लौकिक साहित्य – प्राचीन भारत का सांस्कृतिक इतिहास

हमने अपने पिछले ब्लॉग्स में वैदिक साहित्य, वेद, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक और उपनिषद जैसी रचनाओं के बारे में विस्तार से चर्चा की थी। वहाँ हमने देखा कि ये ग्रंथ हमें धार्मिक विचार, यज्ञ परंपरा, दर्शन और आत्मा-परमात्मा से जुड़े सिद्धांतों की जानकारी देते हैं।

लेकिन अब एक सवाल उठता है 

क्या प्राचीन भारत को समझने के लिए केवल वैदिक साहित्य ही पर्याप्त है?

बिल्कुल नहीं। अगर हम सिर्फ वैदिक ग्रंथों तक ही सीमित रह जाएँ, तो हमें धर्म और दर्शन की बातें तो मिलेंगी, लेकिन उस समय के समाज, राजनीति, संस्कृति, नाटक, विज्ञान, चिकित्सा और साहित्यिक सौंदर्य को पूरी तरह नहीं समझ पाएँगे।

यहीं से शुरू होता है हमारा अगला महत्वपूर्ण विषय — लौकिक साहित्य (Secular Literature)।


Contents

लौकिक साहित्य क्या है?

आसान शब्दों में कहें तो वह साहित्य जो यज्ञ और वैदिक अनुष्ठानों से अलग होकर समाज के वास्तविक जीवन जैसे राजनीति, प्रशासन, चिकित्सा, शिक्षा, कला, विज्ञान और लोकपरंपराओं की जानकारी देता है, उसे इतिहासकार लौकिक साहित्य कहते हैं। हमारे देश के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास को समझने में यह साहित्य विशेष रूप से उपयोगी माना जाता है।

  • वैदिक साहित्य = धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान।
  • लौकिक साहित्य = सांसारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की झलक।

🕉️ वेद और वैदिक साहित्य

लौकिक साहित्य की ज़रूरत हमें क्यों पड़ी?

अगर वैदिक साहित्य पहले से मौजूद था तो फिर लोगों ने लौकिक साहित्य लिखने की ज़रूरत क्यों महसूस की?

समय के साथ समाज केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राज्य व्यवस्था, व्यापार, शिक्षा, कला और नगर जीवन का विकास हुआ। इन परिवर्तनों को दर्ज करने के लिए ऐसे ग्रंथों की आवश्यकता पड़ी जो दैनिक जीवन और सामाजिक संस्थाओं का वर्णन करें, इसी कारण लौकिक साहित्य का विकास हुआ।

लौकिक साहित्य के प्रमुख प्रकार

आज हम विस्तार से जानेंगे कि लौकिक साहित्य में कौन-कौन से ग्रंथ और विधाएँ शामिल होती हैं। 

  1. महाकाव्य
  2. पुराण
  3. नाटक
  4. नीति और राजनीति साहित्य
  5. कथासाहित्य
  6. गद्य साहित्य
  7. ऐतिहासिक ग्रंथ
  8. धर्मशास्त्र
  9. कामशास्त्र
  10. चिकित्सा साहित्य
  11. विज्ञान और गणित

1. महाकाव्य 

तो सबसे पहले बात करते हैं महाकाव्यों की। रामायण और महाभारत इतिहास स्रोत के रूप में सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। 

रामायण और महाभारत सिर्फ धार्मिक ग्रंथ हैं या समाज को भी कुछ सिखाते हैं? 

दोनों महाकाव्य केवल धर्म या भगवान की कथाएँ नहीं हैं, बल्कि इनसे हमें इतिहास, संस्कृति और राजनीति के बारे में बहोत कुछ सीखने को मिलता है ।

रामायण –

अगर हम इसके रचना काल की बात करें तो इतिहासकारों के अनुसार यह कई सदियों में विकसित (composed + edited) हुआ ग्रंथ है।

  • प्रारम्भिक रचना– लगभग 7वीं–5वीं शताब्दी ईसा पूर्व (700–500 BCE)
  • अंतिम रूप (संशोधन/विस्तार सहित)– लगभग 2वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक

रामायण से हमें उस समय की राजव्यवस्था, परिवार व्यवस्था और सामाजिक मूल्यों की जानकारी मिलती है। इस ग्रंथ से निम्नलिखित ऐतिहासिक संकेत मिलते हैं–

  • राजतंत्र और उत्तराधिकार प्रणाली
  • वनवास प्रसंग से जनजातीय समाज की झलक
  • स्त्री की स्थिति और परिवार व्यवस्था
  • युद्ध पद्धति और सैन्य संगठन

महाभारत 

महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास से संबंधित मानी जाती है। इतिहासकारों के अनुसार इसकी मूल कथा लगभग 1000–800 ईसा पूर्व की परंपराओं पर आधारित है, जबकि इसे लिखित और विस्तृत रूप लगभग 400 ईसा पूर्व से 4वीं शताब्दी ईस्वी के बीच प्राप्त हुआ। इसलिए महाभारत में हमें विभिन्न कालों के समाज, राजनीति और धर्म की झलक मिलती है। महाभारत से हमें निम्नलिखित जानकारी मिलती है-

  • सभा और प्रशासनिक संस्थाएँ
  • कूटनीतिक चालें (जैसे शकुनि और श्रीकृष्ण की भूमिका)
  • युद्धकला और सैन्य रणनीति
  • वर्ण व्यवस्था और शिक्षा प्रणाली

2. पुराण

पुराण किसी एक समय में लिखे गए ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि इनका निर्माण कई सदियों में हुआ। इतिहासकारों के अनुसार इनकी प्रारम्भिक रचना लगभग 300 ईसा पूर्व से शुरू मानी जाती है, जबकि इनका मुख्य संकलन गुप्तकाल (लगभग 300–600 ईस्वी) में हुआ और बाद के समय में भी इनमें कई अंग जोड़े गए। इसलिए पुराणों से हमें प्राचीन भारत की वंशावलियों, भूगोल, समाज और धार्मिक परंपराओं के बारे में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त होती है।

कुल 18 महापुराण माने जाते हैं (जैसे विष्णु पुराण, शिव पुराण, भागवत पुराण, मार्कंडेय पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण आदि)। 

इसके अतिरिक्त उपपुराणों का भी उल्लेख मिलता है, जैसे– सनत्कुमार पुराण, नरसिंह पुराण, बृहन्नारदीय पुराण, शिवरहस्य पुराण आदि। परंपरा के अनुसार उपपुराणों की संख्या 18 मानी जाती है, 

लेकिन अलग-अलग ग्रंथों और विद्वानों की सूचियों में इनके नाम बदलते मिलते हैं जैसे कुछ सूचियों में जो ग्रंथ उपपुराण माने गए हैं, वे दूसरी सूची में शामिल नहीं होते और उनकी जगह अन्य ग्रंथों के नाम आ जाते हैं।

योगदान

पुराणों में कथाएँ धार्मिक रूप में प्रस्तुत की गई हैं, लेकिन इनके माध्यम से उस समय की वंशावलियाँ, भूगोल, तीर्थस्थल और सामाजिक मान्यताओं की जानकारी मिलती है। इसलिए इतिहासकार इन्हें प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण न मानकर सहायक स्रोत के रूप में उपयोग करते हैं।


3. नाटक और नाट्यशास्त्र (Dramatic Literature)

प्राचीन भारत में नाटक केवल मनोरंजन का साधन नहीं थे, बल्कि समाज और संस्कृति को भी दिखाते थे। नाटकों में उस समय के नगर-जीवन, राजदरबार, शिक्षा, स्त्रियों की स्थिति, विवाह-प्रथा और लोगों के रहन-सहन की झलक मिलती है।

भरतमुनि का नाट्यशास्त्र (लगभग 200 ईसा पूर्व से 200 ईस्वी के बीच रचित) नाटक कला पर लिखा गया सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता है। इसमें अभिनय, संगीत, नृत्य, रंगमंच, दर्शक और कलाकारों की भूमिकाओं तक का विस्तृत वर्णन मिलता है। इससे हमें प्राचीन भारत की कला और सांस्कृतिक जीवन के स्तर का पता चलता है।

महान संस्कृत कवि और नाटककार कालिदास को गुप्तकाल (लगभग 4th–5th शताब्दी ईस्वी) का माना जाता है। उनके नाटक अभिज्ञानशाकुंतलम् में आश्रम-जीवन, राजदरबार, प्रेम-विवाह और प्रकृति के प्रति लोगों के लगाव का सुंदर चित्रण मिलता है। इससे उस समय के सामाजिक जीवन और राजव्यवस्था की जानकारी मिलती है।

इस प्रकार नाटक और नाट्यशास्त्र हमें प्राचीन भारतीय समाज के सांस्कृतिक और सामाजिक इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करते हैं।

कालिदास के अलावा भी प्राचीन भारत में अनेक नाटककार हुए जैसे भास, शूद्रक और विशाखदत्त। उनके नाटक भी समाज और राजनीति की जानकारी देते हैं,

प्रमुख संस्कृत नाटककारों का संक्षिप्त उल्लेख
  • भास (लगभग 2–3 शताब्दी ईस्वी) – स्वप्नवासवदत्ता, प्रतिज्ञा यौगंधरायण
  • शूद्रक (लगभग 3–4 शताब्दी ईस्वी) – मृच्छकटिकम्
  • कालिदास (लगभग 4–5 शताब्दी ईस्वी) – अभिज्ञानशाकुंतलम्, विक्रमोर्वशीयम्, मालविकाग्निमित्रम्
  • विशाखदत्त (लगभग 4–5 शताब्दी ईस्वी) – मुद्राराक्षस
  • हर्षवर्धन (लगभग 7 शताब्दी ईस्वी) – रत्नावली, प्रियदर्शिका, नागानन्द
  • भवभूति (लगभग 8 शताब्दी ईस्वी) – उत्तररामचरित, महावीरचरित, मालती-माधव

4. नीति और राजनीति साहित्य

लौकिक साहित्य का एक महत्वपूर्ण भाग नीति और राजनीति साहित्य है। इनसे हमें प्राचीन भारत की शासन व्यवस्था, कूटनीति, नैतिक आदर्शों और जीवन मूल्यों की जानकारी मिलती है।

  • नीति साहित्य का मुख्य उद्देश्य था व्यक्ति को सही आचरण, नैतिक जीवन और व्यावहारिक बुद्धि की शिक्षा देना।
  • वहीं राजनीति साहित्य का संबंध राज्य संचालन, प्रशासन, दंड व्यवस्था और कूटनीति से था।

इस प्रकार दोनों मिलकर उस समय की सामाजिक और राजनीतिक सोच को बताते हैं।

ग्रंथलेखकसमय-काल (लगभग)
पंचतंत्रविष्णु शर्मा3–5 शताब्दी ईस्वी
हितोपदेशनारायण पंडित9–10 शताब्दी ईस्वी
नीतिशतकभर्तृहरि6–7 शताब्दी ईस्वी
अर्थशास्त्रकौटिल्य4 शताब्दी ईसा पूर्व
शुक्रनीतिपरंपरागत रूप से शुक्राचार्यप्रारंभिक मध्यकाल

5. कथासाहित्य

लौकिक साहित्य का एक महत्वपूर्ण भाग है कथासाहित्य।

इसमें ऐसी कहानियाँ शामिल हैं जो केवल धार्मिक विषयों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आम लोगों के जीवन, प्रेम, साहस, राजनीति और समाज को दर्शाती हैं।

अगर हम ध्यान से देखें, तो इन कथाओं के माध्यम से हमें उस समय के नगर जीवन, व्यापार, राजदरबार, स्त्रियों की स्थिति और सामाजिक परंपराओं की जानकारी मिलती है।

प्रमुख कथाग्रंथ और उनका समय
ग्रंथलेखकसमय-काल
कथासरित्सागरसोमदेव11 शताब्दी ईस्वी
बृहत्कथागुणाढ्य (परंपरागत रूप से)प्रारंभिक शताब्दियाँ ईस्वी
दशकुमारचरितदंडी7 शताब्दी ईस्वी
कादम्बरीबाणभट्ट7 शताब्दी ईस्वी

इस प्रकार कथासाहित्य प्राचीन भारत के सामाजिक जीवन को समझने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। यह हमें बताता है कि उस समय आम लोगों का जीवन कैसा था और समाज किस दिशा में आगे बढ़ रहा था।

प्राचीन भारतीय कैलेंडर, BC/AD, और शताब्दी


6. गद्य साहित्य

लौकिक साहित्य का एक महत्वपूर्ण भाग है गद्य साहित्य।

गद्य का अर्थ है साधारण वाक्यों में लिखा गया साहित्य, जिसमें छंद या तुक नहीं होते।

प्राचीन भारत में अधिकांश रचनाएँ पद्य (श्लोक) में मिलती हैं, लेकिन कुछ विद्वानों ने गद्य शैली में भी महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे। ये ग्रंथ हमें उस समय के समाज, राजनीति और राजदरबार के बारे में जानकारी देते हैं। 

प्रमुख गद्य ग्रंथ

  • हर्षचरित और कादम्बरी की रचना बाणभट्ट ने 7वीं शताब्दी ईस्वी में 
  • दशकुमारचरित की रचना दंडी ने लगभग 7वीं शताब्दी ईस्वी में 
  • राजतरंगिणी की रचना कल्हण ने 12वीं शताब्दी ईस्वी में 
  • वासवदत्ता की रचना सुबन्धु ने लगभग 6–7वीं शताब्दी ईस्वी में 

7. ऐतिहासिक ग्रंथ

लौकिक संस्कृत साहित्य में कुछ ऐसे ग्रंथ मिलते हैं जिनमें राजाओं, वंशों और ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन किया गया है। ऐसे ग्रंथों को ऐतिहासिक ग्रंथों की श्रेणी में रखा जाता है। जैसे –

हर्षचरित 

यह ग्रंथ सम्राट हर्षवर्धन के जीवन पर आधारित है। इसमें हर्ष के प्रारंभिक जीवन, उसके परिवार, राज्य विस्तार और दरबारी जीवन का वर्णन मिलता है। यद्यपि इसमें साहित्यिक अलंकरण(एक ही शासक की तारीफ) अधिक है, फिर भी यह हर्षकालीन इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

राजतरंगिणी

यह कश्मीर के राजाओं का क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत करती है। अन्य ग्रंथों की तुलना में इसमें ऐतिहासिक दृष्टिकोण अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। कश्मीर की राजनीति, प्रशासन और सामाजिक स्थिति को समझने में यह अत्यंत उपयोगी है।

विक्रमांकदेवचरित

इसकी रचना बिल्हण ने 11वीं शताब्दी ईस्वी में की। यह ग्रंथ चालुक्य शासक विक्रमादित्य षष्ठ के जीवन और उपलब्धियों का वर्णन करता है। इसमें दक्षिण भारत की राजनीतिक परिस्थितियों की झलक मिलती है।


8. धर्मशास्त्र

धर्मशास्त्र ऐसे ग्रंथ होते हैं जिनमें समाज को कैसे चलाना चाहिए, लोगों के क्या कर्तव्य हैं, और जीवन के कौन-कौन से नियम हैं इन सब बातों का वर्णन मिलता है।

और वर्ण-व्यवस्था, आश्रम-व्यवस्था, विवाह, उत्तराधिकार, दंड-व्यवस्था और सामाजिक नियमों के बारे में भी बिस्तार से जानकारी मिलती है। उदाहरण —

मनुस्मृति (लगभग 200 BCE – 200 CE)
  • रचयिता – ऋषि मनु

इसमें विवाह, उत्तराधिकार, जाति व्यवस्था और दंड विधान के नियम बताए गए हैं। राजा और प्रजा के कर्तव्यों का भी वर्णन मिलता है।

भारतीय समाज की सामाजिक और कानूनी व्यवस्था को समझने के लिए यह एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है।

याज्ञवल्क्य स्मृति (लगभग 3री–5वीं शताब्दी ईस्वी)
  • लेखक– ऋषि याज्ञवल्क्य

इसमें उत्तराधिकार, कानून, न्याय व्यवस्था, समाज और प्रशासन से जुड़े नियम अधिक व्यवस्थित रूप में दिए गए हैं।

नारद स्मृति (लगभग 4वीं शताब्दी ईस्वी)
  • लेखक – ऋषि नारद

इसमें विशेष रूप से न्याय, आचार-व्यवहार के नियम, अदालत और कानूनी प्रक्रिया से जुड़े विषयों पर अधिक ध्यान दिया गया है।

पाराशर स्मृति (गुप्तोत्तर से प्रारंभिक मध्यकाल)
  • लेखक – ऋषि पाराशर

इसमें विशेष रूप से कलीयुग के लिए नियम बताए गए हैं। इसलिए इसे “कलीयुग धर्म स्मृति” भी कहा जाता है। विवाह, शुद्धि-अशुद्धि, दंड और धर्म से जुड़े नियमों की जानकारी है। 

बृहस्पति स्मृति (लगभग 6वीं–7वीं शताब्दी ईस्वी)
  • लेखक – ऋषि बृहस्पति

इसमें सिविल और क्रिमिनल ला, ऋण, उत्तराधिकार और दंड व्यवस्था का वर्णन है। न्याय व्यवस्था पर यह धर्मशास्त्रों में सबसे विस्तृत ग्रंथ माना जाता है।

इतिहासकार मानते हैं कि ये सब ग्रंथ एक ही व्यक्ति द्वारा नहीं, बल्कि अलग-अलग समय में संकलित और संशोधित किए गए।


9. कामशास्त्र

कामशास्त्र ऐसे ग्रंथ हैं जिनमें मानव जीवन के एक महत्वपूर्ण पक्ष काम (इच्छाएँ, प्रेम और दाम्पत्य जीवन) से जुड़े नियम बताए गए हैं।

  • अपने प्राचीन विचारधारा में जीवन के चार पुरुषार्थ माने गए हैं– धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
  • कामशास्त्र “काम” पुरुषार्थ से संबंधित ग्रंथ हैं।
प्रमुख ग्रंथ (कामसूत्र) –
  • इसकी रचना वात्स्यायन ने लगभग 3री–4थी शताब्दी ईस्वी में की।
  • इसमें दाम्पत्य जीवन, विवाह, प्रेम और सामाजिक संबंधों का वर्णन है।

यह केवल शारीरिक विषयों तक सीमित नहीं है, बल्कि उस समय के शहरी समाज और जीवन शैली की भी जानकारी देता है।

बाद में कामसूत्र पर आधारित या उससे प्रेरित कुछ और ग्रंथ लिखे गए। जैसे –

  • रति रहस्य – रचयिता: कोक पंडित (मध्यकाल)
  • अनंग रंग – रचयिता: कल्याणमल्ल (मध्यकाल)
  • पंचसायक – रचयिता: ज्योतिरीश्वर

10. चिकित्सा साहित्य

अपने प्राचीन भारत में चिकित्सा विज्ञान (आयुर्वेद) का भी अच्छा विकास हुआ था। 

प्रमुख चिकित्सा ग्रंथ

चरक संहिता

रचयिता – चरक, काल – लगभग 1री–2री शताब्दी ईस्वी

  • इसमें आयुर्वेद के सिद्धांत और औषधि विज्ञान का वर्णन है।
  • रोगों के कारण और उपचार की जानकारी मिलती है।
सुश्रुत संहिता

रचयिता – सुश्रुत (लगभग 1री सहस्राब्दी ईसा पूर्व प्रारंभिक रूप, बाद में संशोधन)

  • इसमें शल्य चिकित्सा (सर्जरी) का बिस्तार से वर्णन है।
  • शरीर रचना और ऑपरेशन की विधियों की जानकारी मिलती है।
अष्टांग हृदयम्

रचयिता – वाग्भट(लगभग 7वीं शताब्दी ईस्वी)

  • इसमें आयुर्वेद के आठ अंगों का सरल और व्यवस्थित वर्णन है।

इससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चिकित्सा विज्ञान संगठित और विकसित था।

11. विज्ञान और गणित साहित्य

तो दोस्तों, अब सवाल है कि क्या लौकिक साहित्य में विज्ञान भी शामिल है? हाँ, और हमारे देश के प्राचीन वैज्ञानिक और गणितज्ञ आज भी पूरी दुनिया में सम्मानित हैं।

इस विषय पर लिखे गए ग्रंथों से हमें खगोलशास्त्र, गणित, ज्योतिष और भौतिक ज्ञान की जानकारी मिलती है। ये ग्रंथ केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं।

  • वराहमिहिर – “बृहत्संहिता”, खगोल और ज्योतिष।
  • ब्रह्मगुप्त – बीजगणित और खगोल विज्ञान।
  • भास्कराचार्य – “लीलावती”, गणित पर अद्भुत पुस्तक।
आर्यभटीय

रचयिता – आर्यभट

समय – 499 ईस्वी

  • इसमें गणित और खगोलशास्त्र का वर्णन है।
  • पृथ्वी के गोल होने और उसके घूमने का उल्लेख मिलता है।
ब्रह्मस्फुटसिद्धांत
  • रचयिता – ब्रह्मगुप्त (7वीं शताब्दी ईस्वी)

इसमें शून्य (0) और ऋणात्मक संख्याओं के नियम बताए गए हैं। और बीजगणित से संबंधित महत्वपूर्ण सिद्धांत मिलते हैं।

सिद्धांत शिरोमणि

रचयिता – भास्कराचार्य(12वीं शताब्दी ईस्वी)

  • इसमें गणित और खगोलशास्त्र के कई महत्वपूर्ण सिद्धांत मिलते हैं।
  • बीजगणित और ज्यामिति का विस्तार से वर्णन है।
सूर्य सिद्धांत

यह खगोलशास्त्र से संबंधित महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें ग्रहों की गति, नक्षत्रों की स्थिति और समय गणना का वर्णन मिलता है।

  • वर्तमान स्वरूप लगभग 4वीं–5वीं शताब्दी ईस्वी

इसका निश्चित लेखक ज्ञात नहीं है परंपरा के अनुसार इसे “सूर्य देव” द्वारा मयासुर को बताया गया माना जाता है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह एक संकलित ग्रंथ माना जाता है।

इतिहास में महत्तव –

इन ग्रंथों से पता चलता है कि प्राचीन भारत में गणित और खगोल विज्ञान काफी उन्नत थे। शून्य की खोज और ग्रहों की गति की गणना जैसे योगदान विश्व इतिहास में भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

प्राचीन भारतीय इतिहास : एक संक्षिप्त लेकिन सम्पूर्ण परिचय


ध्यान देने योग्य बातें

  • लौकिक साहित्य मुख्यतः संस्कृत भाषा में रचा गया। काव्य, महाकाव्य, गद्य, नाटक, ऐतिहासिक ग्रंथ, विज्ञान और गणित से जुड़े अधिकांश मूल ग्रंथ संस्कृत में ही लिखे गए थे।
  • कालिदास, बाणभट्ट, भारवि, दंडी, आर्यभट, भास्कराचार्य और वराहमिहिर जैसे विद्वानों ने अपनी रचनाएँ संस्कृत में ही कीं।
  • “लौकिक साहित्य” शब्द सामान्यतः उस साहित्य के लिए प्रयोग किया जाता है जो वेदों से अलग होकर समाज, संस्कृति, राजनीति, विज्ञान और दैनिक जीवन से संबंधित हो।
  • यद्यपि प्राकृत, पाली और अपभ्रंश भाषाओं में भी साहित्य रचा गया, फिर भी इतिहास और प्रतियोगी परीक्षाओं में जब “लौकिक साहित्य” कहा जाता है, तो उसका आशय प्रायः संस्कृत लौकिक साहित्य से होता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि लौकिक साहित्य प्राचीन भारत के इतिहास को समझने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। जहाँ वैदिक साहित्य हमें धार्मिक और आध्यात्मिक जीवन की झलक देता है, वहीं लौकिक साहित्य समाज के वास्तविक और व्यावहारिक पक्ष को हमारे सामने रखता है।

धर्मशास्त्रों से हमें सामाजिक नियमों और कानून की जानकारी मिलती है, कामशास्त्र से पारिवारिक और सामाजिक जीवन का स्वरूप स्पष्ट होता है, चिकित्सा ग्रंथों से वैज्ञानिक सोच का विकास दिखाई देता है, और गणित-खगोलशास्त्र से प्राचीन भारत की बौद्धिक प्रगति का प्रमाण मिलता है।

इन सभी ग्रंथों को मिलाकर देखें तो हमें यह समझ में आता है कि प्राचीन भारतीय समाज केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत विकसित था।

इसलिए, प्राचीन भारत के समग्र इतिहास को समझने के लिए लौकिक साहित्य का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।

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