इतिहास जानने के स्रोत: पुरातात्विक और साहित्यिक साक्ष्य

कभी आपने सोचा है कि हमें हमारे इतिहास के बारे में जानकारी मिली कैसे? आज जो कुछ भी हम इतिहास के स्रोत के बारे में पढ़ते हैं, उसकी जानकारी हमें कैसे मिली? सिंधु घाटी सभ्यता, वैदिक काल, गुप्त काल, मौर्य काल आदि की जानकारी हमारे इतिहासकारों को कैसे मिली? ये सब जानना हमारे लिए बेहद जरूरी है क्योंकि जब हम अपने अतीत को जानते हैं, तभी हम अपने वर्तमान को बेहतर बना सकते हैं और भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं।

आज के समय में तो हम अपने इतिहास को दस्तावेजों के रूप में, किताबों में, डिजिटल फॉर्म में या हार्ड-कॉपी के रूप में सुरक्षित रख सकते हैं, लेकिन पहले के समय में जब हम आदिमानव थे, जब हमें लिखना-पढ़ना भी नहीं आता था, तब भी हमारे इतिहासकारों को उस समय की जानकारी कैसे प्राप्त हुई? यह सवाल अपने आप में बहुत बड़ा है, और आज के इस ब्लॉग में हम इसी महत्त्वपूर्ण विषय पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

स्रोतों के प्रकार- इतिहास जानने के दो प्रमुख आधार

हमारे इतिहास को जानने और समझने के दो प्रमुख स्रोत होते हैं, और इन्हीं के आधार पर इतिहासकारों ने बीते समय की झलक हम तक पहुंचाई है। ये दोनों स्रोत हैं–

  1. पुरातात्विक साक्ष्य
  2. साहित्यिक साक्ष्य

पुरातात्विक साक्ष्य – मिट्टी में दबे हुए

पुरातात्विक साक्ष्य मतलब ऐसे सभी प्रमाण जो हमें खुदाई में प्राप्त होते हैं चाहे वो किसी टूटे हुए बर्तन के टुकड़े हों, कोई पुरानी ईंट हो, कोई सिक्का हो, औजार हों, या फिर मूर्तियाँ, शिलालेख/अभिलेख। ये सब हमारे अतीत के बारे में गहराई से जानकारी देते हैं। 

हम सबने कभी ना कभी टीवी पर या अखबारों में पढ़ा होगा कि “फलां जगह खुदाई में हड़प्पा सभ्यता के अवशेष मिले” या “खुदाई में गुप्तकालीन सिक्के मिले” तो यही सब पुरातात्विक साक्ष्य होते हैं।

अब चलो थोड़ा और गहराई से समझते हैं, पुरातात्विक साक्ष्य हमें लगभग खुदाई से ही मिलती है, अब इसका मतलब ये नहीं कि कंही भी मिल जायगा। देखो पुराने समय की बस्तियां या गांव वक्त के साथ उन पर मिट्टी, रेत, बारिश सब जमता चला जाता है और आखिरकार, वो ऊंचा -सा टीला दिखने लगता है। वैसे टीले भी अलग अलग तरह के होते हैं जैसे-

  1. एकल संस्कृति टीला– यहाँ पे सिर्फ एक ही संस्कृति का सामान मिलेगा, जैसे पूरी की पूरी हड़प्पा वाली सभ्यता। 
  2. मुख्य संस्कृति टीला– यहाँ एक मेन संस्कृति मिलती है, बाकी सब छोटे-मोटे प्लॉट होते हैं।
  3. बहु-संस्कृति टीला– इसमें तो मज़ा आ जाता है! ऊपर-नीचे, लेयर दर लेयर अलग-अलग जमाने, अलग-अलग कल्चर, सब एक के ऊपर एक। महेंजोदड़ो इसका अच्छा उदाहरण है।

तो भाई टीला तो अब मिल गया है इन तीनों में से कौन सा टीला किस(एकल संस्कृति, मुख्य संस्कृति, बहु-संस्कृति टीला) प्रकार का है ये बात तो खुदाई के बाद ही पता चलेगी। 

खुदाई के तरीके–

1. अनुलंब खुदाई (Vertical Excavation)—
  • इसमें खुदाई सीधा ऊपर से नीचे। मकसद अलग-अलग लेयर के इतिहास को समझना, कौन पहले आया, कौन बाद में। 
2. क्षैतिज खुदाई (Horizontal Excavation)–
  • ये वाला तरीका एक ही समय की पूरी बस्ती, लाइफस्टाइल, घर-द्वार, सब कुछ फैलाकर समझने के लिए है। जैसे- हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल इन जगहों की खुदाई दोनों स्टाइल में हुई है।

भौतिक अवशेषों की साइंटिफिक जाँच

अब देखो खुदाई हो गयी तो कुछ सामान भी मिलें होंगे, अब साक्ष्य ख़ुद तो बताएंगे नहीं कि उस समय समाज और उनका रहन सहन कैसा था। चलो आगे देखते हैं–

1. रेडियो कार्बन –-डेटिंग (Carbon-14 Method)–
  • ये वाला टेस्ट, लकड़ी या हड्डी जैसी ऑर्गैनिक चीज़ों की उम्र निकालने के लिए है।
  • कार्बन-14 समय के साथ कम होता जाता है, तो उसकी गिनती से पता चल जाता है कि कितने साल पुरानी चीज़ है।
  • हड़प्पा या वेदों वाले जमाने की चीज़ों की डेटिंग ऐसे ही की गई।
2. पराग परीक्षण (Pollen Analysis)-
  • मिट्टी में जो छोटे-छोटे परागकण (पोल्लन) होते हैं, उनकी पड़ताल करके पता चलता है, उस एरिया में कैसी जलवायु, कैसी घास-फूस या पेड़-पौधे थे।
  • इससे आप जान सकते हो कि लोग क्या खाते थे, या उस ज़माने में मौसम कैसा था। खेती की भी कुछ झलक मिल जाती है।
3. धातु परीक्षण–
  • जो भी ताम्बा-लोहे की चीज़ें मिलें, उनकी बनावट, क्या-क्या मिलाया गया था, कैसे बनाई गई सबका एनालिसिस होता है।
  • इससे टेक्नोलॉजी कितनी एडवांस थी, या कौन-कौन सी जगहों से व्यापार होता था, इन सबका आईडिया मिलता है।
4. पशु अवशेष परीक्षण–
  • खुदाई में निकली हड्डियाँ, दाँत इनकी जाँच कर के पता चलता है, कौन से जानवर पालतू थे, कौन-से खाए जाते थे, किस पर सवारी करते थे।
  • इन अवशेषों से उस समय की जीवनशैली और संसाधनों के उपयोग की जानकारी मिलती है। 

साहित्यिक साक्ष्य 

जैसे-जैसे मानव सभ्यता ने विकास किया, वैसे-वैसे हमें लिखना-पढ़ना भी आ गया। जब लोग अपने विचारों को शब्दों के रूप में लिखने लगे, तब से लेकर अब तक हमारे पास एक से बढ़कर एक साहित्यिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। लोगों को लिपि का आईडिया तो 2500 ई.पू. से था, लेकिन सबसे पुरानी पांडुलिपियाँ चौथी सदी ईस्वी से पहले की नहीं मिलती

आपने वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत, लौकिक साहित्य, वैदिक साहित्य जैसे ग्रंथों के बारे में सुना होगा ये सब हमारे प्राचीन इतिहास का हिस्सा हैं और साहित्यिक साक्ष्य कहलाते हैं। इन ग्रंथों में उस समय की राजनीति, धर्म, समाज, जीवनशैली, शिक्षा व्यवस्था आदि की बहुत सारी जानकारी मिलती है।

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इतिहासकारों ने जब इन ग्रंथों को पढ़ा, तो उन्होंने यह देखा कि इसमें जो बातें लिखी गई हैं, वो उस समय के समाज की झलक देती हैं। जैसे यदि किसी ग्रंथ में यह लिखा गया है कि किसी राजा ने दान में 100 गायें दीं, तो इससे हमको उस काल की आर्थिक स्थिति और सामाजिक परंपराओं का पता चलता है।

लेकिन एक बात और जब भी हम साहित्यिक साक्ष्यों की बात करते हैं, तो हमें थोड़ा सतर्क रहना होता है। क्योंकि ये साक्ष्य किसी न किसी लेखक ने अपनी दृष्टिकोण से लिखे होते हैं, और उनकी सोच, उनकी मान्यताएं, उनका झुकाव किसी खास व्यक्ति, धर्म या विचारधारा की तरफ हो सकता है।

इसीलिए इतिहासकार जब भी किसी साहित्यिक साक्ष्य का उपयोग करते हैं, तो वे कोशिश करते हैं कि उस लिखी हुई बात की पुष्टि किसी पुरातात्विक साक्ष्य से भी हो जाए। जब दोनों साक्ष्य एक-दूसरे से मेल खाते हैं, तभी उस बात को पूरी तरह प्रमाण माना जाता है।

हमारे इतिहासकारों ने दिन-रात मेहनत करके, खुदाई की, प्राचीन लिपियों को पढ़ा, तुलना की, विश्लेषण किया और तब जाकर हमें एक समृद्ध इतिहास दिया है।

हम सभी को चाहिए कि हम अपने इतिहास को समझें, सराहें और इसे अगली पीढ़ियों तक पहुंचाएं। आप, हम, हम सब मिलकर इस विरासत को जिंदा रख सकते हैं।

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