ब्रिटिश और भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास का अध्ययन

भारत का इतिहास एक सहज लेकिन गहराई से समझने वाला –

तो दोस्तों आपने कभी तो पढा ही होगा प्रागैतिहासिक काल, आद्य ऐतिहासिक काल, और ऐतिहासिक काल के बारे में , इनको हम अगले ब्लॉग मे जानेंगे आज हम सिर्फ ऐतिहासिक काल को अच्छे से समझेंगे कि कैसे इस काल का विभाजन किया गया? किया भी गया तो क्यूँ? और शुरूवात किसने की? आज हम इन्ही सवालों को जानेंगे –

भारतीय इतिहास का वर्गीकरण

 हमारे भारत देश का इतिहास बेहद विस्तृत और जटिल है, लेकिन इसे समझने  और लोगों को समझाने के लिए इतिहासकारों ने इसे तीन प्रमुख कालखंडों में बाँटा है-

  1. प्राचीन इतिहास
  2.  मध्यकालीन इतिहास
  3. आधुनिक इतिहास

अब आप सोच रहे होंगे कि इतिहास तो एक ही है, फिर इसमें ये अलग-अलग नामों और कालों की ज़रूरत क्यों पड़ी? क्या कोई ऐसा बिंदु था जहाँ कुछ ऐसा बदला, कि हमें कहना पड़ा  “अब यह मध्यकाल है”,  या  “अब आधुनिक युग शुरू हो गया है”??

इसका उत्तर जानने के लिए हमें थोड़ी देर के लिए इतिहास के अध्ययन और लिखना कब सुरु हुए इस प्रक्रिया को समझना होगा।


 इतिहास को बाँटने की शुरुआत  (ब्रिटिश दृष्टिकोण)

1600 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी को इंग्लैंड की रानी (एलिज़ाबेथ प्रथम) से भारत में व्यापार करने की अनुमति मिली। शुरुआत सिर्फ व्यापार के इरादे से हुई। 1757 ई. में प्लासी का युद्ध अंग्रेज़ों और बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के बीच हुआ जिसमें अंग्रेजो की जीत के पश्चात, अंग्रेज़ों ने अपने समर्थक मीर जाफ़र को बंगाल का नवाब बना दिया। अब असली ताकत अंग्रेजो के हाथ में आ गयी थी इस युद्ध से भारी मात्रा में धन की प्राप्ति, व्यापार से राजनीति में प्रवेश, बंगाल में मनचाहा व्यापार और बहुत से फायदे हुए। और इसीके परिमाण स्वरुप –

  • 1764 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय,अवध के नवाब शुजाउद्दौला, बंगाल के नवाब मीर कासिम 1vs3 जिसमें अंग्रेजो की जीत हुई। 
  • जिससे बंगाल प्रेसीडेंसी(बंगाल, बिहार, उड़ीसा (ओडिशा)) पर अंग्रेजो का कंट्रोल हो गया। अंग्रेज अब सेना रखते थे, कर वसूलते थे, प्रशासन चलाते थे। मुग़ल सम्राट अंग्रेज़ों पर निर्भर हो गया शाह आलम द्वितीय को अंग्रेज़ों से पेंशन और सुरक्षा मिलने लगी। मुग़ल सम्राट अब नाम का रह गया।
जब कोई बाहरी देश आकर हमारे देश पर शासन करे और फैसले अपने फ़ायदे के लिए ले, उसे औपनिवेशिक शासन कहते हैं।

जब हमारे देश में औपनिवेशिक शासन (Colonial Rule) आया, तो बंगाल प्रेसीडेंसी में अलग अलग जगह पर विद्रोह होने लगे जिससे शासन करना मुश्किल हो गया, तब अंग्रेजो को लगा अगर भारत पर लंबे समय तक सासन करना है तो यहाँ की जाति, धर्म, समाज, कानून, इतिहास को समझना जरूरी है। लेकिन उनके लिए यह भी जरूरी था कि वे भारत के अतीत को लोगों के सामने इस तरह से दिखाए, जिससे यह लगे कि ब्रिटिश शासन के आने से ही हमारे देश में “सभ्यता और प्रगति” की शुरूवात हुई है। 

  • विलियम जोन्स 1783 ई. में भारत आया जो कलकत्ता उच्च न्यायालय (Supreme Court of Judicature) का न्यायाधीश बना। उसने 1784 ई. में  एशियाटिक सोसाइटी बनाई और भारतीय इतिहास, संस्कृति, ग्रंथों का अध्ययन शुरू करवाया। 

शुरुआत में अंग्रेज इतिहासकार जेम्स मिल (James Mill) की किताब History of British India (1817) में प्रकाशित हुई इनके अनुसार हमारे देश के इतिहास को तीन कालों में बाँटा गया –

  1. हिंदू काल (प्राचीन काल)
  2. मुस्लिम काल (मध्यकाल)
  3. ब्रिटिश काल (आधुनिक काल)

इस बाँटने का आधार था हमारे देश में शासन करने वाले शासकों के धर्म, जाति और संस्कृति। 

  • हिंदू काल में ज्यादातर शासक हिंदू धर्म से जुड़े थे।
  • मुस्लिम काल में दिल्ली सल्तनत और मुगलों जैसे मुस्लिम शासकों का शासन रहा।
  • ब्रिटिश काल में यूरोपीय शक्तियों का शासन और अंततः अंग्रेज़ों का पूर्ण शासन स्थापित हो गया। 

1796 ई. में माउंटस्टुअर्ट एल्फ़िंस्टन ईस्ट इंडिया कंपनी के एक युवा अधिकारी (cadet), बॉम्बे प्रेसीडेंसी का गवर्नर (1819–1827) के रूप में भारत आया। उसकी प्रसिद्ध पुस्तक “History of India” 1841 ई. में प्रकाशित हुई। जिसमें सिर्फ़ राजाओं और युद्धों की कहानी ही नहीं ब्लकि भारतीय सामाजिक व्यवस्था, ग्राम व्यवस्था (Village system), जाति व्यवस्था, धार्मिक परंपराएँ, स्थानीय संस्थाएँ और रिवाज़ मतलब उसने भारत को एक समाज के रूप में समझने की कोशिश की। जहां ब्रिटिश इतिहासकार हमारे देश को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे थे वहीं माउंटस्टुअर्ट एल्फ़िंस्टन ने ऐसा नहीं किया। 


भारतीय इतिहासकारों की प्रतिक्रिया — नाम नहीं, सोच बदल दी।  

प्राचीन इतिहासकार और उनके द्वारा दिया गया योगदान

अब ज़रा आप खुद सोचिए क्या हमारे देश का इतिहास केवल शासकों के धर्म से तय होता है? हमारे देश के इतिहासकारों ने इस सोच को नकार दिया। उन्होंने कहा कि इतिहास को केवल सत्ता और धर्म से बाँटना सही नहीं है। इसलिए उन्होंने नए नाम दिए–

  1. प्राचीन इतिहास
  2. मध्यकालीन इतिहास
  3. आधुनिक इतिहास

हालाँकि उन्होंने समय-सीमा को ज्यादा नहीं बदला, लेकिन उन्होंने हर काल के पीछे का कारण बदला।

तीनों कालों की समय सीमा—

अब एक नजर डालते हैं इन कालों की समय-सीमा पर और यह समझते हैं कि किन-किन बातों के आधार पर हमारे इतिहासकारों ने इतिहास का वर्गीकरण किया–

प्राचीन इतिहास अथवा (हिंदू काल)-

  • यह काल सिंधु घाटी सभ्यता(2500–1750 ई.पू.) से लेकर 7वीं शताब्दी ईस्वी (लगभग 600–700 A.D.) तक माना जाता है।
  • इसमें वैदिक काल, महाजनपद, मौर्य, गुप्त वंश, और दक्षिण भारत के चोल-पांड्य जैसे साम्राज्य आते हैं।

ब्रिटिश इतिहासकारों ने इसे हिंदू काल इसलिए कहा क्योंकि इस दौर में अधिकतर लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक धारा वैदिक, बौद्ध या जैन परंपरा से जुड़ी थी।

मध्यकालीन इतिहास ( मुस्लिम काल)-

6वीं शताब्दी ईस्वी में गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद भारत में हूणों और क्षेत्रीय राजवंशों का उदय हुआ, जिनमें पुष्यभूति वंश के हर्षवर्धन(606–647 ई.) ने कुछ समय के लिए एकता स्थापित की। हर्षवर्धन की मृत्यु (647 ई.) के बाद कोई मजबूत केंद्रीय सत्ता नहीं बची देश छोटे-छोटे क्षेत्रीय राज्यों में बँटने लगा। ठीक इसी समय 712 ईस्वी में मुहम्मद बिन क़ासिम के नेतृत्व में अरबों ने सिंध पर पहला सफल आक्रमण किया। उसने सिंध के शासक राजा दाहिर को पराजित कर पहली बार अरब प्रशासन की स्थापना की। 

उमय्यद ख़िलाफ़त(वंश का नाम) शासक अल-वलीद प्रथम (705 ई. – 715 ई.) ने अपने सेनापति कासिम को भारत पर हमला करने का आदेश जारी किया था। 712 ई. के बाद सिंध पर अरबों का नियंत्रण तो हुआ, लेकिन वहाँ कोई नया राजा नहीं बना और न ही अल-वलीद भारत आया। सिंध को उमय्यद ख़िलाफ़त का एक प्रांत बना दिया गया और मुहम्मद बिन क़ासिम उसका प्रशासक(शासन की देखभाल करने वाला) बना। 

  • मध्यकालीन युग 712 ई. के सिंध आक्रमण से लेकर 1707 ई. में औरंगज़ेब की मृत्यु तक माना जाता है। इसमें दिल्ली सल्तनत, मुग़ल साम्राज्य, बहमनी, विजयनगर जैसे शक्तियों का समय आता है।
  • ब्रिटिश इतिहासकारों ने इसे मुस्लिम काल कहा, लेकिन भारतीय इतिहासकार इसे दो संस्कृतियों का मिलन और संस्कृतियों का आदान-प्रदान का समय मानते हैं।

आधुनिक इतिहास (ब्रिटिश काल)-

इसकी शुरुआत मानी जाती है 1707 के बाद, जब औरंगज़ेब की मृत्यु हुई और मुग़ल साम्राज्य का धीरे-धीरे पतन होना सुरु हो गया। इसके बाद देश में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रभाव तेजी से बढ़ा, लेकिन आधुनिकता का मतलब केवल “ब्रिटिश शासन” नहीं हो सकता। 

भारतीय इतिहासकारों के अनुसार–  

  • यह वो समय है जब भारत में पश्चिमी विचारधाराओं का आवागमन सुरु हुआ, तो हमारे समाज में कई सुधार आंदोलन देखने को मिलते हैं जैसे- छुआछूत, सती प्रथा, पर्दा प्रथा जैसे मुद्दों पर बहस और इसमे सुधार हुए।
  •  राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता जैसी भावनायें विकसित हुई इसलिए इसे “आधुनिक काल” कहा जाता है केवल तकनीकी रूप से नहीं, बल्कि विचारो के रूप से भी।
इतिहास को समझने का सही और आसान तरीका क्या हो सकता है?

अपने इतिहास को केवल तारीख़ों और शासन-कालों में बाँट देना आसान है, लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं है। वास्तव में, हमारे इतिहास के हर काल में समाज, संस्कृति, विज्ञान, भाषा, धर्म और राजनीति की कई परतें हैं। Example– 

  • प्राचीन काल में केवल धर्म ही नहीं, बल्कि जीवन के लगभग हर क्षेत्र में प्रगति हुई। विज्ञान और गणित के क्षेत्र में आर्यभट ने शून्य और दशमलव प्रणाली को व्यवस्थित रूप दिया, पृथ्वी के घूर्णन की बात कही,/ जबकि वराहमिहिर ने खगोलशास्त्र, मौसम विज्ञान और ज्योतिष पर महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे,/ चिकित्सा विज्ञान में चरक और सुश्रुत ने आयुर्वेद और शल्य चिकित्सा को विकसित किया,/ कला और स्थापत्य के क्षेत्र में स्तूप, मंदिर, गुफाएँ, अजंता–एलोरा जैसी चित्रकला और शिल्पकला का विकास हुआ,/ साथ ही इस काल में धातुकर्म, नगर नियोजन, व्यापार, शिक्षा प्रणाली (गुरुकुल) और भाषा–साहित्य का भी उत्कर्ष देखने को मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय सभ्यता केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध थी।
  • मध्यकाल केवल आक्रमण का समय नहीं, बल्कि भारतीय-इस्लामिक मेल,/ भक्ति आंदोलन जिसने बताया कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए धर्म, जाति, पैसा या ऊँच–नीच ज़रूरी नहीं, प्रेम, सच्चाई और अच्छा व्यवहार ज़रूरी है भगवान सबके हैं हिंदू, मुस्लिम, अमीर, गरीब सबके,/ सूफी परंपरा ने क्या सिखाया नाम जो भी हो लेकिन भगवान 1 ही है इस दौर में भक्ति और सूफी संतों ने लोगों को आपस में लड़ने के बजाय प्यार, भाईचारे और बराबरी से रहने की सीख दी। और कबीर, गुरु नानक, मीराबाई जैसे संतों ने जाति और धार्मिक भेदभाव पर प्रश्न उठाए। साथ ही यह समय केवल दिल्ली सल्तनत और मुग़लों तक सीमित नहीं था, बल्कि विजयनगर, बहमनी, राजपूत, मराठा जैसे स्थानीय और क्षेत्रीय राज्यों के उदय और विकास का भी काल था।
  •  आधुनिक काल का अर्थ सिर्फ इतना नहीं कि अंग्रेज भारत पर शासन कर रहे थे बल्कि इस समय भारत में लोग सोचने-समझने लगे (बौद्धिक पुनर्जागरण) अपने अधिकारों और आज़ादी के बारे में(राजनीतिक चेतना) और अंत में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ संगठित होकर संघर्ष किया (स्वतंत्रता संग्राम)। हमारे देश के लोग यह समझे की विदेशी शासन गलत है

ब्रिटिश इतिहासकारों ने हमारे इतिहास को जिस नज़र से देखा, वह राजनीतिक सत्ता और धर्म के आधार पर था।

लेकिन भारतीय इतिहासकारों ने उसे समाज और विचारों के परिवर्तन की दृष्टि से देखा और यही फर्क इतिहास को “हमारा अपना” बनाता है।

सिंधु घाटी सभ्यता का सही समय-काल क्या माना जाता है?

सिंधु घाटी सभ्यता का समय-काल विद्वानों के बीच अलग-अलग माना गया है। BA History के कई पाठ्यक्रमों के अनुसार 2500–1750 ई.पू. माना जाता है, जो पूरी तरह स्वीकार्य है। हालाँकि कुछ इतिहासकार इसे 2600–1900 ई.पू. भी मानते हैं।इसलिए यह कहा जा सकता है कि सिंधु घाटी सभ्यता का समय-निर्धारण एक से अधिक विद्वत् मतों पर आधारित है।

क्या 712 ईस्वी से ही भारत में मध्यकाल की शुरुआत मानी जाती है?

712 ईस्वी में मुहम्मद बिन क़ासिम द्वारा सिंध पर किया गया आक्रमण भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना थी। कई इतिहासकार इसे मध्यकाल की ओर बढ़ते संक्रमण (transition phase) का संकेत मानते हैं। हालाँकि यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि सभी इतिहासकार मध्यकाल की शुरुआत को केवल 712 ई. से नहीं जोड़ते। इसलिए 712 ई. को एक निर्णायक मोड़ माना जाता है, न कि एकमात्र सर्वमान्य शुरुआत।

क्या आर्यभट ने शून्य (0) की खोज की थी?

आर्यभट ने दशमलव स्थानमान प्रणाली को व्यवस्थित रूप दिया और यह बताया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है।हालाँकि शून्य (0) के स्पष्ट गणितीय नियम और उसका स्वतंत्र प्रयोग बाद में ब्रह्मगुप्त ने विकसित किया। इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि आर्यभट ने भारतीय गणित की नींव मज़बूत की,जबकि शून्य को पूर्ण गणितीय रूप बाद के विद्वानों ने दिया।

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