भारत का भौगोलिक विभाजन 

नमस्कार दोस्तों आज हम अपने देश के भौगोलिक ढांचा किस तरह से है इसके बारे में पढ़ते हैं, लेकिन इस बात का ध्यान रखना कि यहाँ geography को हम इतिहास के नजरिए से पढ़ेंगे। एक बार फिर से आप सभी के मन में यह विचार आएगा कि इसे पढने की क्या जरूरत है तो आपको बता दें कि जब हम धीरे-धीरे प्राचीन इतिहास को पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि‐-

सिंधु घाटी सभ्यता एक विशिष्ट(particular) जगह पर हमें दिखाई देती है, इसी तरह से हम देखते हैं महाजनपद जिसमें से एक था मगध महाजनपद वो किस तरह से पूरे के पूरे एक साम्राज्य में परिवर्तित हो जाता है। 16 महाजनपद में से कोई भी हो सकता था तो मगध ही क्यूँ साम्राज्य में बदला???

प्राचीन भारतीय इतिहास : एक संक्षिप्त लेकिन सम्पूर्ण परिचय

प्राचीन भारतीय इतिहास : प्रागैतिहासिक, आद्य ऐतिहासिक, ऐतिहासिक काल

आप सभी ने प्राचीन समय से ही भारत में जो भी आक्रमण(invasion) देखे है, ईरानी हो गए, यूनानी हो गए, सक, कुषाण etc वो सभी आक्रमण भारत के  उत्तर पश्चिमी(north western) क्षेत्र से ही हुआ है तो ऐसा क्या कारण था कि ये सभी आक्रमण भारत के north western से ही हो रहा था??? 

अंग्रेज भारत में समुद्री रास्ते से व्यापार करने के लिए आय थे लेकिन उसके पहले तक भारत के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र से ही सभी invasion हुए हैं। 

 यह सभी चीजें जानने के लिए हमें भारत का भौगोलिक ढांचा जानना और समझना भी होगा। 

भारतीय उपमहाद्वीप का भौगोलिक विभाजन

देखो धरती की सतह कई बड़े-बड़े टुकड़ों में बंटी है, इन्हें टेक्टोनिक प्लेट (Tectonic Plates) कहते हैं। इन प्लेटों के धीरे-धीरे हिलने/सरकने की प्रक्रिया को प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) या महाद्वीपीय प्रवाह (Continental Drift) कहते हैं। 

अब सवाल आया होगा कि खिसकता क्यूँ है?

देखो ये तो सभी जानते हैं कि हमारी पृथ्वी अंदर से बहुत गर्म है पृथ्वी के अंदर मेंटल (Mantle) नाम की परत में गर्म लावा लगातार घूमता रहता है, जिसकी वजह से ये विवर्तनिकी घटनायें होती रहती है। 

गोंडवानालैण्ड से अलग होकर उत्तर की ओर बढ़ता भारतीय भू-भाग

भारतीय भू-भाग लगभग 20–22 करोड़ वर्ष पहले गोंडवानालैण्ड से अलग होकर उत्तर की ओर बढ़ा और लगभग 5 करोड़ वर्ष पहले यूरेशियाई भू-भाग से टकराने पर हिमालय पर्वत का निर्माण हुआ। यह उपमहाद्वीप पांच देशो में बँटा है भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और पकिस्तान। गोंडवानालैण्ड के टूटने से भारत (Indian Plate), अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका जैसे वर्तमान महाद्वीप बने हैं।


इतिहास मे मानसून की भूमिका 

भारतीय उपमहाद्वीप का अधिकांश भाग उष्ण कटिबंध(पृथ्वी पर एक बीच का इलाका होता है जहाँ साल-भर ज्यादा गर्मी पड़ती है इसे ही उष्ण कटिबंध कहते हैं।)  में पड़ता है और इसके इतिहास में मानसून का बहुत प्रभाव है —

भारत के मध्य भाग से गुजरती कर्क रेखा (Tropic of Cancer)

दक्षिण-पश्चिम मानसून जून से अक्टूबर तक हमारे देश में वर्षा लाता है। इसी बारिश पर देश के अधिकतर हिस्सों, खासकर उत्तर भारत की खरीफ फसलें(धान/चावल, मक्का, बाजरा, कपास) निर्भर करती थीं। 

सर्दियों में आने वाली एक मौसमीय हवा/तूफ़ान, जो पश्चिम (मध्य एशिया–भूमध्यसागर क्षेत्र) से चलकर भारत के उत्तर-पश्चिम भाग में पहुँचती है जिसे पश्चिमी विक्षोभ कहते हैं। और इसके फायदे कुछ इस तरह से हैं-

  • दिसंबर से मार्च के बीच हल्की बारिश और कभी-कभी ओलावृष्टि होती है
  • पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश आदि में सर्दियों की बारिश मिलती है। 
  • यही बारिश रबी फसलों (जैसे गेहूँ, चना) के लिए बहुत फायदेमंद होती है।

प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों, खासकर तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में, अक्टूबर से मध्य दिसंबर तक अधिकतर बारिश उत्तर-पूर्वी मानसून की वजह से होती है। (यानी वहाँ मुख्य बरसात जून-जुलाई में नहीं, बल्कि अक्टूबर-दिसंबर में होती है।)

लगभग ईसा की पहली सदी (करीब 2000 साल पहले) लोगों को यह पता चल गया कि मानसूनी हवाएँ किस दिशा में और कब चलती हैं। समुद्री व्यापारी इन्हीं हवाओं का सहारा लेकर जहाज़ चलाने लगे।

  • भारत और पश्चिम एशिया-भूमध्यसागर (रोम आदि) के बीच समुद्री व्यापार शुरू हुआ
  • साथ-साथ दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया, मलेशिया आदि) से भी संपर्क बढ़ा

उत्तर-पश्चिम दिशा में सुलेमान पर्वत शृंखला, हिमालय की ही एक कड़ी मानी जाती है। इस क्षेत्र में खैबर, बोलन और गोमल दर्रे (पहाड़ों के रास्ते) थे, जिनसे होकर लोग आ-जा सकते थे। इन दर्रों के कारण ही हमारे देश का मध्य एशिया और पश्चिमी एशिया से व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क बन सका। इन्हीं रास्तों से ईरान, अफगानिस्तान और मध्य एशिया के कई लोग व्यापारी, यात्री, प्रवासी और कभी-कभी आक्रमणकारी बनकर भारत आए और भारतीय लोग भी उधर गए।

हिमालय के इलाके में कश्मीर और नेपाल की घाटियाँ बहुत अहम/महत्तवपूर्ण थीं। कश्मीर घाटी का भारत के मैदानी इलाकों से लगातार आर्थिक और सांस्कृतिक रिश्ता बना रहा। यही वजह है कि बाद में यह जगह मध्य एशिया में बौद्ध धर्म फैलाने का बड़ा केंद्र बनी। उसी तरह गंगा के मैदानों से लोग पहाड़ी रास्तों से होकर नेपाल घाटी पहुँचे और वहाँ की संस्कृति को आगे बढ़ाने में मदद की।  


मैदानी क्षेत्रों की कछारी (बहुत उपजाऊ और गीली) मिट्टी में बहुत घने जंगल उग आते थे, जिन्हें काटना और साफ़ करना मुश्किल था। इसके मुकाबले हिमालय की तराई (पहाड़ के नीचे वाला समतल इलाका) के जंगल कम घने थे, इसलिए उन्हें साफ़ करना आसान था। इस वजह से लोग पहले तराई के क्षेत्रों में बसने लगे।

धीरे-धीरे लोगों ने आने-जाने के रास्ते भी इन्हीं तराई क्षेत्रों में बनाए। ये रास्ते पश्चिम से पूर्व और पूर्व से पश्चिम तक फैल गए और यात्रियों व व्यापारियों के मुख्य मार्ग बन गए।

इसी कारण ईसा पूर्व 6वीं सदी में सबसे शुरुआती कृषि बस्तियाँ तराई इलाकों में बस गईं। खेती करना आसान था, पानी भी मिलता था और रास्ते भी मौजूद थे। बाद में यही रास्ते व्यापार के लिए इस्तेमाल होने लगे और एक क्षेत्र के लोग दूसरे क्षेत्र से जुड़ने लगे।


प्राचीन भारत का मुख्य भाग नदियों वाला क्षेत्र था, जहाँ उष्णकटिबंधीय मानसून की अच्छी बारिश होती थी। इसी वजह से यहाँ की बड़ी नदियाँ हमेशा पानी से भरी रहती थीं और लोगों के रहने-बसने व खेती के लिए यह क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण बन गया। इन नदी क्षेत्रों में मुख्य रूप से सिंधु का मैदान, सिंधु-गंगा जल विभाजक क्षेत्र, गंगा की घाटी और ब्रह्मपुत्र की घाटी शामिल हैं। 

पश्चिम से पूर्व की ओर जाने पर बारिश लगातार बढ़ती जाती है। सिंधु क्षेत्र में लगभग 25 सेमी वर्षा होती है, पश्चिमी गंगा घाटी में उससे अधिक, मध्य गंगा घाटी में और ज्यादा, तथा ब्रह्मपुत्र घाटी में लगभग 250 सेमी तक वर्षा पहुँच जाती है।

घने जंगलों और कठोर जमीन वाले इलाकों को साफ़ करना पहले आसान नहीं था। जब तक लोहे के औजार नहीं आए, तब तक लोग बड़े पैमाने पर खेती नहीं कर पाते थे। इसलिए सभ्यताओं का विकास धीरे-धीरे पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ता गया।

  • सबसे पहले सिंधु और गंगा के मैदानों में उपजाऊ भूमि और अच्छी फसल के कारण बड़ी संस्कृतियाँ विकसित हुईं जैसे सिंधु घाटी सभ्यता और बाद में वैदिक संस्कृति।
  • फिर जब लोहे का उपयोग शुरू हुआ, तो लोग जंगल काटकर आगे बढ़े और मध्य गंगा घाटी में वैदिकोत्तर संस्कृति खूब विकसित हुई।  
  • आगे चलकर गुप्तकाल में निचली गंगा घाटी का महत्व बढ़ा और अंततः प्रारम्भिक मध्ययुग में असम सहित पूरी ब्रह्मपुत्र घाटी भी महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गई। 

नदियों, भूगोल और संसाधनों का इतिहास पर प्रभाव (संक्षिप्त)

  • प्राचीन काल में सड़कें कम थीं, इसलिए नदियाँ ही संचार और व्यापार का मुख्य साधन थीं।
  • अशोक ने अपने प्रस्तर स्तम्भ नदियों के रास्ते दूर-दूर तक पहुँचाए और अंग्रेज़ों के समय तक नदी मार्ग उपयोग में रहे।
  • बाढ़ से उपजाऊ मिट्टी बनती थी, इसलिए अधिकांश प्राचीन नगर नदी तटों पर बसे।

नदियाँ प्राकृतिक सीमाएँ

  • कलिंग — महानदी से गोदावरी के बीच
  • आंध्र — गोदावरी और कृष्णा के बीच
  • तमिल क्षेत्र — कृष्णा और वैगई के बीच
  • महाराष्ट्र — ताप्ती और भीमा के बीच
  • कर्नाटक — कृष्णा और तुंगभद्रा के बीच
  • तुंगभद्रा नदी ने उत्तर (चालुक्य-राष्ट्रकूट) और दक्षिण (पल्लव-चोल) राज्यों के बीच सीमा का काम किया

पर्वत/क्षेत्रीय द्वारा भौगोलिक विभाजन

  • अरावली ने सिंधु-गंगा और दक्षिणी भागों को अलग किया
  • विंध्य पर्वत ने उत्तर और दक्षिण भारत को विभाजित किया
  • गुजरात तट के बंदरगाहों से समुद्री व्यापार विकसित हुआ, मालवा उसका पृष्ठप्रदेश था

भाषा और संस्कृति द्वारा भौगोलिक विभाजन

  • कठिन यातायात के कारण क्षेत्रीय संस्कृतियाँ विकसित हुईं
  • उत्तर भारत — हिन्द-आर्य भाषाएँ
  • दक्षिण भारत — द्रविड़ भाषाएँ
  • संस्कृत पूरे देश में समझी जाती थी
  • विंध्य क्षेत्र में आदिवासी, तटीय क्षेत्रों में व्यापारी और अप्रवासी बसे

प्राकृतिक संसाधन

  • जंगल — लकड़ी, ईंधन, चारा
  • ताँबा — राजस्थान (खेत्री), झारखंड
  • काँसा — टिन बाहर से (अफगानिस्तान, बर्मा, मलय)
  • लोहा — झारखंड, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, आंध्र (हथियार व खेती के औज़ार → राज्यों की शक्ति बढ़ी)
  • सोना — कर्नाटक (कोलार) व नदी जमाव; रोमन साम्राज्य से भी आया
  • चाँदी — कम मात्रा (मुंगेर क्षेत्र)
  • रत्न-मोती — मध्य व दक्षिण भारत; प्राचीन काल में निर्यात

ताम्बा उपयोग में लाई गयी पहली धातु थी, इसलिए हिन्दू इसे पवित्र मानने लगे।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि हमारे देश का भूगोल नदियाँ, पर्वत, जलवायु और खनिज संपदा, यहाँ की सभ्यताओं, राज्यों, व्यापार और संस्कृति के विकास का मुख्य आधार रहा। इसलिए प्राचीन भारतीय इतिहास को समझने के लिए भौगोलिक संरचना का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।

इतिहास जानने के स्रोत: पुरातात्विक और साहित्यिक

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