित हो, कल्हण की राजतरंगिणी हो या फिर आर्यभट और भास्कराचार्य जैसे महान विद्वानों के वैज्ञानिक ग्रंथ— इन सबने भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया है।
अगर हम ध्यान से देखें तो यह साहित्य केवल अतीत का परिचय नहीं देता, बल्कि हमें यह भी सिखाता है कि भारतीय मनीषियों ने कला, इतिहास और विज्ञान को कितनी खूबसूरती से जोड़कर प्रस्तुत किया है।
उम्मीद है कि इस ब्लॉग से आपको परीक्षाओं की तैयारी में मदद मिलेगी और साथ ही हमारे भारतीय साहित्य की गहराई को समझने का अवसर भी मिलेगा।
ध्यान देने योग्य बातेँ —
आपने नोटिस किया होगा कि हर जगह मैंने “संस्कृत गद्य साहित्य, संस्कृत काव्य साहित्य” ही बोला है इसकी बजाय हम सिर्फ काव्य साहित्य… ही कह सकते थे तो इसका कारण यही है कि —
. लौकिक साहित्य मुख्यतः संस्कृत में ही रचा गया था
जब हम काव्य, महाकाव्य, गद्य, नाटक, ऐतिहासिक ग्रंथ, विज्ञान-गणित आदि की बात करते हैं तो उनके लगभग सारे मूल ग्रंथ संस्कृत भाषा में ही लिखे गए थे।
जैसे – कालिदास, बाणभट्ट, भारवि, दंडी, आर्यभट, भास्कराचार्य, वराहमिहिर – ये सभी विद्वान संस्कृत में ही रचनाएँ करते थे।
. “लौकिक साहित्य” शब्द का संबंध संस्कृत परंपरा से है
लौकिक (लोक में प्रचलित) साहित्य का मतलब वही साहित्य है जो धार्मिक वेदों से अलग होकर दैनिक जीवन, समाज, संस्कृति और विज्ञान से जुड़ा होता है।
यह धारा संस्कृत भाषा में ही सर्वाधिक फली-फूली।
. अन्य भाषाओं में भी साहित्य था, लेकिन लौकिक साहित्य की परिभाषा में संस्कृत ग्रंथ ही शामिल किए जाते हैं
जैसे प्राकृत, पाली या अपभ्रंश में भी ग्रंथ रचे गए हैं, लेकिन उन्हें अलग साहित्यिक परंपराओं में रखा जाता है।
जबकि जब exam या history की किताबें “लौकिक साहित्य” कहती हैं तो उसका मतलब होता है – संस्कृत लौकिक साहित्य।
इतिहास को लिखने मे किन किन स्रोतों का उपयोग किया गया है?
वेदांत, 4 महावाक्य, और शंकराचार्य जी के बारे में
अगर आपको इस blog के किसी भी हिस्से में कमी लगा हो तो हमें comment करके जरूर बताएं।
कुमारसम्भव की रचना किसने की?
कुमारसम्भव महाकवि कालिदास द्वारा रचित महाकाव्य है।
संस्कृत का सबसे प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथ कौन सा है?
संस्कृत का सबसे प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथ राजतरंगिणी है, जिसकी रचना कल्हण ने की थी।
मेघदूत किस प्रकार का काव्य है?
मेघदूत एक संदेश-काव्य (दूतकाव्य) है, जिसे कालिदास ने रचा था।
हर्षचरित किसने रचित की और यह किस पर आधारित है?
हर्षचरित की रचना बाणभट्ट ने की थी; यह सम्राट हर्षवर्धन के जीवन-वृत्त पर आधारित ऐतिहासिक/चरितात्मक गद्य है।
कादम्बरी का लेखक कौन है?
कादम्बरी की रचना बाणभट्ट ने की थी; यह संस्कृत का प्रमुख गद्य-काव्य (उपन्यास-स्वरूप) माना जाता है।
आर्यभटीय किसने लिखा और इसमें क्या उल्लेख है?
आर्यभटीय की रचना आर्यभट ने की थी; इसमें गणित व खगोलशास्त्र—जैसे पाई, पृथ्वी की परिक्रमा और ग्रहगति—का उल्लेख मिलता है।
सुल्वसूत्र का गणित से क्या संबंध है?
सुल्वसूत्र वैदिक कालीन ग्रंथ हैं; इनमें यज्ञ-स्थल निर्माण के लिए ज्यामितीय नियम और पाइथागोरस-समान सूत्रों का उल्लेख मिलता है।