योग दर्शन का इतिहास: वैदिक काल से पतंजलि योगसूत्र तक

नमस्कार दोस्तों, आज हम अपने इस ब्लॉग में योग दर्शन के इतिहास को विस्तार से समझने वाले हैं।

हमने अपने पुराने blog में सभी भारतीय दर्शन के बारे में थोड़ी चर्चा की थी, और आज उसी क्रम में हम जानेंगे कि योग शब्द की शुरुआत कहाँ से हुई? वैदिक काल में इसका क्या स्वरूप था? उपनिषदों में इसका विकास कैसे हुआ?, और फिर आखिरकार पतंजलि ने योगसूत्र के रूप में योग दर्शन को एक व्यवस्थित रूप कैसे दिया।

Contents

योग दर्शन क्या है? (इतिहास की दृष्टि से)

इतिहास की भाषा में कहें तो योग दर्शन हमारे देश की उन प्राचीन परंपराओं में से एक है, जिसने मानव जीवन के सबसे बड़े सवालों का उत्तर खोजने की कोशिश की—

  • मन को कैसे नियंत्रित किया जाए?
  • दुखों से मुक्ति कैसे मिले?
  • और आत्मा/चेतना की वास्तविक स्थिति क्या है?

‘योग’ शब्द की उत्पत्ति

योग शब्द संस्कृत की धातु ‘युज्’ से बना है, जिसका सामान्य अर्थ जोड़ना, मिलाना, एकाग्र करना, या नियंत्रित करना होता है। शुरुआती समय में योग का अर्थ सिर्फ ‘कसरत’ नहीं था, बल्कि–

  • मन को एक जगह स्थिर करना
  • इंद्रियों को नियंत्रित करना
  • आत्म-संयम और साधना के द्वारा उच्च अवस्था प्राप्त करना

यही कारण है कि हमारे प्राचीन समय में योग को तप, ध्यान और साधना की परंपरा से जोड़कर देखा जाता था। 

वैदिक काल में योग की अवधारणा (Vedic Period, 1500–600 ईसा पूर्व)

अब बात करते हैं वैदिक काल की, तो यहाँ हमें “योग दर्शन” जैसा कोई अलग ग्रंथ तो नहीं मिलता, लेकिन योग के शुरूआती बीज(roots) हमें वैदिक साहित्य में दिखाई देते हैं। जैसे 

  • ऋषि-मुनि तपस्या के माध्यम से मन को नियंत्रित करने और अंतरज्ञान प्राप्त करने की कोशिश करते थे।
  • वैदिक काल में ध्यान का उद्देश्य था आत्मा और ब्रह्म के सत्य को अनुभव करना।
  • वैदिक परंपरा में ऋषि केवल पूजा करने वाले नहीं थे, बल्कि वे अनुभव से ज्ञान प्राप्त करने वाले साधक थे।
  • और यही साधना आगे चलकर योग परंपरा की मजबूत नींव बनी।

उपनिषद काल में योग का विकास (Upanishadic Period)

वैदिक काल के बाद जब हम उपनिषदों की तरफ आते हैं, तो यहाँ योग का स्वरूप और भी ज्यादा साफ दिखाई देने लगता है। उपनिषदों में हमें बार-बार आत्मा, ध्यान, संयम और मोक्ष की चर्चा मिलती है। जैसे ‐

  • कठोपनिषद में मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने की बात कही गई है। यहाँ योग को एक आत्म- नियंत्रण की विधि के रूप में देखा गया है।
  • श्वेताश्वतर उपनिषद में ध्यान की प्रक्रिया और साधना का वर्णन मिलता है।यहाँ योग के कई ऐसे तत्व दिखते हैं जो आगे चलकर पतंजलि योगसूत्र में व्यवस्थित रूप से दिखाई देते हैं।

ईसा पूर्व, ईस्वी और शताब्दी क्या है?


महाकाव्य काल (रामायण और महाभारत) में योग परंपरा (लगभग 1000 ईसा पूर्व–300 ईसा पूर्व)

सबसे पहले आपको बता दूँ कि रामायण और महाभारत जब प्रसिद्ध हुए थे ये time period(1000-300ईसा पूर्व) उसी समय का है। 

वैदिक काल और उपनिषद काल में योग की जो शुरुआती अवधारणाएँ बनीं, वे आगे चलकर महाकाव्य काल में और अधिक स्पष्ट रूप में दिखाई देने लगती हैं। यह वह समय था जब भारत में केवल धार्मिक विचार ही नहीं, बल्कि राजनीति, समाज, नैतिकता (धर्म), और आत्म-चिंतन का भी व्यापक विकास हो रहा था। इसी कारण योग अब केवल तपस्या या ध्यान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह धीरे-धीरे जीवन जीने की एक पद्धति और धर्म-मार्ग के रूप में भी स्थापित होने लगा। महाकाव्य काल में मुख्य रूप से दो बड़े ग्रंथ माने जाते हैं- रामायण, महाभारत। 

इन दोनों ग्रंथों में योग का स्वरूप हमें कई स्तरों पर दिखाई देता है, जैसे–

  • तप, संयम, ध्यान, आत्म-नियंत्रण, और मोक्ष की धारणा। इतिहास की दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि योग की परंपरा अब समाज और संस्कृति के भीतर गहराई से प्रवेश कर चुकी थी।

रामायण काल में योग की अवधारणा (लगभग 1000 ईसा पूर्व–500 ईसा पूर्व)

रामायण को सामान्यत: एक धार्मिक और नैतिक ग्रंथ के रूप में देखा जाता है, लेकिन यदि हम इसे इतिहास की दृष्टि से समझें, तो यह हमें उस समय के आश्रम जीवन, वन संस्कृति, ऋषि परंपरा और तप-साधना के बारे में भी अच्छे से जानकारी मिलती है। रामायण में योग का स्वरूप मुख्य रूप से इन रूपों में दिखता है–

तपस्या और आत्म-संयम

रामायण काल में ऋषि-मुनियों का जीवन तपस्या और संयम पर आधारित था। वे वन में रहकर ध्यान, साधना और आत्म-नियंत्रण का अभ्यास करते थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय योग का एक बड़ा आधार था-

  • इंद्रियों पर नियंत्रण
  • मन की स्थिरता
  • साधना द्वारा आत्म-शुद्धि
आश्रम परंपरा और योग संस्कृति

रामायण में आश्रमों का वर्णन बार-बार मिलता है। आश्रम केवल रहने की जगह नहीं थे, बल्कि वे एक प्रकार से ज्ञान और साधना के केंद्र थे। इतिहास के हिसाब से यही आश्रम परंपरा आगे चलकर योग और ध्यान परंपरा के फैलाव में बहुत महत्वपूर्ण बनी।

धर्म आधारित अनुशासित जीवन

रामायण में भगवान श्रीराम का जीवन “धर्म” और “संयम” का आदर्श है। यानी योग का एक रूप यह भी था कि व्यक्ति अनुशासन, सत्य और मर्यादा के साथ जीवन जीए। यहाँ योग का अर्थ केवल “ध्यान” नहीं, बल्कि संतुलित और नियंत्रित जीवन भी था।

महाभारत में योग की भूमिका (लगभग 900 ईसा पूर्व–400 ईसा पूर्व)

महाभारत भारतीय इतिहास और संस्कृति का एक विशाल ग्रंथ है। इतिहासकारों के अनुसार इसकी परंपरा लंबे समय तक विकसित होती रही, और इसका अंतिम रूप लगभग 400 ईसा पूर्व के आसपास तक व्यवस्थित हुआ माना जाता है। महाभारत में योग करने के कई स्वरूप दिखाई देते हैं—

  • तप
  • ध्यान
  • संयम
  • मोक्ष
  • आत्मज्ञान

लेकिन महाभारत के भीतर योग पर सबसे व्यवस्थित और प्रभावशाली चर्चा हमें मिलती है भगवद्गीता में। 

भगवद्गीता में योग का ऐतिहासिक महत्व (लगभग 400 ईसा पूर्व–200 ईसा पूर्व) 

गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ मानना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि यह ग्रंथ भारतीय दर्शन और योग परंपरा के इतिहास में एक टर्निंग पॉइंट(महत्वपूर्ण मोड़) माना जाता है।

गीता में योग को इस तरह प्रस्तुत किया गया है जो व्यक्ति को जीवन के संघर्षों के बीच भी संतुलित रहने की शिक्षा देती है। गीता में योग के प्रमुख रूपों को समझाया गया है—

कर्मयोग (Karma Yoga)– 

कर्तव्य करते रहना, लेकिन फल की चिंता किए बिना। गीता का यह संदेश उस समय के समाज के लिए बहुत बड़ा था, क्योंकि इससे योग केवल जंगल या तपस्या तक सीमित नहीं रहा।

अब योग का अर्थ यह भी हो गया कि राजा, योद्धा, गृहस्थ, किसान हर व्यक्ति अपने कर्म को सही तरीके से करे, यही योग है। इतिहास की दृष्टि से कर्मयोग ने योग को समाज के हर वर्ग से जोड़ दिया।

ज्ञानयोग (Gyan Yoga)

ज्ञानयोग का अर्थ है आत्मा और शरीर के अंतर को समझना और सत्य का ज्ञान प्राप्त करना। गीता में बार-बार यह बताया गया कि शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा शाश्वत है।

यह विचार उपनिषदों से जुड़ा हुआ है, लेकिन गीता ने इसे बहुत सरल और व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत किया। 

इतिहास में ज्ञानयोग का योगदान यह रहा कि इसने योग को केवल अभ्यास नहीं माना बल्कि एक दार्शनिक समझ भी बना दिया।

भक्तियोग (Bhakti Yoga)

इसका मतलब यह है कि ईश्वर के प्रति श्रद्धा और समर्पण। गीता में यह भी कहा गया कि मोक्ष का मार्ग केवल कठोर तपस्या नहीं, बल्कि भक्ति और समर्पण भी हो सकता है।

इतिहास की दृष्टि से भक्तियोग ने आगे चलकर भारत में भक्ति आंदोलन जैसी परंपराओं को प्रेरित किया।

महाकाव्य काल में योग का व्यापक विकास (1000 ईसा पूर्व–300 ईसा पूर्व)

इस पूरे समयकाल में योग का स्वरूप धीरे-धीरे बदलता गया। उदाहरण –

  • पहले योग- तपस्या और ध्यान (ऋषि परंपरा)
  • फिर योग- आत्मज्ञान और मोक्ष की खोज (उपनिषद प्रभाव)
  • फिर योग- जीवन का संतुलन (कर्म, ज्ञान, भक्ति)

यही कारण है कि महाकाव्य काल को योग के इतिहास में एक बहुत महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। महाकाव्य काल ने योग को केवल साधना तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे, समाज के जीवन से जोड़ा, कर्म और कर्तव्य से जोड़ा, ज्ञान और भक्ति से जोड़ा और मोक्ष के मार्ग के रूप में मजबूत किया यहीं से आगे चलकर योग को सबसे व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करने का काम किया। 


बौद्ध और जैन परंपरा में योग का विकास (लगभग 600 ईसा पूर्व–200 ईसा पूर्व)

महाकाव्य काल (लगभग 1000 ईसा पूर्व–300 ईसा पूर्व) के बाद भारतीय इतिहास में एक नया और बहुत महत्वपूर्ण चरण आता है, जिसे हम सामान्य रूप से श्रवण परंपरा(Sramana Tradition) के विकास के रूप में देखते हैं।

इसी समय भारत में बौद्ध धर्म और जैन धर्म का उदय हुआ, और इनके साथ ही ध्यान, तपस्या, संयम और आत्म-नियंत्रण की परंपरा को एक नया विस्तार मिला। इतिहास की दृष्टि से यह समय (लगभग 600 ईसा पूर्व–200 ईसा पूर्व) योग के विकास में बहुत खास है, क्योंकि अब योग केवल वैदिक या ब्राह्मण परंपरा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह समाज के बड़े हिस्से में साधना (Practical Discipline) के रूप में फैलने लगा।

श्रवण परंपरा क्या थी? (Historical Background)

बौद्ध और जैन परंपरा को श्रवण परंपरा कहा जाता है, l क्योंकि इसमें व्यक्ति

  • गृहस्थ जीवन छोड़कर
  • त्याग और संयम अपनाकर
  • तपस्या और ध्यान के माध्यम से
  • सत्य और मुक्ति की खोज करता था।

यह परंपरा योग के इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ योग का मतलब था—

  • मन को नियंत्रित करना
  • इच्छाओं पर विजय पाना
  • दुखों से मुक्ति प्राप्त करना

बौद्ध परंपरा में योग का विकास (लगभग 563–483 ईसा पूर्व के बाद)

बौद्ध धर्म का उदय गौतम बुद्ध (लगभग 563–483 ईसा पूर्व) के समय में माना जाता है। भगवान बुद्ध ने जीवन के दुखों का कारण और समाधान खोजने के लिए ध्यान और साधना का मार्ग अपनाया।

ध्यान (Meditation) का व्यवस्थित रूप

बौद्ध परंपरा में ध्यान को बहुत महत्व दिया गया। यहाँ ध्यान केवल शांत बैठना नहीं था, बल्कि यह एक पूरी प्रक्रिया थी जिसमें–

  • मन को स्थिर किया जाता था
  • विचारों पर नियंत्रण किया जाता था
  • चेतना को उच्च स्तर पर ले जाया जाता था

इतिहास की दृष्टि से बौद्ध ध्यान परंपरा ने योग को एक व्यवस्थित साधना का रूप देने में मदद की।

अष्टांगिक मार्ग और योग का संबंध

बुद्ध ने आर्य अष्टांगिक मार्ग बताया, जिसमें शामिल है-

  1. सम्यक दृष्टि
  2. सम्यक संकल्प
  3. सम्यक वाणी
  4. सम्यक कर्मांत
  5. सम्यक आजीविका
  6. सम्यक प्रयास
  7. सम्यक स्मृति
  8. सम्यक समाधि

इनमें सम्यक स्मृति (Right Mindfulness) और सम्यक समाधि (Right Concentration) सीधे-सीधे ध्यान और मानसिक अनुशासन से जुड़े हैं। यानी यह योग के मन नियंत्रण वाले पक्ष को मजबूत करता है।

संघ व्यवस्था और योग संस्कृति

बौद्ध धर्म में ‘संघ’ की व्यवस्था बनी, जहाँ भिक्षु एक अनुशासित जीवन जीते थे। यह अनुशासन, संयम और ध्यान सब मिलकर योग की संस्कृति को आगे बढ़ाते हैं।

जैन परंपरा में योग का विकास (लगभग 599–527 ईसा पूर्व के बाद)

जैन धर्म का विकास मुख्य रूप से महावीर स्वामी (लगभग 599–527 ईसा पूर्व) के समय से जोड़ा जाता है। जैन परंपरा में योग का स्वरूप बौद्ध परंपरा से थोड़ा अलग दिखाई देता है, क्योंकि यहाँ योग का आधार अधिकतर तपस्या+संयम+अहिंसा पर टिका हुआ है।

कठोर तपस्या और आत्म-शुद्धि

जैन धर्म में माना जाता है कि आत्मा कर्मों के बंधन में फँसी हुई है। इस बंधन से मुक्ति के लिए जैन परंपरा ने-

  • तप
  • संयम
  • उपवास
  • इंद्रिय-निग्रह

इन सबको बहुत महत्व दिया। इतिहास के नजरिए से यह योग का एक ऐसा रूप है जिसमें शरीर और मन दोनों पर कठोर नियंत्रण रखा जाता है।

अहिंसा और संयम (योग का नैतिक आधार)

जैन परंपरा में अहिंसा केवल एक नियम नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। इससे योग में नैतिक अनुशासन(Ethical Discipline) का पक्ष बहुत मजबूत होता है।

ध्यान और समाधि की परंपरा

जैन साधु ध्यान के माध्यम से मन को शुद्ध करने का प्रयास करते थे। यानी जैन धर्म में योग का लक्ष्य था—

  • कर्मों का क्षय
  • आत्मा की शुद्धि
  • कैवल्य (मोक्ष) की प्राप्ति

बौद्ध और जैन परंपरा का योग पर ऐतिहासिक प्रभाव

अब अगर हम पूरे समयकाल (लगभग 600 ईसा पूर्व–200 ईसा पूर्व) को देखें, तो यह साफ समझ आता है कि बौद्ध और जैन परंपरा ने योग के विकास में तीन बड़े योगदान दिए-

  1. अब योग केवल विचार नहीं रहा, बल्कि नियमों और अभ्यासों वाली परंपरा बन गया।
  2. योग केवल कुछ ऋषियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भिक्षु, साधु और समाज के कई लोग इससे जुड़े।
  3. अहिंसा, संयम, सत्य, अनुशासन इनका महत्व योग परंपरा में और मजबूत हो गया।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि 600 ईसा पूर्व–200 ईसा पूर्व के बीच बौद्ध और जैन परंपरा ने योग को एक नई दिशा दी। इस दौर में योग का मतलब केवल ध्यान नहीं था, बल्कि यह बन गया–

  • मानसिक अनुशासन
  • नैतिक संयम
  • तपस्या और आत्म-शुद्धि
  • और मोक्ष प्राप्ति का व्यवस्थित मार्ग

और इसके बाद योग परंपरा को सबसे व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया पतंजलि ने योगसूत्र में, जिसने योग दर्शन को एक अलग और स्पष्ट पहचान दी।


पतंजलि और योगसूत्र (लगभग 200 ईसा पूर्व–200 ईस्वी)

बौद्ध और जैन परंपरा (लगभग 600 ईसा पूर्व–200 ईसा पूर्व) के बाद योग की साधना भारत में काफी फैल चुकी थी। अलग-अलग परंपराओं में ध्यान, तपस्या, संयम और समाधि के अपने-अपने तरीके मौजूद थे। लेकिन इस समय तक योग की एक समस्या यह थी कि योग का अभ्यास तो बहुत लोग कर रहे थे, लेकिन योग का कोई एक व्यवस्थित, निश्चित और संगठित रूप नहीं था।

ऐसी परिस्थिति में महर्षि पतंजलि ने योग को एक सिस्टम (System) और दर्शन (Darshan) के रूप में व्यवस्थित करने का सबसे बड़ा कार्य किया। पतंजलि ने योग की पुरानी परंपराओं को एक जगह समेटकर, उन्हें नियमबद्ध किया और एक महान ग्रंथ दिया जिसे हम आज पतंजलि योगसूत्र के नाम से जानते हैं।

महर्षि पतंजलि कौन थे?(Historical Background)

इतिहास की दृष्टि से पतंजलि का व्यक्तित्व थोड़ा रहस्यमय माना जाता है, क्योंकि उनके जीवन से जुड़ी पूरी जानकारी स्पष्ट रूप से नहीं मिलती। फिर भी अधिकांश विद्वान पतंजलि को लगभग 200 ईसा पूर्व से 200 ईस्वी के बीच का मानते हैं।

यही वह समय था जब भारत में दार्शनिक परंपराएँ मजबूत हो रही थीं, अलग-अलग विचारधाराएँ विकसित हो रही थीं और ज्ञान को ग्रंथों के रूप में व्यवस्थित किया जा रहा था

इसलिए पतंजलि का योगदान केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और बौद्धिक भी माना जाता है।

योगसूत्र की रचना क्यों महत्वपूर्ण थी?

महर्षि पतंजलि से पहले भी योग था, लेकिन वह अधिकतर परंपरा के रूप में अनुभव और अभ्यास के रूप में, ऋषियों और साधकों की विधि के रूप में चल रहा था। पतंजलि ने पहली बार योग को– 

  • एक दर्शन बनाया
  • एक व्यवस्थित पद्धति बनाया
  • एक साफ लक्ष्य वाला मार्ग बनाया

यानी पतंजलि ने योग को “साधना” से उठाकर “योग दर्शन” के रूप में स्थापित कर दिया। पतंजलि ने योग की जो definition दी, वह आज भी सबसे ज्यादा famous है-

  • “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”

अर्थात– योग मन की वृत्तियों (विचारों) को रोकने का नाम है। इसका मतलब यह है कि योग का असली उद्देश्य केवल शरीर को स्वस्थ रखना नहीं, बल्कि

  • मन को शांत करना
  • विचारों को नियंत्रित करना
  • और आत्म-ज्ञान की स्थिति तक पहुँचना है।

योगसूत्र में पतंजलि ने योग को केवल “आसन” तक नहीं रखा, बल्कि उसका अंतिम लक्ष्य बताया

  • समाधि

इतिहास की दृष्टि से यह बात बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे योग एक ऐसी साधना बन गया जो मन की अशांति को खत्म कर सकती है और मोक्ष की दिशा में ले जा सकती है। 

पतंजलि योगसूत्र के चार पाद (Four Chapters)

पतंजलि ने योगसूत्र को चार भागों में व्यवस्थित किया, जिन्हें “पाद” कहा जाता है

  1. समाधि पाद– योग और समाधि की चर्चा
  2. साधन पाद– योग का अभ्यास कैसे करें?
  3. विभूति पाद– योग से मिलने वाली सिद्धियाँ/शक्तियाँ
  4. कैवल्य पाद– मोक्ष(कैवल्य) का अंतिम लक्ष्य

इतिहास के नजरिए से यह एक बहुत बड़ी बात है, क्योंकि इससे योग पहली बार एक पूर्ण दर्शन प्रणाली के रूप में सामने आया।

पतंजलि का सबसे बड़ा योगदान (अष्टांग योग)

पतंजलि ने योग के अभ्यास को 8 भागों में बाँटा, जिसे हम कहते हैं अष्टांग योग –

  • यम– (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह)
  • नियम– (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान)
  • आसन– शरीर को स्थिर और स्वस्थ रखने का अभ्यास
  • प्राणायाम– श्वास नियंत्रण द्वारा मन पर नियंत्रण
  • प्रत्याहार– इंद्रियों को विषयों से हटाना
  • धारणा– मन को एक जगह टिकाना
  • ध्यान– लगातार एकाग्रता की अवस्था
  • समाधि– पूर्ण आत्म-स्थिरता की अवस्था

इतिहास की दृष्टि से अष्टांग योग का महत्व इसलिए है क्योंकि इससे योग बिखरा हुआ नहीं रहा, बल्कि एक step-by-step method बन गया।

पतंजलि को योग दर्शन का सबसे बड़ा संस्थापक(Systematizer) माना जाता है।

मौर्य काल में योग की स्थिति (लगभग 322–185 ईसा पूर्व)

पहले हमारा देश छोटे छोटे राज्यों में बिखरा हुआ था जिस पर अलग-अलग शासक सासन करते थे लेकिन मौर्य वंश (खासकर चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक) के समय भारत के कई छोटे-छोटे राज्य/जनपद एक ही बड़े साम्राज्य (Empire) के अंदर आ गए। जैसे- मगध, अवंति, कौशल, काशी, गांधार आदि क्षेत्र। 

और इसी समय महर्षि पतंजलि ने योग को व्यवस्थित रूप देने का काम किया। पतंजलि ने योग को सिर्फ “तपस्या” नहीं, बल्कि एक पूरा system बना दिया। जिसमें यम-नियम, आसन-प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा-ध्यान, समाधि जैसे स्पष्ट चरण दिए गए। इससे योग को शास्त्रीय आधार मिला और वह पूरे देश में स्वीकार्य होने लगा।

  • इस समय योग ब्राह्मण परंपरा, बौद्ध ध्यान परंपरा, जैन साधना तीनों में किसी न किसी रूप में मौजूद रहा। यही कारण है कि योग एक धर्म नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति का हिस्सा बन गया।

गुप्त काल में योग की स्थिति (लगभग 320–550 ईस्वी)

गुप्त काल को भारत का “स्वर्ण युग” कहा जाता है, क्योंकि इस समय शिक्षा, दर्शन, साहित्य, कला, धर्म सबका विकास हुआ। इसी दौर में योग परंपरा को भी सामाजिक स्वीकार्यता और सांस्कृतिक संरक्षण मिला।

  • इस समय बड़े शिक्षण केंद्रों में दर्शन और साधना की शिक्षा दी जाती थी। योग को मानसिक अनुशासन, आत्म-नियंत्रण, साधना पद्धति के रूप में आगे बढ़ाया गया। यही कारण है कि योग पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रह सका।

मध्यकाल में योग का नया रूप: हठयोग परंपरा (लगभग 800–1500 ईस्वी)

मौर्य–गुप्त काल तक योग मुख्य रूप से ध्यान, संयम और मोक्ष साधना के रूप में विकसित हो चुका था। लेकिन जैसे-जैसे भारत का सामाजिक और धार्मिक वातावरण बदला, वैसे-वैसे योग भी केवल दार्शनिक साधना न रहकर व्यावहारिक और शरीर-आधारित अभ्यास की दिशा में बढ़ने लगा।

  • यही कारण है कि मध्यकाल में योग का एक नया रूप सामने आया, जिसे हम हठयोग (Hatha Yoga) के नाम से जानते हैं। इस काल में हठयोग का सबसे बड़ा केंद्र और संरक्षक बना नाथ संप्रदाय।

हठयोग क्या है? (Hatha Yoga Meaning)

हठयोग का सामान्य अर्थ बलपूर्वक योग नहीं है, बल्कि यह शरीर और प्राण पर नियंत्रण द्वारा मन को स्थिर करने की साधना है। हठयोग में मुख्य रूप से शामिल होता है–

  • आसन (शरीर को स्थिर करना)
  • प्राणायाम (श्वास और ऊर्जा का नियंत्रण)
  • मुद्रा और बंध (ऊर्जा को सही दिशा देना)
  • शुद्धि क्रियाएँ (शरीर की सफाई)
  • ध्यान और समाधि की तैयारी

यानी हठयोग का लक्ष्य अंत में वही है जो पतंजलि योग का था, मन की स्थिरता और आत्मिक उन्नति, लेकिन रास्ता थोड़ा अलग है।

मध्यकाल में हठयोग की जरूरत क्यों पड़ी?

  • मध्यकाल में समाज में कई बदलाव हुए अलग-अलग धार्मिक धाराएँ फैलने लगीं 
  • भक्ति आंदोलन तेज़ हुआ
  • साधना परंपराएँ आम लोगों तक पहुँचीं
  • योग को जंगल/आश्रम से निकालकर जीवन से जोड़ने की जरूरत हुई

इसलिए योग को ऐसा रूप मिला जो—

  • साधारण व्यक्ति भी कर सके
  • शरीर को मजबूत बनाए
  • ध्यान के लिए आधार तैयार करे

यहीं से हठयोग लोकप्रिय हुआ।

नाथ संप्रदाय कौन था?

नाथ संप्रदाय हमारे देश की एक योगी परंपरा है, जिसने योग को सिर्फ सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन पद्धति बना दिया। नाथ योगियों की पहचान होती थी- 

  • तप
  • योग साधना
  • वैराग्य
  • और गुरु-शिष्य परंपरा

नाथ संप्रदाय ने योग को आध्यात्मिक लक्ष्य के साथ-साथ शारीरिक साधना से जोड़ा।

नाथ संप्रदाय में प्रमुख योगाचार्य

नाथ परंपरा के इतिहास में कुछ नाम बहुत प्रसिद्ध हैं–

आदिनाथ / शिव

  • नाथ परंपरा में शिव को आदि गुरु माना जाता है।

मत्स्येन्द्रनाथ (लगभग 9वीं–10वीं शताब्दी ईस्वी)

  • मत्स्येन्द्रनाथ को नाथ संप्रदाय के शुरुआती महान गुरु माना जाता है।

गोरखनाथ (लगभग 11वीं–12वीं शताब्दी ईस्वी)

  • गोरखनाथ नाथ संप्रदाय के सबसे प्रसिद्ध योगी माने जाते हैं।
  • उन्होंने योग को आम लोगों तक पहुँचाया और हठयोग को एक मजबूत परंपरा का रूप दिया।
  • इसलिए कई जगह हठयोग परंपरा को “गोरखनाथ की परंपरा” भी कहा जाता है।

हठयोग में क्या नया आया? (योग का नया रूप)

पतंजलि योग में ध्यान और मन-नियंत्रण मुख्य था, जबकि हठयोग में ध्यान तक पहुँचने के लिए पहले–

  • शरीर को साधने पर जोर– हठयोग में माना गया कि जब तक शरीर स्वस्थ और स्थिर नहीं होगा, तब तक ध्यान टिकेगा नहीं।
  • प्राण शक्ति का नियंत्रण– हठयोग में प्राणायाम और कुंडलिनी जैसी अवधारणाएँ ज्यादा प्रमुख हो जाती हैं।
  • शुद्धि क्रियाओं का विकास– मध्यकाल में योग की कई शुद्धि क्रियाएँ सामने आईं, जैसे- नेति, धौति, बस्ती, त्राटक, कपालभाति इनका उद्देश्य शरीर को तैयार करना था
  • ये चीजें पतंजलि के योगसूत्र में इतनी विस्तार से नहीं मिलतीं, लेकिन हठयोग में ये महत्वपूर्ण बन गईं।
  • हठयोग ग्रंथ और साहित्य (Medieval Yoga Texts)– मध्यकाल में हठयोग पर कई ग्रंथ लिखे गए, जिनमें योग की क्रियाएँ और विधियाँ व्यवस्थित रूप से बताई गईं। इन ग्रंथों में प्रमुख हैं—
    • हठयोग प्रदीपिका
    • घेरंड संहिता
    • शिव संहिता

इन ग्रंथों ने योग को “शास्त्रीय आधार” दिया और आगे आने वाले समय में योग के प्रसार में बड़ी भूमिका निभाई।


आधुनिक काल में योग का पुनर्जागरण (लगभग 1800 ईस्वी–वर्तमान)

समय के साथ हमारे देश में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन हुए। खासकर औपनिवेशिक काल (British Period) में भारतीय परंपराओं को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसी दौर में योग भी एक बार फिर नए रूप में जागृत हुआ, जिसे हम “आधुनिक योग का पुनर्जागरण” कह सकते हैं।

यह पुनर्जागरण केवल साधना तक सीमित नहीं था, बल्कि योग को राष्ट्रीय चेतना, शारीरिक स्वास्थ्य, आध्यात्मिक पहचान और वैश्विक मंच तक ले जाने वाला आंदोलन बना।

आधुनिक युग में योग के पुनर्जागरण के कारण

तो भाई आधुनिक काल में योग के पुनर्जागरण के पीछे कई ऐतिहासिक कारण थे–

औपनिवेशिक काल की चुनौती (लगभग 1757–1947)

ब्रिटिश शासन के दौरान हमारे समाज में यह भावना बनी कि

हमारी संस्कृति, शिक्षा और परंपराओं को कमतर(नीचा) दिखाया जा रहा है। इसलिए कई भारतीय विचारकों ने योग और वेदांत को भारतीय पहचान और गौरव के रूप में प्रस्तुत किया।

आधुनिक शिक्षा और विज्ञान का प्रभाव

अब लोग केवल “धार्मिक” कारण से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, मन की शांति, अनुशासन के लिए भी योग अपनाने लगे।

स्वामी विवेकानंद और योग का वैश्विक परिचय (1863–1902 ईस्वी)

स्वामी विवेकानंद जी को आप सभी अच्छे से जानते होंगे, आधुनिक काल में योग के पुनर्जागरण के सबसे बड़े स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने योग को केवल आसन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे आध्यात्मिक चेतना और मानव-कल्याण का मार्ग बताया।

1893 का शिकागो भाषण: योग का विश्व मंच पर प्रवेश

स्वामी विवेकानंद ने 1893 ईस्वी में “विश्व धर्म महासभा” (Chicago) में भारत की आध्यात्मिक परंपरा का परिचय कराया। इसके बाद पश्चिमी देशों में योग और वेदांत को लेकर रुचि बढ़ी। अद्वैत वेदांत

राजयोग का प्रचार

विवेकानंद जी ने योग को विशेष रूप से राजयोग के रूप में समझाया जहाँ ध्यान, मन-नियंत्रण और आत्म-ज्ञान को मुख्य माना गया। यानी विवेकानंद ने योग को “अंधविश्वास” नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक अनुशासन की तरह प्रस्तुत किया।


योग दर्शन हमारे देश की एक प्राचीन और महत्वपूर्ण परंपरा है, जो वैदिक काल से लेकर आज तक लगातार विकसित होती रही है। यह सिर्फ शरीर को स्वस्थ रखने का तरीका नहीं, बल्कि मन को शांत करने और जीवन में संतुलन लाने का मार्ग भी है। इसलिए भारतीय सभ्यता में योग का योगदान बहुत बड़ा रहा है।

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